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14 सितंबर 2012

सरकारी हिन्दी की दूकान

दुकानें दो तरह की होती हैं . एक तो सरकारी राशन की दुकानों जैसी . वहाँ हर तरह का माल मिलता है जैसा वहीं मिल सकता है . राशन का चावल राशन जैसा , राशन की चीनी राशन जैसी , राशन का कपडा भी राशन जैसा . "राशन " खुद एक ब्राण्ड हो जाता है . आप वो चावल ले भी आयें , तो पका नहीं पाएंगे , पका लिया तो खा नहीं पाएंगे . आपको वो पका हुआ चावल उसी दुकान पर लौटा देना होगा . और दुकानदार से सुनना भी होगा - हम तो पहले ही कह रहे थे , आप रहने दें , आप नहीं खा पाएंगे , नहीं सुना . अब देखिए पका पकाया वापस लाना पड़ा न . अगर आप खा भी लेते तो मेरा दावा है पचा नहीं पाते . राशन का चावल है . अलग किस्म का पेट चाहिये इसके लिए .ये चावल अलग किस्म की आबो-हवा में पनपते हैं . इन्हें अलग किस्म की मिट्टी में उगाया जाता है . इसे राशन के लिए खरीदा और बेचा जाता है . इसे सिर्फ नेता , अफसर , ठेकेदार खा और पचा सकते हैं .

वैसे ही सरकारी हिन्दी की दुकान है . ये हिन्दी वहीं मिलती है . वही इसके उत्पादक हैं , विक्रेता हैं , और ग्राहक भी . आप इसे पढ़ नहीं सकते , पढ़ लें तो समझ नहीं सकते , समझ लें तो किसी और को समझा नहीं सकते . और अगर समझा लिए तो मेरा दावा है आप आदमी हो ही नहीं सकते .

आपके अंदर सरकारी बाबू , सरकारी अफसर , सरकारी खबरनवीस , सरकारी कवि, सरकारी साहित्यकार एक न एक अदद  छुपा है  .   
आप आइये आप को हम ही छाप सकते हैं , हम ही वितरित करेंगे , हम ही खरीदेंगे , हम ही पढेंगे , हम ही परिचर्चा करेंगे , समीक्षा लिखेंगे ,, और पुरस्कृत भी करेंगे . आप की महान रचना पाठ्यक्रम के योग्य समझी जायेगी . हम ही हिन्दी दिवस पर आपकी हर रचना को अलग-अलग पुरस्कारों , शाल - दुशाले , श्रीफल से नवाजेंगे . आप को अकादमी का अध्यक्ष बनायेंगे .  आपसे भाषण करवाएंगे , आपसे लिखवायेंगे , आपको सुनेंगे , आपसे ताली बजवायेंगे . 

पर हिन्दी का क्या होगा ? क्या होना है ? जो राशन का चावल नहीं पचा सकते भूखे तो नहीं मर रहे . बाजार से खरीद कर खा रहे हैं न ? अगर पैसे होंगे तो खरीदेगा , खायेगा , जिंदा रहेगा . नहीं ? नहीं तो क्या होगा मर जाएगा . आप भी कहाँ कहाँ की चिंता करते हैं . मॉल खुलने से मोहल्ले का दुकानदार मर तो नहीं गया ? बिक्री कम हुई होगी . वो फिर भी पेट भरने को कमा तो ले ही रहा है . अब देखिए जब मॉल नहीं थे तो  तो आपको डांङी मार कर माल कौन देता था ? नकली माल कौन देता था ? ज्यादा छपे भाव पर कौन देता था ? पुराना माल कौन देता था ? गन्दा , सड़ा माल कौन चिपका देता था ? तो अब आप उसकी चिंता में क्यूँ दुबरा रहे हैं ?

31 जनवरी 2012

बन्दर

एक महोदय डार्विन हुए थे , उन्होंने एक सिद्धांत दिया था , मनुष्य के पूर्वज बन्दर थे . या बंदरों से मनुष्य प्रजाति का विकास हुआ . पर कुछ बुद्धिमान मनुष्य तर्क देते हैं तो फिर अभी जो बन्दर हैं , वो क्या है ? तो कुछ ने मजाक में प्रति-तर्क दिया वो तो कुछ मनुष्य अवनति होकर बन्दर हो गये हैं . मगर सुना है डार्विन के सिद्धांत को चर्च ने अस्वीकार दिया था . काश विज्ञान ने भी त्याग दिया होता . बच्चे बिना प्रयोग के इस विज्ञान-पाठ से तो बच जाते . यह बात किसी उपलब्ध अकाट्य तथ्य पर अवलंबित हैं यह भी कोई नहीं बताता . मुझे व्यक्तिगत तौर से इस बात से कोई परहेज नहीं है . हिंदू हूँ तो किसी पूर्व जन्म में बन्दर भी रहा ही होऊंगा. दिक्कत तो जिन्हें पूर्वजन्म में विश्वास नहीं है , उन्हें है . वैसे इस ज़न्म में भी बड़े बुज़ुर्ग कई बार बन्दर जैसे व्यवहार का उलाहना दे चुके हैं . आप कई लोगों के बारे में मानते हैं की वो मनुष्य-योनि में दरअसल बन्दर हैं ? अब मैं क्या बोलूं ? आप बड़े-बुजुर्ग हैं . आपने दुनिया देखी है . आप मानते है तो कोई वजह होगी .  

खैर डार्विन की इस बात पर सारे प्रतिरोध मनुष्य समाज के आये हैं , बन्दर प्रजाति ने विरोध में कोई मोर्चा निकाला हो इस बात का कोई समाचार नहीं आया है . न ही कभी उनके द्वारा बंद , जुलूस , बहिष्कार , हड़ताल , ज्ञापन देने का उल्लेख किसी समाचार पत्र में देखा कभी ? न बन्दरों ने  अपने पूर्व पुरुषों के अपमान पर कभी किसी चर्च, मस्जिद , मंदिर पर हमला किया , न कोई किताब जलायी , न किसी के मुंह पर कालिख पोती.

मनुष्य जाति जिसे सभ्यता के उन्नति का इतिहास बखानती है , और प्रगति के नए-नए सोपानों पर अपने  चढ़ने का दावा करती है , उसके ठीक विपरीत जिन्हें हम बन्दर कहते हैं वो विरोध में ज्यादा से ज्यादा खींसे निपोर देंगे , थोड़ा उछल-कूद लेंगे . बन्दर आपके सूखते हुए कपड़े उठा ले जाएँगे, या अगर आप ने खिड़की खुली छोड़ दी हो तो आपके घर में घुस कर आटा बिखेर देंगे , और कुछ नहीं कर पाए तो आपकी छत ( गौर किजीये छाती नहीं लिखा ) पर कूद लेंगे जोर जोर से . हमारी आपकी तरह विकास किया होता तो मुंह से गालियों की बौछार करते , इससे भी शांति नहीं मिलती तो 
लात-घूंसों, लाठियों , छूरों,  से मामला सुलझाने की कोशिश करते , और इससे भी बात नहीं बनती तो गोलियों की बौछार करते , और इसके बाद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सभ्यता से बैठकर झंझट निपटाने के लिए मिसाइलें और परमाणु बम तो है हीँ . 

हमारे हिन्दी सिनेमा के हीरो तो पेड़ों पर भले ही न उछलकूद मचाएं , उनके आसपास जरूर उछलकूद मचा लेते हैं . हालीवुड वालों ने जरूर एक सिनेमा बनाया था ,इन्सटिंक्ट, जिसमे एन्थोनी हॉपकिंस के द्वारा गोरिल्लाओं के साथ जंगल में रहने के कुछ दृश्यों द्वारा मनुष्यों और बन्दरों के व्यवहार पर टिपण्णी है .

हमने  अंग्रेज़ी भाषा के साहित्य का ज्यादा अध्ययन नहीं किया है . परन्तु हिन्दी भाषा का कुछ सीमित अध्ययन किया है . इसमे बन्दर के हाथ उस्तरा , बन्दर-बाँट , वानर-सेना ,लंगूर से शादी की धमकी या आश्वासन , हूर के साथ लंगूर जैसे मुहावरे या जुमले प्रयोग में लाये जाते हैं . इसमें से प्रथम दो लोकोक्तियाँ तो हमारी शैशवकाल पर ठहरी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को चलाने में काफी सहायक सिद्ध हो रही हैं . और जब तरह-तरह की नयी वानर सेनाएँ लंका के बजाय अयोध्या पर ही चढ़ बैठी हैं , और ये वानर सेनाएँ  वैलन्टाइन दिवस , सिनेमा प्रदर्शन , किताब प्रकाशन , चित्रकला प्रदर्शनी , प्रणय-निवेदन में व्यस्त प्रेमी-युगलों के विरुद्ध जो बागोँ में हमारी प्राचीन परंपराओं के अनुरूप वसंत-उत्सव मना रहे होते हैं पर चढ़ाई करती हैं . जो वानर सेना  पत्थरों से समुद्र पर पुल बनाने के लिए विख्यात रही है , अब वही वानर सेना पत्थरों के द्वारा समाज के सारे पुलों को तोडने के लिए कुख्यात होती जा रही है .  

