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31 जनवरी 2012

बन्दर

एक महोदय डार्विन हुए थे , उन्होंने एक सिद्धांत दिया था , मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे . या बंदरों से मनुष्य प्रजाति का विकास हुआ . पर कुछ बुद्धिमान मनुष्य तर्क देते हैं तो फिर अभी जो बन्दर हैं , वो क्या है ? तो कुछ ने मजाक में प्रति-तर्क दिया वो तो कुछ मनुष्य अवनति होकर बन्दर हो गये हैं . मगर सुना है डार्विन के सिद्धांत को चर्च ने अस्वीकार दिया था . काश विज्ञान ने भी त्याग दिया होता . बच्चे बिना प्रयोग के इस विज्ञान-पाठ से तो बच जाते . यह बात किसी उपलब्ध अकाट्य तथ्य पर अवलंबित हैं यह भी कोई नहीं बताता . मुझे व्यक्तिगत तौर से इस बात से कोई परहेज नहीं है . हिंदू हूँ तो किसी पूर्व जन्म में बन्दर भी रहा ही होऊंगा. दिक्कत तो जिन्हें पूर्वजन्म में विश्वास नहीं है , उन्हें है . वैसे इस ज़न्म में भी बड़े बुज़ुर्ग कई बार बन्दर जैसे व्यवहार का उलाहना दे चुके हैं . आप कई लोगों के बारे में मानते हैं की वो मनुष्य-योनि में दरअसल बन्दर हैं ? अब मैं क्या बोलूं ? आप बड़े-बुजुर्ग हैं . आपने दुनिया देखी है . आप मानते है तो कोई वजह होगी .  

खैर डार्विन की इस बात पर सारे प्रतिरोध मनुष्य समाज के आये हैं , बन्दर प्रजाति ने विरोध में कोई मोर्चा निकाला हो इस बात का कोई समाचार नहीं आया है . न ही कभी उनके द्वारा बंद , जुलूस , बहिष्कार , हड़ताल , ज्ञापन देने का उल्लेख किसी समाचार पत्र में देखा कभी ? न बन्दरों ने  अपने पूर्व पुरुषों के अपमान पर कभी किसी चर्च, मस्जिद , मंदिर पर हमला किया , न कोई किताब जलायी , न किसी के मुंह पर कालिख पोती.

मनुष्य जाति जिसे सभ्यता के उन्नति का इतिहास बखानती है , और प्रगति के नए-नए सोपानों पर अपने  चढ़ने का दावा करती है , उसके ठीक विपरीत जिन्हें हम बन्दर कहते हैं वो विरोध में ज्यादा से ज्यादा खींसे निपोर देंगे , थोड़ा उछल-कूद लेंगे . बन्दर आपके सूखते हुए कपड़े उठा ले जाएँगे, या अगर आप ने खिड़की खुली छोड़ दी हो तो आपके घर में घुस कर आटा बिखेर देंगे , और कुछ नहीं कर पाए तो आपकी छत ( गौर किजीये छाती नहीं लिखा ) पर कूद लेंगे जोर जोर से . हमारी आपकी तरह विकास किया होता तो मुंह से गालियों की बौछार करते , इससे भी शांति नहीं मिलती तो 
लात-घूंसों, लाठियों , छूरों,  से मामला सुलझाने की कोशिश करते , और इससे भी बात नहीं बनती तो गोलियों की बौछार करते , और इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सभ्यता से बैठकर झंझट निपटाने के लिए मिसाइलें और परमाणु बम तो है हीँ . 

हमारे हिन्दी सिनेमा के हीरो तो पेड़ों पर भले ही न उछलकूद मचाएं , उनके आसपास जरूर उछलकूद मचा लेते हैं . हालीवुड वालों ने जरूर एक सिनेमा बनाया था ,इन्सटिंक्ट, जिसमे एन्थोनी हॉपकिंस के द्वारा गोरिल्लाओं के साथ जंगल में रहने के कुछ दृश्यों द्वारा मनुष्यों और बन्दरों के व्यवहार पर टिपण्णी है .