अंग्रेज़ी भाषा में अलग अलग प्रजाति के बन्दरों के लिए अलग-अलग शब्द उपलब्ध हैं मसलन - चिम्पांजी, गोरिल्ला , मंकी , लेमूर, ओरांगउटान  इत्यादि . घबराइए मत ये सब अपनी कान्वेंट में पढ़ने वाली बिटिया के नर्सरी की किताब से लिए हैं . हमारे यहाँ तो हनुमान , सुग्रीव , बाली , मयंद , अंगद रामायण के पात्र हैं और इन नामों को राम के प्रिय के रूप में पूज्य भी माना जाता है , परन्तु रामलीला वालों ने , फिर सिनेमा वालों ने , और फिर दूरदर्शन वालों ने इनकी विचित्र वेशभूषा और श्रृंगार से क्या हासिल किया या करना चाहते थे यह तो वही जाने . वैसे विश्वमोहिनी कथा में विष्णु ने नारद का श्रृंगार करने के लिए वानर-मुख क्यों चुना इसका गूढ़ अर्थ तो आपको कथावाचक ही बता सकते हैं . परन्तु इसका परिणाम यह हुआ की पूरी रामायण की नीवं इस एक चौपाई में मिल जायेगी -

          "कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥
            मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥
"

नारद उवाच - "तुमने मेरा रूप बंदर का बना दिया था, इससे बंदर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। तुमने मेरा बड़ा अहित किया है, इससे तुम भी स्त्री के वियोग में दुःखी होगे "
मुझे लगता है आदिवासियों , जनजातियों की कोटा राजनीति की नीव यहीं पड़ गयी थी जिससे हमारी रामराज्य नीति अभी तक जूझ रही है . आप ठीक कह रहे हैं यह दूर की कौड़ी है . परन्तु मेरा मौलिक विचार है की विष्णु नारद का मजाक नहीं उड़ा रहे थे , बल्कि  कपि-रूप ज्ञान स्वरुप है जिसे विश्वमोहिनी माया नहीं छल सकती , वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के पास ही एक हनुमान मंदिर भी है . मालूम नहीं जो काशी जा कर विश्वनाथ के दर्शन करते हैं , वो ज्ञानवापी स्थित दक्षिणमुखी हनुमान के दर्शन करते हैं या अथवा नहीं . 

परन्तु  सारे ब्रह्मचारी युवक , ठीक है , ठीक है , ब्रह्मचारी आयु वाले युवक, हनुमान भक्त होते हैं . हर अखाड़े में आपको हनुमान की प्रतिमा या तस्वीर ज़रूर मिल जायेगी . वैसे क्रिकेट की विश्वमोहिनी सूरत में फंसे कितने नारद यह जानते हैं की  गुरु हनुमान को द्रोणाचार्य और पद्मश्री दोनों सम्मानों से नवाज़ा गया था . और जिनके आठ शिष्य  भी सर्वोच्च खेल सम्मान अर्जुन पुरस्कार प्राप्त हैं . अब अगर गुरु हनुमान ने आपको कोई दाँव नहीं भी सीखाया हो , परन्तु अगर अँधेरे से आपको  डर लगता हो तो हनुमान चालीसा का पाठ मुंह-जबानी याद कर लें , रात-बिरात अँधेरे रास्ते से गुजरने में सहायता होगी . लड़की हैं ? तो क्या हुआ ? वैसे भी हमारे पिता के मित्र व्यास जी कहा करते थे देवताओं की पूजा देवियों को और देवियों की पूजा देवताओं को करनी चाहिए .


जिस देश में भरोसा नहीं की ज़रूरत पड़ने पर क़ानून आपकी मदद को आ पायेगा , और आया भी तो हिन्दी सिनेमा की तरह समय पर तो आएगा नहीं , ऐसे में हनुमान जी को आजमाने में क्या हर्ज है ? आप इसे मेरा अंधविश्वास भी कह सकते हैं . विश्वास अंधा है तो क्यों आपत्ति करते हैं , क़ानून अंधा है तो किसी को आपत्ति तो होती नहीं . वह देवी है इसलिए क्या ? 

28 दिसंबर 2011

त्वरितर : नयी ज़मीन की तलाश

त्वरितर  पर बहुत दिनों से सक्रिय हूँ . बहुत से और लोग भी हैं साथ में . ऐसे जो नागरी में त्वरित करते हैं और कुछ लोग रोमन हिन्दी में . और कुछ जब जैसा अच्छा लगे . सुविधा अनुसार .

हिन्दी में ब्लॉगिंग पर बहुत दिनों से हाथ आजमा रहा था . फिर त्वरितर पर क्यों ? ब्लॉग पर कुछ लिखो , फिर लोग जो पढ़ने वाले हैं वो भी या तो खुद ब्लॉग लिखते हैं या लिखना चाहते हैं . प्रतिक्रिया और टिप्पणी ज्यादातर बहत अच्छा लिखा है या कुछ उससे मिलता जुलता .

त्वरितर पर उससे ज्यादा कुछ होता है ? नहीं . ब्लॉग को ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिये मित्र आमंत्रण भी देते हैं टिप्पणी के साथ , हमारे ब्लॉग पर आइये . हमने आपकी पीठ खुजाई है , आप हमारी खुजा जाइए की तर्ज़ पर .

इसके साथ फीड है , हिंदी ब्लॉग के ऐग्रीगेटर (समन्वयक ) हैं जैसे हमारीवाणी , ब्लॉगअड्डा, नेटवर्कड ब्लॉग, चिटठाजगत , ब्लॉगजनता , ब्लॉगप्रहरी ईत्यादी. इसी के साथ जखीरा , अनुभूति , कबाडखाना जैसे ब्लॉग हैं जिसके कई लेखक हैं . इसके साथ कुछ और प्रयास हैं जैसे आज की हलचल , वटवृक्ष आदि जो अन्य ब्लॉग लेखन को अपने यहाँ रोज प्रस्तुत करते हैं . कुछ ने पाठकों की खोज में फेसबुक पर भी पृष्ठ बना लिए हैं .

फिर इसमें त्वरितर जो की महज  १४० टंकको की समरभूमि है पर क्या जोर आजमाइश की  जा सकती है . दरअसल हिन्दी के लेखकों या कवियों की समस्या पाठक है . पाठक को पठन सामग्री नहीं मिल रही . पत्र-पत्रिकाएं प्रायः नगण्य उपलब्ध है . पढ़ना पढ़ाना कम हो रहा है . लेखक और कवि सुपरिचित नाम नहीं रहे . हिन्दी की पत्रिकाएं अब या तो बहनजी मार्का रह गयी हैं या मनोहर , मधुर कहानियों की तरह या अंगरेजी में प्रकाशित पत्रिकाओं की चचेरी बहन जैसी . जो घर में रहती है साथ , हाँ ये भी है की तरह .

और इसी में हमारी इती श्री हो जाती है . हम लिख तो रहे हैं पर पाठक वर्ग खोता जा रहा है . मैंने पूर्व लेख में लिखा था की हमारा हिंदी पढने वालों के साथ लिखने वालों का दायित्व बनता है पाठक वर्ग तक श्रेष्ठ हिन्दी साहित्य की झलक ले जाना . बड़ी बड़ी कम्पनियां अपने उत्पाद का मुफ्त सैम्पल बांटी फिरती हैं . ताकि हम और आप फिर जब बाज़ार में जाएँ तो नाम याद रक्खें और फिर माल खरीद भी लायें . लिखने वाले अगर चाहते हैं की पाठक उन्हें पढ़ें तो उन्हें पाठक भी तैयार करने पड़ेंगे . और इसके लिए आपको सिर्फ अपना लिखा नहीं परन्तु आप जिस परंपरा के हैं उस परंपरा को भी आप को पाठकों तक ले जाना पडेगा .

इसीलिए आह्वान किया था की समय की कमी है , लोग बहुत लम्बा एक साथ नहीं पढ़   पाते , सब समय संगणक के सामने नहीं बैठ सकते , अतएव जब मोबाइल फ़ोन जो लोगों के पास करोड़ों में हैं . और जिस पर जहाँ चाहें जब चाहें त्वरितर पर लोग सक्रिय हैं उसका इस्तेमाल इसलिए किया जाए .

बहुत से ब्लॉगमित्र नहीं लेखक , मित्र कैसे कह सकता हूँ वो मुझ अकिंचन को जानते तक नहीं अपना खाता त्वरितर पर खोल तो लिए पर उसे समझ नहीं पाए और निष्क्रिय हैं . सतीश पंचम जी हैं , प्रतिभा कटियार जी  हैं . और कुछ हैं जो वहां सिर्फ अपने या अन्य ब्लॉग के लिंक डाल कर समीर लाल उड़नतश्तरी की तरह फुर्र हो जाते हैं . यह काम तो ब्लोगवाणी सरीखे समन्वयक अच्छे से कर रहे है.

कौतुहल होना चाहिए , कौतुहल जगाना चाहिए , जिज्ञासा उठे , इच्छा जगे - क्या है ? तब तो सार्थकता है .

त्वरितर का उपयोग कैसे हो , यह बहुत कठिन नहीं है . अविनाश वाचस्पति तो बहुत धुरंधर हैं , किसी को घास ही नहीं डालेंगे . पर संतोष त्रिवेदी हैं , भाई नवीन चतुर्वेदी हैं , रवीश जी हैं , अविनाश हैं , ब्रह्मात्म अजय हैं , अलोक रंजन हैं अर्कजेश हैं प्रवीण त्रिवेदी हैं सब धीरे धीरे हिंदी के दर्शन त्वरितर पर करा देते हैं . वंदना जी हैं . सब मिलजुल कर सहयोग कर सकते हैं . त्वरित का सहायता पृष्ठ भी है . जिसका लिंक पूर्व में मकडजाल वाले लेख के नीचे टिप्पणी में दिया था . आंग्ल भाषा में है . अगर दुविधा न हो तो उपयोग सहज है . वैसे भी जिसने ब्लॉग पर कारस्तानी कर ली वह हाथपाँव पटके तो इसमें भी सिद्धहस्त हो जायेगा .

मकडजाल पर पूर्व में लिखा था की त्वरितर का उपयोग कैसे हो . इस बारे में कुछ उदहारण एकत्रित किये हैं . जैसे किसी ने पाने त्वरितर पर अनुभव को लेकर एक कहानी लिखी . वह भी आंग्लभाषा में हैं पर उपयोगी होंगी . आप सब बुद्धिजीवी हैं . आप के लिए सहज और सरल है अपने लिए रत्न चुन लेना .

फिर कुछ और उदाहरण हिन्दी कविता , ग़ज़ल , त्वरित टिप्पणी इत्यादि की भी एकत्र की हैं . आज फिर एक कहानी मिली है जो किसी ने अपने  त्वरितर  पर एक वर्ष जन्मदिन मनाने को लेकर लिखी है .

यहाँ समाचार हैं , प्रेमकहानियाँ  भी हैं . खेल है , जीवन के सब रंग हैं , सब रस हैं,  सब भावनाएं हैं . आपको कई कवितायें , कई शेर , कई कहानियाँ मिल जायेंगी . मुक्तिबोध जी के शब्दों के साथ इस प्रकरण को यहीं समाप्त करना चाहता हूँ , ऊपर उल्लेखित सामग्री आप के साथ आगे बाटूंगा . तब तक आप मुक्तिबोध जी को पढ़ लें :

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए !!

एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं
व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने
सब सच्चे लगते हैं
अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है
मैं कुछ गहरे मे उतरना चाहता हूँ
जाने क्या मिल जाए !!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य-पीड़ा है
पलभर मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ
इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ
अजीब है जिंदगी !!
बेवकूफ बनने की खतिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ
और यह देख-देख बड़ा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ
हृदय में मेरे ही
प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण,मत्त हुआ जाता है
कि जगत्..... स्वायत्त हुआ जाता है।

कहानियाँ लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहाँ जरा खड़े होकर
बातें कुछ करता हूँ
......उपन्यास मिल जाते।

दुख की कथाएँ, तरह तरह की शिकायतें
अहंकार विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
जमाने के जानदार सूरे व आयतें
सुनने को मिलती हैं !

कविताएँ मुसकरा लाग- डाँट करती हैं
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियां
श्रद्धाएँ चढ़ी हैं !!

घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप- चित्र
लेकर मैं घर पर जब लौटता.....
उपमाएँ द्वार पर आते ही कहती हैं कि
सौ बरस और तुम्हें
जीना ही चाहिए।
घर पर भी,पग-पग पर चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए रोज मिलती है सौ राहें
शाखाएँ-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं
नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय
रोज-रोज मिलते हैं....
और,मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन् यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है
और वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है !!
                                      

12 दिसंबर 2011

कुम्भकर्ण आप अब भी कहेंगे एक काल्पनिक पात्र है!!

"मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह,  ज़िंदगी ने जब छुआ तब फासला रख कर छुआ" - दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ पिछले शुक्रवार को फिर याद हो आयीं . कलकत्ता के एक अस्पताल में रात आग लग गयी . और फिर उसके बाद जो हुआ वह आप सब की स्मृति में ज्यादा पुराना नहीं है . और दुखद स्मृतियाँ फिर से याद दिलाने की ज़रुरत नहीं है . बशीर बद्र की पंक्तियाँ हैं - " मेरे दिल की राख कुरेद मत , उसे मुस्कुरा के हवा न दे". और बात ऐसी दुर्घटनाओं के कारणों की तह में जाने का इरादा भी नहीं है . इसे लिखने का कारण भी यह नहीं है . चलिए आपको अपने और आपके और पुराने भूतकाल में ले चलता हूँ . स्मृतियों की तह खोलते है .

बात १९७९ की है अगस्त ११ , तारीख याद नहीं थी (यहाँ से ली है मोरबी का बाँध टूटा . ) पर समय का अंदाज़ा था . कक्षा ११ वी के छात्र थे . हमारे कुछ अध्यापक हमें मोरबी और स्वामी दयानन्द सरस्वती के जन्मस्थान की यात्रा पर ले के गये थे . मोरबी इसलिए याद था - की वहाँ नदी के ऊपर रस्सियों का पुल बना था और जिसपर पैदल पार हुआ जाता था . लक्ष्मण झूला जैसा ? - हाँ वही हमारे गुरुज़नों ने बताया था . उस पुल पर खड़े होकर जब नीचे नदी कि ओर झाँका तो डर  लगा , यहाँ से गिर गये तो? नदी का पानी कम से कम १०० फीट नीचे था . और सुना जब बाँध टूटा तो पानी उसके ऊपर से बहा और उसे बहा कर ले गया . यह इसलिए लिख रहा हूँ जिससे आपको उस दूर्घटना की भयावहता का अंदाज़ा हो जाए . ऊपर दिए लिंक में १२००० लोगों के मरने की खबर है . पर कितने लोगों को याद है ? आप का दोष नहीं है . मुझे भी क्यों याद रहता , अगर ऊपर लिखी स्मृतियाँ नहीं जुडी होतीं . उस दुर्घटना के वक्त श्रीमती गाँधी प्रधान मंत्री नहीं रही थीं . एक दिन अपने दोस्त परवीन सरीन की ढेबर रोड ,राजकोट स्थित दूकान पर था . सामने ही घंटाघर जैसा कुछ था , जहाँ दुर्घटना से पीड़ीतों को ठहराया गया था , और परंपरागत तरीके से वह उन्हें देखने और उनसे मिलने आयीं थीं . तब पहली बार उन्हें बहुत करीब से पास खड़े होकर देखा था . बहुत करीब से . तब भी सत्ता पक्ष के लोग देखने आये थे याद नहीं . जिनके पास उस वक्त का अखबार हो देख लें . और नहीं तो सत्तापक्ष ऐसी परिस्थितियों में कैसे व्यवहार कर सकता है , करता आया है , अंदाज़ा लगा लें . पर स्मृती इस बात की नहीं है . ऊपर की तारीख पर गौर करें . पुनः . इसके कुछ दिन बाद ही पन्द्रह अगस्त था . हम केंद्रीय विद्यालय में पढते थे . पन्द्रह अगस्त तो मनाना  ही होता था . ऐसी दुर्घटना के बावजूद . जिन्हें मालूम न हो बता देना उचित होगा की केंद्रीय विद्यालय केंद्रीय सरकार द्वारा केंद्रीय कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए खोले गये हैं . ताकि स्थानांतरण के कारण वे बच्चों के स्कूल में भर्ती की किल्लत से बच सकें . और नए -नए पाठ्यक्रमों की जादूगरी के मायाजाल से भी . कार्यक्रमों में जैसा होता है - झंडारोहण, बच्चों द्वारा कुछ कार्यक्रम पेश किये जाते हैं . और उसके बाद प्रधानाध्यापक का भाषण . हमारे प्रधानाध्यापक श्री आनंद कुमार वर्मा साहब थे . सरकारी मुलाजिम थे , जाहिर है . पर बच्चों के लिए तो अध्यापक . अध्यापक जो बोलते हैं , और जो करते हैं , वह बच्चों के मनःपटल पर बहुत गहरी स्मृति छोड़ जाती है . अब जब उन्होंने भाषण दिया तो याद कर अब भी रोमांच हो जाता है . कारण है . पन्द्रह अगस्त को परंपरा है , दिल्ली के लाल किले पर झंडा फहराया जाता है . प्रधानमंत्री का भाषण होता है . भाषण कुछ भी हो . प्रधानमंत्री कोई भी हो . पर हमारे वर्मा सर ने जो कहा , वह अविस्मरणीय है ." इतने लोगों की मृत्यु हो गयी , और प्रधानमंत्री के भाषण में एक उल्लेख तक नहीं , धिक्कार है . " आज का ज़माना होता तो उस सरकारी मुलाजिम की नौकरी चली जाती .अदना सा मास्टर प्रधानमंत्री को धिक्कारे ? खैर छोडिये , नाहक आज का ज़िक्र है - आज कौन ऐसा साहस करेगा . सच बोलना आसान है , अगर सच बोलने का हौसला हो . उन्होंने अपने उस एक भाषण से अपने अनेक छात्रों में वो हौसला पैदा किया था , इसमें मुझे  कोई संदेह नहीं . पर शब्दों से ज्यादा , उस शांत मुंह पर इतना गुस्सा और वह उनका तमतमाया हुआ चेहरा , नहीं भूलता .आप सबको तो मोरबी याद भी नहीं . नहीं है न ?

अब आपको १९८४ के दिसंबर की तारीख ३ की रात की भी याद दिला दूँ . शहर भोपाल  . स्थानांतरण होकर भोपाल आ गया था . स्नातक की परीक्षा पास कर ली थी . और भीषण गैस दुर्घटना घट गयी . हर साल उसकी बरसी मनाई जाती है . स्मृती को मरने नहीं दिया जा रहा . अब यह भी पंद्रह अगस्त जैसा हो गया है . मेरे ही ब्लॉग पर इस बारे में पहले भी लिख चुका हूँ . फिर आपको मरने वालों की संख्या नहीं गिनवाने जा रहा . मरने वाले हज़ारों में थे . फिर . और ये रात के अँधेरे में आयी दबे पाँव मौत की , कोई पदचाप नहीं . चीते की तरह शातिर . और शायद टाली जा सकने वाली . मानव निर्मित .