हमने  अंग्रेज़ी भाषा के साहित्य का ज्यादा अध्ययन नहीं किया है . परन्तु हिन्दी भाषा का कुछ सीमित अध्ययन किया है . इसमे बन्दर के हाथ उस्तरा , बन्दर-बाँट , वानर-सेना ,लंगूर से शादी की धमकी या आश्वासन , हूर के साथ लंगूर जैसे मुहावरे या जुमले प्रयोग में लाये जाते हैं . इसमें से प्रथम दो लोकोक्तियाँ तो हमारी शैशवकाल पर ठहरी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को चलाने में काफी सहायक सिद्ध हो रही हैं . और जब तरह-तरह की नयी वानर सेनाएँ लंका के बजाय अयोध्या पर ही चढ़ बैठी हैं , और ये वानर सेनाएँ  वैलन्टाइन दिवस , सिनेमा प्रदर्शन , किताब प्रकाशन , चित्रकला प्रदर्शनी , प्रणय-निवेदन में व्यस्त प्रेमी-युगलों के विरुद्ध जो बागोँ में हमारी प्राचीन परंपराओं के अनुरूप वसंत-उत्सव मना रहे होते हैं पर चढ़ाई करती हैं . जो वानर सेना  पत्थरों से समुद्र पर पुल बनाने के लिए विख्यात रही है , अब वही वानर सेना पत्थरों के द्वारा समाज के सारे पुलों को तोडने के लिए कुख्यात होती जा रही है .  

अंग्रेज़ी भाषा में अलग अलग प्रजाति के बन्दरों के लिए अलग-अलग शब्द उपलब्ध हैं मसलन - चिम्पांजी, गोरिल्ला , मंकी , लेमूर, ओरांगउटान  इत्यादि . घबराइए मत ये सब अपनी कान्वेंट में पढ़ने वाली बिटिया के नर्सरी की किताब से लिए हैं . हमारे यहाँ तो हनुमान , सुग्रीव , बाली , मयंद , अंगद रामायण के पात्र हैं और इन नामों को राम के प्रिय के रूप में पूज्य भी माना जाता है , परन्तु रामलीला वालों ने , फिर सिनेमा वालों ने , और फिर दूरदर्शन वालों ने इनकी विचित्र वेशभूषा और श्रृंगार से क्या हासिल किया या करना चाहते थे यह तो वही जाने . वैसे विश्वमोहिनी कथा में विष्णु ने नारद का श्रृंगार करने के लिए वानर-मुख क्यों चुना इसका गूढ़ अर्थ तो आपको कथावाचक ही बता सकते हैं . परन्तु इसका परिणाम यह हुआ की पूरी रामायण की नीवं इस एक चौपाई में मिल जायेगी -

          "कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥
            मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥
॥"

नारद उवाच - "तुमने मेरा रूप बंदर का बना दिया था, इससे बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होगे "
मुझे लगता है आदिवासियों , जनजातियों की कोटा राजनीति की नीव यहीं पड़ गयी थी जिससे हमारी रामराज्य नीति अभी तक जूझ रही है . आप ठीक कह रहे हैं यह दूर की कौड़ी है . परन्तु मेरा मौलिक विचार है की विष्णु नारद का मजाक नहीं उड़ा रहे थे , बल्कि  कपि-रूप ज्ञान स्वरुप है जिसे विश्वमोहिनी माया नहीं छल सकती , वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के पास ही एक हनुमान मंदिर भी है . मालूम नहीं जो काशी जा कर विश्वनाथ के दर्शन करते हैं , वो ज्ञानवापी स्थित दक्षिणमुखी हनुमान के दर्शन करते हैं या अथवा नहीं . 

परन्तु  सारे ब्रह्मचारी युवक , ठीक है , ठीक है , ब्रह्मचारी आयु वाले युवक, हनुमान भक्त होते हैं . हर अखाड़े में आपको हनुमान की प्रतिमा या तस्वीर ज़रूर मिल जायेगी . वैसे क्रिकेट की विश्वमोहिनी सूरत में फंसे कितने नारद यह जानते हैं की  गुरु हनुमान को द्रोणाचार्य और पद्मश्री दोनों सम्मानों से नवाज़ा गया था . और जिनके आठ शिष्य  भी सर्वोच्च खेल सम्मान अर्जुन पुरस्कार प्राप्त हैं . अब अगर गुरु हनुमान ने आपको कोई दाँव नहीं भी सीखाया हो , परन्तु अगर अँधेरे से आपको  डर लगता हो तो हनुमान चालीसा का पाठ मुंह-जबानी याद कर लें , रात-बिरात अँधेरे रास्ते से गुजरने में सहायता होगी . लड़की हैं ? तो क्या हुआ ? वैसे भी हमारे पिता के मित्र व्यास जी कहा करते थे देवताओं की पूजा देवियों को और देवियों की पूजा देवताओं को करनी चाहिए .