इसके अलावा और भी दुर्घटनाएं हैं - प्राकृतिक जैसे पूरी और भुवनेश्वर घूम के आये और वहां भयंकर तूफ़ान आया , बहुत लोग मरे . टैक्सी वाले से झगड़ा हुआ था , सोचा ऐसे ही लोगों को सजा मिलती है . पर बाकी क्यों ? मद्रास  घूम कर आया , और दो महीने बाद देखता हूँ जिस मरीना बीच के पास वाली सड़क से बहुत दूर चलने के बाद भी समुद्र नहीं देख पाया , माताजी साथ थी और रेत  में चलने में असुविधा हो रही थी और अँधेरा भी था वापस आ गए थे . उस सड़क पर कारें पानी में कागज़ की नाव की तरह हिचकोले खा रही थीं .  फिर बंगाल का 'आईला ' तूफ़ान आया . पर प्राकृतिक विपदाएं तो हमारे हाथों के बाहर की बात है . इनका सिर्फ उल्लेख . की चीता हमारी तलाश में घूम रहा है , जाने कब कहाँ दबोच ले .

पर और दुर्घटनाएं ? जब इनके बारे में सोचता हूँ . तब . लगता है हमारे यहाँ आदमी की जान की कोई कीमत ही नहीं . हम किस मुल्क में पैदा हुए हैं ? जिन चीज़ों को तवज्जो दिया जाना चाहिए उन्हें हम भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं . जहाँ ज़रा भी समझौता नहीं करना चाहिए हम सबसे पहले उन्ही चीज़ों पे समझौता  करते हैं . जिन बातों को सबसे ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए , वह हमारी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे के पायदान पर खड़ी मिलती है . जिस सरकार को स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए वह सरकारी और निजी हवाई कंपनियों के स्वास्थ्य को लेकर दुबली है . हमारे महानगरों में बड़े बड़े विशालकाय मीनार और इमारते बन रही हैं . हर एक इंच ज़मीन पर कब्ज़ा हो रहा है . कोई दूकान बना रहा है . कोई मॉल, कोई तरणताल , कोई क्लब , कोई तेज़ गाड़ियों की दौड़ का ट्रैक . व्यवसाईंकरण  की दौड़ में सुरक्षा के लिए छोड़ने वाली जगहें भी व्यापारीकरण की बली चढ़ गयीं हैं . दिल्ली का उपहार सिनेमाघर हो या कोलकाता का आमरी अस्पताल . यह सब इसी कहानी के किरदार हैं . यहाँ जगह भी आदमी की जान पर भारी पड़ रही है . हम सब अपनी छोटी छोटी जरूरतों में इतने मसरूफ हैं की बड़ी से बड़ी दुर्घटना भी हमें नहीं झंझोड़ पाती . कुम्भकर्ण आप अब भी कहेंगे एक काल्पनिक पात्र है . नहीं वो हमारे अन्दर छुपा है . ज़िंदगी जब हमें फासले से ही छू रही है , तब क्या बुरा है मौत हमें चीते की तरह धर दबोचे .

7 दिसंबर 2011

त्वरितर : सामाजिक मकड़जाल और हिंदी चिट्ठाकार

हिंदी वालों के लिए जगह सिमटती जा रही है . यह नही की हिंदी बोलने वालों की संख्या में कमी आयी है या हिंदी का क्षेत्र कम हुआ है. यह जरूर है की पिछले कुछ दशक में जहाँ भूगोलीकरण में बाज़ार बढ़ा है वहीं हिंदी का बाज़ार कम हुआ है .

पहले हिंदी की पत्रिकाएं यात्रा पर निकलिये मिल जाया करती थीं , अब पत्रिकायें कम उपलब्ध है . बड़े प्रकाशनों ने तो मुंह मोड ही लिया है . सारिका , धर्मयुग , कादम्बिनी , रविवार सरीखी पत्रिकायें अब स्मृति की वस्तु है . कई लोग अब भी अपने स्तर पर पत्रिकायें निकाल रहे हैं . पहले प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों के लिए अखबार खरीद कर पढ़े जाते थे . अब नहीं . ऐसा नही की हिन्दी का लेखक कम लिख रहा है . कविसम्मेलन भी कम देखे जाते हैं . नये साधन आ गए . और विगत दिनों हिंदी में चिट्ठा लिखने की सक्रियता बढ़ी है . कई अच्छे चिट्ठे आये हैं . और नये नये प्रयोग से हिन्दी का प्रसार हो रहा है .

हिंदी के लिए चिट्ठा से आगे की ज़मीन तलाशने का प्रयोग भी हो रहा है . विगत कुछ दिनों से मैं भी रवीश जी द्वारा निष्पादित त्वरितर (त्वरित + र ) पर सक्रिय हूँ . और सोचा अपने अनुभव आपसे बाँटू.

यहाँ , की शब्दावली पर ध्यान देंना ज़रूरी है .

आपके घटनापटल पर त्वरित वही आता है - जो आपके फॉलोअर त्वरित लिख रहे होते है. अगर आप रवीश जी को सीधे कुछ लिखना चाहें , वह आपके फॉलोअर न भी हों तो आप @ravishndtv लिखकर जो भी इसके बाद लिखें वह उनतक पहुँच जाएगा .

और आप को उनकी लिखी बात अच्छी लगी और आप उसे अपने फॉलोअर तक पहुँचाना चाहें तो आप उसे पुनः त्वरितर करें .

इस तरह आप संवाद की एक श्रृंखला स्थापित कर रहे होते है .

एक समस्या है . शेर और दोहे तो त्वरितर की शब्दसीमा ( १४० उत्कीर्ण ) में आ जायेंगे . बड़ी कविता एक समस्या है . इसका तुरंत हल तो यह है की हम इसे छोटे छोटे पुलिंदों में त्वरितर करें . हर त्वरितर पर क्रम से संख्या दे दें . और त्वरितर पर '#' इस चिन्ह का उपयोग कर सारे एक सूत्र में बांधे जा सकते है . पर ध्यान देने की बात है , अगर '#' इसका इस्तेमाल करें तो अंग्रेज़ी के वर्णों का इस्तेमाल करें . वैसे ही जैसे हिंदी में लिखे पत्रों पर पता अंगरेजी वर्णों में लिखा जाता है , ताकि किसी अन्य भाषा के व्यक्ति को भी उसे पहुंचाने में असुविधा न हो .

अगर आप ऐसा कोई सन्देश देना चाहते हैं - जो आपके फॉलोअर विशेष को ही मिले तो आप उसे "डीएम" याने सीधे सन्देश के माध्यम से दें . पर ध्यान रहे उसे डीएम के बाहर डीएम दिया है सूचित कर दें . ज्यादातर त्वरितर वाले सीधे सन्देश नहीं खोलकर देखते .

आप एक ही "सुप्रभात " या "शुभरात्री " @ का इस्तेमाल कर कई लोगों को दे सकते हैं .त्वरितर पर इसे ज़िक्र या उल्लेख कहते हैं . सन्देश बिना किसी के ज़िक्र या उल्लेख के भी भेजे जाते हैं . और अगर उस पर तवज्जो देना है तो अन्य अवश्य देंगे .

यह तो हुई शुरुआत . इसके और उपयोग के लिए प्रयोग जारी रहना चाहिए .
अब यहाँ प्रारंभिक उपयोग से हटकर पर इससे जुडी कुछ और बातों पर आपका ध्यान चाहूँगा .

हर व्यक्ति का कोई ना कोई प्रिय लेखक या कवि होता है . अगर कुछ बंधू कोशिश करें तो उस कवि या लेखक के नाम से एक खाता या हत्था खोल लें . और उनकी चुनिन्दा पंक्तियाँ उसके द्वारा अन्य लोगों तक पहुंचाएं .

मैंने भी अपना हत्था पहले खोला था . पर सक्रिय नहीं था . ब्लॉग पर कुछ लिखो और फिर बैठकर इन्तेजार करो . किसी ने पढ़ा या नहीं . चूँकि ब्लॉग पर कोई सारा दिन बैठा नहीं रहता इसलिए इसपर विचार विनिमय संवादात्मक नहीं हो पाता. और दिल खिन्न रहता है . इसलिए भी त्वरितर अच्छा लगा . आप जिसकी चाहें प्रशंसा करें या बखिया उधेड़ें. और संवादात्मकता भी ऐसी की आपको लपेट ले .

और सिर्फ शब्दों का इस्तेमाल न हो इसलिए मुझे अपने अनुभव से लगा की #SHAIR जिसमे कई लोग किसी विषय पर या किसी शायर की शायरी एक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार त्वरितर करते हैं . आप आ कर एक बार देख लें . #SHAIR पर खोजें तो आपको उस पर हुए सारे त्वरितर संवाद अपने आप मिल जायेंगे . आपके आने के पूर्व के भी . इससे जिसने उस कवि या लेखक को नहीं भी पढ़ा उसे भी उसे पढने का मौका मिलता है और वह उसे पढने का प्रयास करता है . हम कुछ लोग इसमें हिन्दी के गाने , कविता , दोहे भी डाल देते हैं और यह सब सहज चलता है . दुष्यंत , गुलज़ार , धूमिल , कुमार अम्बुज की कवितायें यहाँ कुछ सीमित मात्रा में ही सही आ गयी है . आपके पदार्पण की देर है .

बहुत से ब्लॉग पर हम agreegator का इस्तेमाल करते हैं . अब देखिये वो सब यहाँ मौजूद है . जो नहीं है . उसमे से कुछ का उल्लेख ऊपर है . बनाइये निराला , महादेवी , तुलसी , मीराबाई का हत्था और फिर पन्त , अज्ञेय , केदारनाथ , नागार्जुन का भी . देर किस बात की शुरू हो जाइए .

अपने ब्लॉग के लिए पाठक आपको फॉलोअर से मिल जायेंगे . और त्वरित टिप्पणी भी . लेखक या कवि के लिए इससे नयी क्या बात होगी . मैं देखना चाहता हूँ की हिंदी कवि / लेखकों पर अन्ताक्षरी हो . और आप उनका प्रचार करें अपने प्रिय कवि या लेखक का हत्था बनाकर . अच्छी रचनाएं अच्छे भोजन की तरह भूख पैदा करती हैं . मानसिक भूख पेट की जगह मस्तिष्क में जन्म लेती है . फिर आप अच्छे लेखक और कवियों की रचनाएँ खोजते हैं , किताबें खरीदतें हैं , पढ़ते हैं. और उस पर चर्चा करते हैं . कभी कभी यह भूख से एक कदम आगे जाकर नशा भी बन जाता है . वैसे ये नशा बुरा नहीं .  हांलाकि कभी कभी इस नशे की सामग्री भी पाबंदी की ज़द में आ जाती हैं .

अपनी नयी रचना का सृजन यहाँ कर सकते है . एक के बाद एक जब समय मिले . लिखते जाएँ . गर्भ से निकलती कविता को पढ़ना नया अनुभव होगा . और जब पूर्ण हो तब जन्म के बाद उसे अपने ब्लॉग पर ले जाएँ . यहाँ बहुत से लोग दाई का फ़र्ज़ भी अदा कर सकते हैं .

ब्लॉग पर आप अपनी पोस्ट या चिट्ठे के अलावा किसी विषय पर संवाद नहीं करते . यहाँ उसके साथ साथ अन्य विषय भी विचार विमर्श कर सकते हैं . यहाँ झुम्पा लहरी हैं और तसलीमा नसरीन भी . और सलमान रश्दी साहब भी आ गए हैं . और कभी कभी जावेद अख्तर साहब भी कुछ न कुछ कह जाते हैं .अगर आप किसी हिन्दी के लेखक या कवि को जानते है तो उसे भी बुलाएं . खूब रंग जमेगा जब मिल बैठेंगे यार दो . किसी विज्ञापन का जूमला है . क्या करें ? जहां चार यार मिल जाएँ वहीं रात हो गुलज़ार . हाँ @p1j गुलज़ार की कवितायें ले आते हैं .

अब नीचे हाल की त्वरितर पर घटी कुछ संवादों की बानगी आपके लिए पेश है . जिसके गर्भ से इसकी उत्पत्ति हुई . और कुछ आपके परिचित हत्ते भी हैं हाँलाकि यहाँ इनका नाम कुछ अपिरिचित सा लगे अब जब आयेंगे तो खुद परिचय भी हो जाएगा . यह आप के लिए छोड़ रहा हूँ . अब इनके हत्ते आप चढ़ जाएँ .

त्वरितर पर मुझे आपका और आपके माध्यम से हिन्दी का इन्तेजार रहेगा . हम आपके स्वागत के लिए पलक -पाँवडे़ बिछाए तैयार बैठे हैं . देर किस बात की .

@ravishndtv त्वरितर । ट्वीटर का हिन्दी में ये पुकार नाम कैसा रहेगा ।

@ravishndtv त्वरितर में राय देने की दुकान खुली है । बड़े लोग वॉलमार्ट की तरह राय देते हैं । हम फॉलोअर किराना स्टोर की तरह मुस्कुरा देते हैं ।

@brahmatmajay लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?#rajeshjoshi #राजेश जोशी

@brahmatmajay आज की कविता फरीद की है...शीर्षक है मुस्‍कराहटें....

@brahmatmajay जब अमीर मुस्कुराता है, तो लगता है,शासक मुस्कुरा रहा है, कि देश की कमज़ोर नब्ज़ उसके हाथ में है, कि जब भी उसे मज़ा लेनाहोगा, दबा देगा थोड़ासा

@brahmatmajay आज घूमिल की पटकथा की पंक्तियां थीं...अब मन थोड़ा शांत हुआ है...चलूं फिर से मनारंजन का पापड़ बेलने

@brahmatmajay मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ जिसके आगे हर सचाई छोटी है। इस दुनिया में भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क रोटी है।

@aptrivedi २. जो देय था वह दे चुके/ जो गेय था,छंदित चुके/हम मानते आकाशगंगा हैं तुम्हे / पर क्या करें?? / रख नहीं सकते क्षितिज पर एक भी सोपान - #NareshM

@aptrivedi 1.असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का शिकार है जो वह सोचता कि पेशा एक जाति है और भाषा पर आदमी का नहीं,किसी जाति का अधिकार है #Kavita #Dhumil 24 Nov.

@blogprahari @hamarivani @networkedblogs @blogjunta @chitthajagat @indiblogger @BlogGlue @blogger

@parikalpnaa @srijanshilpi @janokti @kaafila

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14 नवंबर 2011

कौन हूँ मैं

कौन हूँ मैं ?
हाड़ माँस का पुतला 
जैसे शेर, शेर 
और पीपल ,पीपल 
या कोई और है मसला?
कौन हूँ मैं ?
नदी की तरह बहता हुआ 
पहाड़ से समुन्दरों की ओर
या फिर नभ में विचरता 
पंक्षी उड़ता 
विभोर 
कौन हूँ मैं ?
किसी देश की मिट्टी में कैद 
एक शरीर - 
जिसने पहन रक्खा है एक नंबर 
जिसकी सीमाओं के चारों ओर है 
तैनात सिपाही 
जिनकी बाज़ सी आँखों को छला नहीं जाता 
कोई नहीं जो , लांघ के जा सकता 
सीमा के उस ओर 
और फिर कहते हो 
- हम आजाद हैं .
कौन हूँ मैं  ?
उधेडो , काटो , बांटो , जोड़ो 
रक्त-हड्डियाँ-छाल 
वही आँखे , वही हाथ , वही वसा , वही गात 
सिर्फ एक दुर्घटना 
या फिर कोई और रचना 
मेरे दिमाग को उलटो - पलटो 
धोलो , खंगालो  
पर इस दर्द से बचा लो 
इस दंश से उबारो 
इसमें कौन सा कीड़ा कुलबुलाता है 
जो मुझे बार बार बताता है 
कि मैं किसी ग्रन्थ की ईबारत हूँ 
कि मैं पवित्र हूँ , मैं सच हूँ , आयत हूँ 
कि मैं ईश्वर हूँ , ईसा हूँ , खुदा हूँ 
कि मैं अपने ही जैसे किसी और आदमी से जुदा हूँ 
कौन हूँ मैं ?

11 मई 2011

एक स्वीकारोक्ति

बहुत वर्ष लेखन और रचना प्रक्रिया से अलग रहने के बाद जो भी दिमाग में आता है लिख जाता हूँ . पाठक इस अनर्गल प्रलाप को बर्दाश्त कर रहें हैं . सुखद अनुभूति है .
पर  प्रक्रिया  है मस्तिष्क को फिर सान पे चढाने जैसी .और उससे भी ज्यादा चीजों को अलग से देखने की प्रवृत्ति वापस पैदा करना. वर्त्तमान में इस से गुजर रहा हूँ . अपने आप से रेस में दौड़ने जैसा कुछ कुछ .लय वापस पाने की  मंशा है . यात्रा उसके बाद शुरू होगी . आशा है आपका साथ रहेगा .

2 मई 2011

सच कहाँ खड़ा है

सच कितना बड़ा है
सच कहाँ खड़ा है || 

वो मेरा पड़ोसी है ?
दुनिया क्या इतनी छोटी है ?
किसके मुंह की बोटी है
वो क्या सिर्फ रोजी – रोटी है ?
दादी माँ माला के मनकों में पिरोती है
माँ इसे आसुओं में बहाती है
दुनिया गंगा में नहाती है
वो क्या इतना पक्षपाती है ?
वो क्या हमारे जजबातों में है
वो क्या बही-खातों में है
वो क्या मोमबत्ती की रोशनी में है
जो इंडिया गेट पर हाथों में है
वो काले लबादो में छुपा है
वो क्या बारीकियों-बातों में है
वो क्या इबारतो आयतों में है
वो क्या हमारी रवायतो में है
वो मुझसे कहाँ बिछड़ा था
क्या अब भी किसी मोड़ पर खड़ा था ||
वो क्या किसी मॉल में बिकाऊ है
वो क्या भाषणों में उबाऊ है
वो हमारे अखबारों में छपा है
वो किस लिफाफे का पता है
वो किसके चेहरे का हिजाब है
वो कैसा मुखौटा है
वो किसका नकाब है
वो क्या चेहरे पर फेंका तेजाब है
मेरी निगाहों नें जिसे ढूंढा है
वो जवान है या बूढ़ा है
सच कितना बड़ा है
सच कहाँ  खड़ा है ||
बुद्ध के निर्वाण का पड़ाव
गांव के चौबारे का अलाव
वो क्या अदालतों के अहातो में बिक गया
वो सभाओ , नारों, भाषणों में छिप गया
वो सड़ा गेहूँ  चावल था
या गरीब का निवाला था
वो किसकी गाढ़ी कमाई थी
किसकी नौकरी के लिए हवाला था
कला क्या सृजनात्मक अभिव्यक्ति है
या सिर्फ हमारी संवेदनाएं रीतीं हैं
भेडियो के लिए भेड़ की एक खाल है
या दोहरी चरित्रता की नयी कोई चाल है
अमरनाथ की यात्रा की कठिनाई
या एवरेस्ट की ऊँची चढाई
चेतना की सामूहिक अभिव्यक्ति
या अवनति की अंधेरी खाई
जब सारा जगत बिकाऊ है
वो क्यों इतना अकड़ा-अकड़ा है
सच कितना बड़ा है
सच कहाँ खड़ा है ||
किसी के समर्थन में लिखा अपरोक्ष संपादकीय / विश्लेषण
या किसी विषय का निरपेक्ष अंकेक्षण
सत्ता के गलियारे में सत्य की खोज
या सुविधाभोगी की तैयार उपजाऊ संपर्कों की फौज
सत्य की खोज में जुटी निर्भीक पत्रकारिता
या अपने राजनैतिक विश्वासों की छदम-चरित्रता
किसी औद्योगिकी घराने की सुविधाओं का प्रतिदेय
या किसी भौगोलिक सत्ता की प्रतिश्रुति का उपादेय
अगर हमाम में सब नंगे हैं
तो क्यों कपड़ों का झगड़ा है ||
सच कितना बड़ा है
सच कहाँ खड़ा है ??