जिस देश में भरोसा नहीं की ज़रूरत पड़ने पर क़ानून आपकी मदद को आ पायेगा , और आया भी तो हिन्दी सिनेमा की तरह समय पर तो आएगा नहीं , ऐसे में हनुमान जी को आजमाने में क्या हर्ज है ? आप इसे मेरा अंधविश्वास भी कह सकते हैं . विश्वास अंधा है तो क्यों आपत्ति करते हैं , क़ानून अंधा है तो किसी को आपत्ति तो होती नहीं . वह देवी है इसलिए क्या ? 

13 जनवरी 2012

तोता

द्वापायन वेदव्यास के अयोनिज पुत्र शुक देव बारह वर्ष तक गर्भ में रह कर कृष्ण के इस आश्वासन के बाद निकले की उनके ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा .


द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयारन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यश्रत्रन्यो अभिचाकशीति ॥( ऋग्वेद)
एक डाल पर बैठे हैं वे दोनों दोनों के पंख सुनहरे हैं पेट भी दोनों के हैं एक का पेट भरा है वह फिर भी खाता है दूसरे का पेट खाली है वह फिर भी देखता है केवल देखता है!(ऋषभ )


अर्थात समान आख्यान वाले दो पक्षी एक वृक्ष पर एक साथ बैठे हुए हैं उनमें एक मधुर फल का स्वाद लेता है और दूसरा निष्क्रिय बना उसे देखता करता है।


राजा परीक्षित को भगवान शुकदेव ने भागवत सुनाई और मुक्त किया . कलियुग से इस कथा का सम्बन्ध है |इससे हमारा भी है .


उपरोक्त कथा इस बात का द्योतक है कि तोता कोई साधारण पक्षी नहीं है . जब शंकराचार्य निकले और मंडनमिश्र के घर शास्त्रार्थ का फैसला उनकी विदुषी पत्नी के द्वारा हुआ पर उनके घर की पहचान का कारण यही साधारण पक्षी तोता था .


अतैव जब विचार हुआ की कोयल , मयूर , गरुड़  , नीलकंठ  , क्रौंच पक्षी जो स्थापित ब्रांड हैं इसके विपरीत किसी ऐसे पक्षी को विषयवस्तु बनाया जाए जो उपयोगी तो बहुत है परन्तु जिस पर व्यवस्थित  सामग्री उपलब्ध नहीं है .और यह आपको परोस रहा हूँ .


अब फुटपाथ पर बैठे पिंजरे में कैद तोता जब बाहर आकर आपका भाग पढ़ सकता है तो वह मेरे लेखन की विषयवस्तु अवश्य  बन सकता है .शायद मुझ बिल्ली के हाथ छींका नहीं तोता आ जाए . वैसे हो सकता है मेरा भाग्य उस जादूगर सा हो जिसकी जान किसी द्वीप में कैद किसी तोते में अटकी है . जिसे आप आज़ाद कर दें .  परीक्षा की ऋतु आये तो आपको इस देश की पूरी शिक्षा प्रणाली एक तोते रूपी कृष्ण के विराट स्वरूप जैसी नज़र आएगी . जहाँ सारा ज्ञान रटंत विधा द्वारा एक कान से अंदर जाता और दूसरे से बाहर आता नज़र आएगा . ठीक वैसे ही जैसे विशाल आकार से छोटा स्वरुप ग्रहण कर हनुमान नागमाता सुरसा के मुख से प्रवेश कर कान से बाहर आ गए थे . वैसी पूरी रामायण कैकेयी और दशरथ की जुबान , सुपर्णखा  के नाक कान , रावण की नाभि के अमृत  , अंगद के पाँव पर टिकी हुई है . किसी आँख -नाक -कान विशेषज्ञ की अज्ञात परछाई पड़ रही है रामायण की कथा पर . और तोते के गले से मनुष्य की वाणी का निकलना भी किसी डॉ डूलिटल की मेहरबानी का मोहताज नहीं, क्योंकि वह हमारे सिखाए शब्दों और भाषा का इस्तेमाल करता है .


तोता न होता तब हमारे शिक्षा मंत्रालय का क्या होता ? शरद्जोशी जी ने लिखा था हमारे वित्त मंत्रालय को अपने कार्यालय के सामने कोलंबस की प्रतिमा लगवाना चाहिए , युति समझाई थी - यह कह कर कि अगर कोलंबस ने अमेरिका की खोज न की होती तब हम कहाँ से उधार लेते ? अब इस प्रश्न से तो समाजवादी तोतों के हमारे हाथों से उड़ जाने के कारण हम मुक्त हो चुके हैं . परन्तु अब भी हमारे प्रत्येक शिक्षा संस्थान के बाहर तोते की प्रतिमा लगवाने का मेरा सुझाव निहायत प्रासंगिक है और काफी समय तक इसके बने   रहने की पूरी तैय्यारी भी है . यह आप किसी भी विशेषज्ञ तोते से दो मिनट बात कर आश्वस्त हो जायेंगे .