20 अप्रैल 2011

जमीन की चक्कलस

ऐ खुदा तुने मुझे कब्र से कम दी है जमीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार से सर लगता है | ( बशीर बद्र )


जमीन न हुई चक्कलस हो गयी | जिसे देखिये इसे लेकर रो रहा है | 'आदर्श' की जमीन सेना में उथल पुथल मचा रही है | 'नंदीग्राम ' और 'सिंगुर ' की जमीन ३५ सालों से काबीज कम्युनिस्टों के पैरों तले से खिसक रही है | खबर है की 'माया ' की जमीन 'भूषण ' के गले की हड्डी बन रही है | कर्नाटक के येदिउरप्पा हों या राजस्थान के गहलोत | शिवराज की 'कुशाभाऊ ठाकरे न्यास ' को प्रदत मेहरबानी हो या 'सरकारी बाबुओं ' के निवासों के लिए चली उदार कलम की निशानी | दिल्ली के सैनिक फार्म की कहानी या अमिताभ की किसानी | हर किस्सा जमीन पर आकर ख़त्म होता है |

लुटयन की दिल्ली तो पहले से स्मृतिवनों , घाटों , स्मारकों , प्रतिष्ठानों में लुट चुकी है | 'सार्वजनिक - निजी भागीदारी " की कहानी जमीन के जमींदोज होने की कहानी ज्यादा है | सस्ती जमीन की बानगी - बनने वाले अस्पतालों में गरीबों के लिए मुफ्त बिस्तर , बनने वाले स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा, बनने वाले कारखानों में विस्थापितों के लिए रोजगार - बनाकर परोसी रसोई में है | इस वायदा कारोबार ने गरीबों का कितना किया फायदा ? यह शोध का विषय है | भूमि के पुनःवितरण की कहानी नहीं है बहुत पुरानी | 'सिंगुर ' की जमीन की खरीदारी सर्वहारा सरकार ने 'इच्छुक' मालिक लोगों से खरीद ली जो 'रिकार्ड ' में अब भी मालिक थे | जोतने और बोने वाले खेतिहर लोग सीख रहे थे उनके स्वप्न 'कागजी ' भी नहीं थे |
बदनसीब जफर को तो 'दो गज जमीन भी न मिली कू ए यार में ' | बहादुर शाह जफ़र का दर्द अब 'टाटा ' , 'वेदांत ' , और अम्बानी का भी है | विकास के लिए वर्षो से जंगलों में रह रहे आदिवासी की जमीन चाहने वाले गलत क्या करते हैं ? वही जंगल का कानून | ठीक वैसे ही जैसे शेरो और बाघों के लिए जंगल छोटे पड़ते हैं तो वो मानव बस्तियों की ओर रुख कर लेते हैं | पर वो अपने बंद कारखानों की जमीन पर या तो 'मॉल' बना रहे हैं या ' अट्टालिकाएं ' | इन कारखानों के लिए भी जमीन का अधिग्रहण किसी 'सरकार ' ने किया होगा , शायद | हमारे यहाँ वैसे भी परम्पराएँ बखूबी निभायी जाती हैं |
अधिग्रहित जमीन पर गोल्फ कोर्स भी बदस्तूर बनेगें | आखिर ' जन संबंधी ' प्रयोजनों में यह भी शामिल है ही | वह दिन कब आएगा जब विकास के लिए 'मरीनड्राईव ' वाले अपनी जमीन खुशी ख़ुशी दे देंगे |

जब पृथ्वी पर मानव का आविर्भाव हुआ , तब जो जहाँ जन्मा वहां काबिज हो गया | कबीले गाँव फिर शहर , राज्य और देश बनते चले गये | कब्ज़ा - जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर चलता है | और प्रजातंत्र में यह लाठी प्रजा ने सरकार को सौंप दी | सब भूमि गोपाल की तर्ज पर | मनुष्य लाख चाँद और मंगल ग्रहों पर जमीन के टुकड़े ख़रीदे / बेचे | पर सुना है विश्वव्यापी तापक्रम वृद्धि से पिघलते ध्रुवी प्रदेशों की जमी बर्फ से बढे समुन्दर के जलस्तर बहुत से टापुओं , समुन्दर किनारे बसे शहरों , या देशों के बड़े अंशों को डूबा देगा | तभी तो कहा - 'मरीनड्राईव ' वाले अपनी जमीन खुशी ख़ुशी दे दें | जो कल जाना है उसका आज मोह क्यों ? ज़र , ज़ोरु , ज़मीन के झगड़े सारे | मुहावरा काफी पढ़ा और गुना | पर लगता है मुहावरा कुछ गलत बन पड़ा है |

अब बचने के लिए - या तो ' एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है जिसमें तहखानो से तहखाने लगे हैं ' ले लें | या किसी सरकारी ज़मीन पर काबिज हो लें | आगे पीछे 'पट्टा' मिल ही जायेगा | वैसे भी ज़मीन खरीदते तो बेवकूफ ही हैं |

8 दिसंबर 2010

बनारस में बम विस्फोट

यह शीर्षक उपयोग करना एक यातना से गुजरने जैसा है . बनारस की अनेक स्मृतियाँ हैं . कक्षा एक  से पांच तक यहीं अध्ययन    किया है . सुबह सुबह जब शहर अपनी उनींदी आँखों से जागता तब मैं स्कूल बैग लिए काशी विश्वनाथ की गली से , हनुमान मंदिर से होता हुआ , औरंगजेब मस्जिद को निहारता , सीढियाँ चढ़ , चौक होता हुआ , तक़रीबन एक - दो किलोमीटर चल कर विद्यालय पहुंचता . वर्ष में कभी कभी स्कूल के बाहर मेढकों को चीरफाड़ के बाद देखता . बड़े हो समझा - जीव विज्ञान की कक्षा का परिणाम था . कभी कभी रास्ते में तांगे के पीछे बंधे मुर्दा शरीरों से उतरे ग्रामवासियों द्वारा घाट तक  की यात्रा से पूर्व जलपान करते हुए मुलाकात हो जाती . नाग पंचमी से पूर्व चौक के बाजार से नागों के चित्र वाले कागज खरीदते  हुए गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तकों से परिचय हुआ . और उन्ही से आदर्श बालक , आदर्श पूर्वज , आदर्श स्त्रियाँ आदि पढ़ा और गार्गेयी, मैत्रेयी ,प्रह्लाद , ध्रुव , भरत आदि पात्रों से परिचय हुआ . 
बनारस में ही होली की स्मृतियाँ हैं . वहाँ होली पर स्वांग की परंपरा है . और इसके साथ ही होली पर आलू काटकर स्टेंसिल द्वारा छापा लगाने की स्मृति . श्री ४२० इत्यादि के स्टेंसिल के छापे अक्सर घर लौटने पर कपड़ों पर लगे मिल जाते थे . 
बनारस में रहना गंगा स्नान और उसमे पानी से डर लगने पर उसमे जबरदस्ती लगवाई गयी डुबकियाँ या कहूँ गोते . और फिर बहुत देर तक नाक से बहने वाला पानी अब तक याद है . ये बात और है की अपने मिरजापुर निवास के दौरान ना सिर्फ उसी गंगा में तैरना सीखा पर घंटों तैरना और गर्मियों में उसी गंगा को तैर कर पार भी किया . 
बनारस की स्मृतियों में कबूतर बाज़ी , पतंग उड़ाना, गिल्ली डंडा खेलना , और दुर्गाकुण्ड का मेला , भरत मिलाप , चेतगंज की नककटीईया याद है . वैसे ही याद है कचोडी गली की कचोड़ियाँ, छोले , और बनारस की चाट . बनारस की मिठाई , गरम जलेबी , तेल की पकोड़ियाँ, और आलू की टिक्की का स्वाद भी . 
बनारस के रंगों में  मण्डी में घूमना, हम हैं बनारसी बाबू का गाना ,  या शन्नो नाम मेरा . यह गाना इसलिए क्योंकि विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने सातों चौक जहाँ हम रहते थे वहाँ एक लड़की को सब शन्नो बुलाया करते थे . 
बनारस की एक और स्मृति है . पिताजी नवरात्री में पूरे परिवार को लेकर एक बार पूरे नौ दिन नव दुर्गों के अलग अलग मंदिर में दर्शन के लिए ले गए थे . तब साइकिल ही साधन था . बनारस में पहले हम जहाँ रहते थे वह स्थान काल भैरव मंदिर के समीप था . और उस मंदिर के पास से गुजरने पर डर लगता था . एक बार स्कूल से लौटते हुए घाटों के मार्ग से घर पहुंचा था . बनारस में रहकर उस उम्र  में भी मस्ती - बनारसी मस्ती आ ही गयी थी . बनारस संस्कृति का शहर है . इस संस्कृति में सारनाथ की यात्रा , सावन में मानस मंदिर , भारतमाता मंदिर , कजरी , और चैती सुनना . एक परिचित थे जिनके घर जाने पर बांसुरी की तरंगे सुनाईं पड़ती थीं . यह निवास आदिविश्वनाथ मंदिर बांसफाटक स्थित  है . वहाँ पर रात्रि में शिव आरती पर नगाड़ा और विश्वनाथ के आरती गान के स्वर अब भी कानों में गूंजते हैं . 
बनारस में पान और भांग खाने की परंपरा है . और एक परंपरा है घाटों पर अखाड़ों की . जहाँ पर पहलवान वर्जिश करते दिख जाते थे . 
उन्ही दिनों में विश्वविद्यालय के छात्रों के आन्दोलन पर शहर में कर्फु  भी देखा था . 
बनारस की स्मृतियों का वर्णन वहाँ शाम को दल बांधे बंदरों के समूह के पूर्ण नहीं होता . ये बन्दर कुछ मंदिरों में जैसे दुर्गा कुण्ड के लंगूर और संकट मोचन के हनुमान मंदिर में भी दिख जातें है . बनारस छोड़ने के बाद भी कई बार बनारस गया  हूँ . और बचपन की स्मृतियों के धुंधला होने के बावजूद वहाँ की गलियाँ परिचित ही लगती हैं . हाँ जहाँ हम स्वछंद खेला करते थे वह विश्वनाथ गली अब सब तरफ से पुलिसिया इन्तेजाम में अपरिचित सी लगती है . सब कुछ चाक चौबंद होने के बावजूद घटनाएँ हो जाती हैं . आम आदमी की तलाशी तो बहुत होती है . पर प्रश्न उठता है क्या जो बम रखने आते हैं वो उन्ही मार्गों से जायेंगे जहाँ तलाशी हो रही है . हमारे सुरक्षा इंतजामों में लगे लोगों को आतंकियों की तरह सोचना चाहिए की ऐसी  जगहों पर जो निशाने पर हैं वहाँ कोई बम रखना चाहे तो कहाँ और कैसे रखेगा ?  

7 दिसंबर 2010

नवम्बर की कहानी

बहुत दिनों बाद भोपाल - घर जाना हुआ . दीपावली पर चारों भाई बहन शायद वर्षों बाद एक साथ घर पर थे . पिछले एक वर्ष से एक और उपक्रम चल रहा था . बी एस एस एस कालेज और केंद्रीय विद्यालय में साथ पढ़े मित्रों को इस नए तकनीकी  युग में खोजना . बहुत से मित्रों को खोजा और उनसे संपर्क भी हो गया . पर इन दशकों में , हमसब जीवन के बहुत से सोपानों से गुजर गए हैं .

फिर भी , ढूँढने का रोमांच अपनी जगह कायम था . और कुछ स्वरों में आश्चर्य भी था . क्यों ? और कैसे ? उत्साह बहुत दिनों तक शायद कायम नहीं रहता . पर अभी भी जो नहीं मिले उन्हें खोजने की उत्सुकता कायम है . और उत्साह भी . मानव स्वभाव बहुत विचित्र है . कुछ जानने का कौतुहल हमें भीतर तक बैचैन कर देता है . और जानकर मस्तिष्क कहता है - अच्छा ! और फिर नए कौतुहल के पीछे दौड़ने लगता है . 

कालेज और स्कूल के मित्रों से मिलना हुआ . समय की कमी से सबसे मिलना नहीं हो पाया . सब अपने - अपने जीवन के चक्र से बंधे हैं . और किसी चक्र से मुक्ति कितनी कठिन है यह मशीन का पुर्जा ही जानता है .

नवम्बर पर ब्लॉग में बहुत सी प्रविष्टीयां हुईं हैं . पर सब एक पुरानी डायरी जो भोपाल प्रवास में मिल गयी थी , से हैं . यह सब तब लिखा था जब पढता था . लगभग  दो दशक पुराना है. ब्लॉग पर देकर खुद पढना चाहता था . महसूस करना चाहता था . लिखने के उस दौर की मानसिकता से स्वयं का साक्षात्कार . उम्र के उस दौर में लिखना स्मृतियों और अनुभवों , और भावनाओं को समेटने जैसा था .  आप को कैसा लगा ? १९८२-१९९० के वर्षों में क्या सब युवा वैसा ही महसूस करते थे ? हमारे अनुभव भी तो हमारे आसपास के वातावरण और हमारे स्वयं के जीवन द्वारा निर्धारित होते हैं . और हम जहाँ भी हैं . वह इनसे हुए हमारे स्वयं के आदान -प्रदान का निष्कर्ष ही तो है .

अपने मित्रों को तो खोजा ही . और इस प्रक्रिया में अपने मित्रों के मित्र को खोजने का आमंत्रण मिला . और उन्हें खोजने और उनको  मिलाने का सुख जो मित्रों को मिला , वह भी महसूस किया . पर इस अनुभव पर एक टिपण्णी से खुद को नहीं रोक पा रहा - कुछ मित्रों को खोजकर पाना , ऐसा लगता है , उनका पता पाने जैसा है . जैसे हम सब जानते हैं , 7 , रेसकोर्स रोड , दिल्ली पर कौन रहता है . पर   यह सिर्फ पता जानने जैसा है . वहाँ रहने वाले से सब कहाँ मिल पाते हैं .

20 अगस्त 2010

शिक्षा एक वस्तु –उत्पादक या सेवा प्रदारक


स्वतंत्रता के बाद सरकारी – केंद्रीय और प्रांतीय – उच्चशिक्षा और स्कूली शिक्षा संस्थानों की स्थापना हुई . स्थानीय स्व-निकाय ज्यादातर स्कूली शिक्षा में आये . कुछ सरकारी उपक्रम अपने कर्मचारीयों के बच्चों के लिए स्कूल चलाने लगे. जो अपने संपर्कों से सरकारी अनुदान प्राप्त कर सके उन्होंने अपने बलबूते पर अलग –अलग काल में अलग अलग योजनाओं में अलग – अलग स्तर पर शिक्षा जगत में प्रवेश किया . कुछ ने स्वयं के प्रयासों से अकेले या समूह बनाकर इसमें प्रवेश लिया . पर यह मान्यता प्राप्त शिक्षा देते थे या किसी विश्वविद्यालय से संबद्धता प्राप्त करते थे . मदरसा , कान्वेंट , सरस्वती , शारदा , मिशन विद्यालय धार्मिक या अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा शिक्षा जगत में प्रभाव ज़माने की कवायद थी . और प्रचार का साधन .

जहाँ नौकरियां नितांत गैर सरकारी थीं बहुतायत के तौर पर . उन क्षेत्रों में बिना मान्यता के शिक्षा भी आई . संगणक , प्रचार , विपणन, विज्ञापन , हार्डवेयर, विमानन, बीमा, मयूचुअल फंड , नेटवर्क, इलेक्ट्रोनिक उपकरणों , फैशन, बैंक , शेयर बाज़ार , फिल्म उद्योग ने अपनी जरूरतों के हिसाब से पारंगत हाथों को अपने तौर पर तैय्यार करने का सरंजाम कर लिया . ऐसी बहुत सी संस्थाएं जो देशी / विदेशी दोनों हैं और जो परम्परागत और अपरंपरागत दोनों तरह के बाज़ार में थीं उन्होंने एक दौर में संबद्धता के शिकंजे से स्वयं को मुक्त कर स्वायत्तता या स्वछंदता में बदलने के लिए स्वयं को विश्वविद्यालय में बदलने के तरीके खोजे और कुछ कामयाब भी हुए . कितने यह अब उच्चतम न्यायालय तय करेगा. विगत वर्षों में अनेक दशकों की नींद से जागकर सरकार ने मांग के औचित्य से ताबड़तोड़ दर्जनों की तादात में नए संस्थान खोल दिए या उस प्रक्रिया से गुजर रही है.

यहाँ नया कुछ नहीं हो रहा है . वर्त्तमान में जिनकी मांग है या जहाँ से मांग आ सकती है वैसे , पहले से मौजूद संस्थानों की संख्या में ईजाफा हो रहा है . जिनकी तरफ ग्राहक ज्यादा भाग रहा है या समझा जाता है वे सफल हैं उनके प्रतिरूप में ढाले नए संस्थान . यहाँ ढाँचागत सुधारों की बात भी हो रही है . पर यह लक्षणों पर काबू पाने की कोशिश है . बीमारी की जड़ तक पहुँचने का प्रयास नहीं . एक प्रवेश परीक्षा ( उद्देश्य कोचिंग उद्योग पर लगाम ) , एक पाठ्यक्रम ( उद्देश्य एक परीक्षा के लिए समान पढाई ), नए संस्थान ( ताकि विदेश जा रही पूंजी को घर में रखा जा सके ) , विदेशी संस्थानों को आमंत्रण (ताकि विदेश जा रही पूंजी को घर में रखा जा सके ), पुराने नियामकों और नियंत्रकों के बदले नए ( ताकी बाजार में जब सरकारी ,गैर सरकारी और बहु-राष्ट्रीय सब हों तब खेल ठीक-ठाक हो ). संस्थानों के लिए रेटिंग – एजेंसी ( ताकि वो पूँजी जुटा सकें ) , उपाधियों और प्रमाणपत्रों का अमूर्तिकरण (ताकि जालसाजी पर नियंत्रण हो ). पर अभी तक आपने विनिवेश के स्वर नहीं सुने हैं . पर यह सब क्या सुधारीकरण के अन्य परिवर्तनों से कुछ भिन्न हो रहा है ? हो सकता है यह सामरिक चुप्पी हो . एक समझदार चुप . वह भी होगा . पहले १० प्रतिशत फिर ५१ प्रतिशत . फिर ५० से कम . या फिर पूर्ण विनियोग .कहानी ऐसे ही आगे बढ़ती है .