तोता मंडनमिश्र के घर रह कर वेद का पाठ और मंत्र उच्चारण तो सीख ही जाता है . और उसके कानों में पिघला शीशा भी नहीं डाला जाता . भले ही तोते को उसका अर्थ या ज्ञान ताउम्र न हो . पर उससे क्या फर्क पडता है - हमारे तोते उम्र भर राम - राम करते हैं बिना राम को जाने , समझे .


तोते को खिलाई हुई झूठी मिर्च तुतलाते बच्चे को खिलाकर उसे तोते की तरह बोलने का टोटका तो हमारे समाज का वह दर्पण है जिसे हम अपने समाज , राजनीति , संचार माध्यम की वाचलता / मुखरता के बाहुल्य में रोज देख पाते हैं और मन ही मन सोचते हैं काश इन सबको तोते की जूठी मिर्च इनके माता-पिता ने न खिलाई होती .


वे माता -पिता जिनके बुढ़ापें की लाठी विदेश जा कर बस गई है . वे अपने आँगन में चहचहाने के लिए पैराकीट  रंगबिरंगे तोते पाल लेते हैं . जिन्हें जीवन में रंग कम लगते हैं वो सोलोमन द्वीप के बहुरंगी एक्लेक्टस तोते पाल लेते हैं . देशी पुत्रों को जब मातापिता को छोड़ विदेश रहने में अपनी अंतरात्मा के चुप्पी साध लेने पर उनके माता पिता  मनुष्य की किसी भी भाषा में बोलने के अलावा बिल्ली के बोलने , कुत्ते के भौंकने , और बच्चे के रोने की आवाज़ निकालने की क्षमता रखने वाले ये तोते अपने मन और जीवन में बसे सन्नाटे को तोडने में सहायक तोते पाल लेते हैं , और ये तोते कितने सहायक होते हैं यह तो वो ही बता सकता है जिसे इनका सानिध्य प्राप्त हुआ है . गफ्फार अहमद साहब का तोता अंग्रेजी बोलता है और उर्दू में अस्सलाम अलयकुम भी बोलता है .


तोते वैसे भी आपके बच्चों से कितना मेल खाते हैं . वो उन्ही की तरह स्नान करते हैं . जिनके बच्चे शरीर पर पानी डाल कर बदन भिगाने को स्नान कहते हैं, उन्हें माता उलाहने में कहतीं हैं हो गया तुम्हारा "तोता स्नान " . और फिर वही तोते हाथ से उड़ जाते हैं . जब वो अपनी पसंद के लड़के या लड़की से शादी कर लेते हैं , या किसी दूर प्रान्त या देश में जीविका अर्जन करने चले जाते हैं . ऐसा नहीं की माँ -बाप इन सपनो से अपने को अलग रक्खे हुए हैं या इन सपनो के खिलाफ हैं . सपनों से समझौते किये उन्हें  दुःख इस बात का नहीं है , उन्हें तो यह सालता है की इन सपनों में वे कहीं प्रवेश ही नहीं करते हैं .


पदमावती के पास सिंहल द्वीप में हीरामन तोता था . नाराज पिता गन्धर्वसेन उसे मार देने पर उद्यत हो गए और वह उसकी अनुनय -विनय के कारण बच गया था . जब वह मानसरोदक गई हुई थी तो तोता खटके के कारण उड़ गया . तोते को प्राणों से चाहने वाली पदमावती बहुत दुखी हुई - कवि जायसी ने उस दुःख का वर्णन करते हुए लिखा था  - सुआ जो उत्तर देत हा पूँछा , उड़ी गा पिंजर न बोले छूँछा |  माता -पिता भी अपने सोने के पिंज़रे दरों दीवार से यही पूछते हैं , पर खाली छूँछा न पद्मावती से कुछ बोला न उनसे बोलेगा .


हिन्दी सिनेमा में एक डाल पर तोता बोले -एक डाल पर मैना  , तोता -मैना की कहानी पुरानी हो गई जैसे गीतों के माध्यम से तोता मौजूद है . अब मैं इन बूढ़े तोतों को क्या सिखाऊंगा .


रघुवीर सहाय होता तो आपको बोलता -


अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?
होता,'फिर' क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम|

आशा है जब अगली बार जब आपकी तोताराम या तोते जैसी नाक वाले किसी व्यक्ति से मुलाकात होगी तो उसे कुछ श्रद्धा और आदर से देखेंगे .
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