अब कुछ हिसाब किताब. छः दशकों में सात भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान , एक विज्ञान संस्थान , एक आयुर्विज्ञान संस्थान , पांच प्रबंध संस्थान , पांच सूचना तकनीकी संस्थान , १०-१५ केंद्रीय विश्वविद्यालय . अब नए प्रस्ताव – ७-८ नए भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान, पांच विज्ञान संस्थान , पांच आयुर्विज्ञान संस्थान , ७-८ प्रबंध संस्थान , हर राज्य में नए केंद्रीय विश्वविद्यालय (जहाँ नहीं थे ), १४ नए विश्व-मानक विश्वविद्यालय (इन्हें अब नवप्रवर्तनशील कहा जा रहा है ), २० सूचना तकनीकी संस्थान , प्रवासी-भारतीयों के लिए विश्वविद्यालय, नालंदा विश्वविद्यालय, दक्षिण-पूर्व देशों का विश्वविद्यालय , पिछड़े छेत्रों में ३७४ महाविद्यालय , विज्ञान और औद्योगिक अनुसन्धान परिषद द्वारा विज्ञान अकादेमी , कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा चिकित्सा महाविद्यालय , भारतीय रेल द्वारा नर्सिंग और चिकित्सा संस्थान , नए औषधी शिक्षा और अनुसन्धान संस्थान , व्यावसायिक शिक्षा का राष्ट्रीय मिशन , शिक्षा अधिकार कानून , कानूनी शिक्षा के नए विश्वविद्यालय और अनुसन्धान संस्थान . इसके अलावा क्षेत्रीय अभियांत्रिकीय संस्थानों का नया अवतार – राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान के रूप में और उनकी हर राज्य में स्थापना . नए पॉलीटेक्निक, नए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान . हर मंत्रालय व्यस्त है. पहले मंत्रालय व्यस्त थे – विजन – २०२० बनाने में . अब संस्थान बनाने में . इसके अलावा विप्रो के प्रेमजी , एयरटेल के सुनील भारती मित्तल, वेदांत के अनिल अग्रवाल , एच. सी. एल. के शिव नादार , रिलाएंस के मुकेश , इन्फोसिस के मूर्ति भी विश्वविद्यालय स्थापित करेंगे . चर्चाएँ चल रहीं हैं . विदेशी संस्थानों के भी चर्चें हैं . शिक्षा मंत्री उन्हें आमंत्रित करने अमेरिका, ब्रिटेन घूम आये . सिंगापुर , मारिशस, दुबई वाले आये या हम हो आये . देशों के साथ सहयोग के नए ज्ञापनों पर हस्ताक्षर हो रहे हैं . अमेरिकी राष्ट्रपति और हमारे प्रधानमंत्री की नए "ओबामा – मनमोहन २१ वी सदी ज्ञान – पहल" पर काम हो रहा है . कुछ लोग खुश हैं . बहुत खुश . कुछ लोग दुखी हैं . बहुत दुखी

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सरकार इस विचार से अभिभूत है की सुरसा की तरह बढ़ती जनसँख्या जो समाजवादी चिंतन में एक विशाल समस्या और अभिशाप थी वह अर्ध पूंजीवादी चिंतन में बुजुर्ग होती पश्चिमी और यूरोपीय देशों की जनसँख्या के लिए कारीगरों और कामगारों की सेना में परिणत की जाये . पर क्या ऐसा संभव है ? इसे कई लोग ज्यादा जनसँख्या के लाभांश के तौर पर पेश कर रहे हैं . उपरोक्त परिच्छेद में उल्लेखित आंकड़ों पर फिर एक नजर डाल लें . सरकार की उतावली का उत्तर मिल जायेगा .

हमारे यहाँ उर्जा की भी समस्या है . सारी पंचवर्षीय योजनाओं , बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बुलावे , विदेशी पूंजी के आमंत्रण , मुनाफे की जमानत , शासकीय विद्युत कंपनियों के पुनः-संरचना, बिजलीघरों की स्थापना के लिए विशेष सहूलियतों के बावजूद समस्या जहाँ की तहाँ खड़ी है . क्यों ?

सूचना क्रांति की अचानक बढ़ी मांग और उसमे प्रवासी भारतीयों की सफलता और देशी कंपनियों की हिस्सेदारी ने मध्यवर्ग की बांछे ही खिला दीं . सब अपने अपने नौनिहालों को सूचना क्रान्ति वीरों के रूप में हरे डालरों के लिए विदेश भेजने को लालायित हो गए . और इससे देश में प्रोद्योगिकी शिक्षा में क्रांति आई . पहले पांच राज्यों और बाद में कमोबेश सभी राज्यों में हजारों – हजार निजी अभियांत्रिकी महाविद्यालय उपस्थित हो गए . कहानी पुरानी नहीं है अतैव विस्तार में नहीं जा रहा . कम लिखा ज्यादा पढियेगा . सरकारों ने राज्य स्तर पर प्रोद्योगिकीय विश्वविद्यालय स्थापित कर दिए . प्रवेश परीक्षाएँ शैक्षिक बिरादरी की दिनचर्या का महत्वाकांक्षी स्तंभ बन गया . यह कुछ कुछ कुम्भ मेले जैसा आयोजन है . विशेष रेलगाडियाँ चलाई जाती हैं . लाखों लोगों का समागम होता है . अंतर सिर्फ यह की इसमें शामिल बूढ़े-बुजुर्ग नहीं . नौजवान होते हैं . तपस्या की जाती है . मन्नतें मानी जाती हैं . रत-जगा होता है . परिवार के सदस्य रात बारी-बारी जग कर चाय-काफी का प्रबंध करते हैं . माता-पिता चाचा-चाची ताऊ-ताई अलग अलग परीक्षा के लिए लिवाने –लेजाने के लिए यात्रा की तैयारियां करते हैं . बहुत से दूर के शहरों में बसे परिचितों और दोस्तों से इसी बहाने मुलाकात भी हो जाती है . कई राज्यों से फ़ार्म मंगाए जाते हैं . फ़ार्म भरने और परीक्षा की तिथियाँ घर के कैलेंडरों पर अंकित की जाती हैं . अख़बारों में परीक्षा के पूर्व और उसके बाद आते कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों से किसकी दृष्टि बची होगी भला . और इसके बाद अख़बारों और टी.वी. पर ग्राहकों को ललचाते शिक्षण संस्थानों के प्रवेश के लिए आमंत्रण के विज्ञापन . पर हकीकत क्या है ?

नास्कोम के अनुसार हमारे ७० प्रतिशत अभियांत्रिकीय स्नातक नौकरी के उपयुक्त नहीं हैं . और विगत वर्षों से इन संस्थानों में हजारों सीटें खाली पड़ी हैं . शायद ऐसा चला तो कई दुकानें बन्द हो जाएँ . एक पुरानी कहावत है – जल्दबाजी में करो और शांति से भुगतो .सरकारी क्षेत्रों में भी जो संस्थान आज के पैमाने पर कुटीर उद्योग के रूप में जन्मे थे अब कई गुना बढ़कर बड़े उद्योग का रूप ले चुके हैं . हालाँकि इनमे कोई ढाँचागत बदलाव नहीं आया है . विशाल आकार हो जाने के बावजूद . भारतीय अर्थव्यवस्था को वैसे भी लोग टाइगर नहीं हाथी से उपमा-कृत करते हैं .


सरकारें जानती हैं . या सीख चुकी हैं . यह पाठ की – लागत से कम पर माल बेचने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है , अक्षमता को प्रश्रय , अगर उपभोक्ता लागत न दे तो उत्पादक में उत्पादता , जवाबदेही के प्रति शिथिलता आ जाती है . सरकार के पास इतने साधन नहीं की वह अपने दम पर पूरी अर्थव्यवस्था का भार उठा सके . किसी भी माल को अनुदान या सहायिकी से बेचने से उसकी गुणवत्ता कम होती है . और सरकार दिवालिया भी हो सकती है . अनुदान का फायदा गलत लोग लेते हैं .उत्पादन के तौर तरीकों में नयी तकनीकों का इस्तेमाल नहीं होता . सरकारी उपक्रमों को जो अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं उन्हें बन्द कर पाना टेढ़ी खीर है इत्यादि . अब राष्ट्रीय ज्ञान आयोग , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग , शिक्षा मंत्री , प्रधान मंत्री ३०० , ८०० , और १५०० विश्वविद्यालयों की बात करते हैं . इसीलिए सरकार ने अपने बूते पर जितने पड़े नए संस्थान खोल दिए . नहीं तो विपक्ष निंदा करता . साम्यवादी विचारक गिरवी रखने – रखाने की बातें करते . अब इत्मीनान से निजी क्षेत्र से भागीदारी के कार्यक्रम बनायें . देशी-विदेशी पूंजी को आमंत्रित करें . इसके लिए संसद में दोनों के लिए नया कानून . और पूंजी बिदके न इसलिए पूंजी-बाजार – बीमा-बाज़ार की तर्ज पर नए स्वतंत्र नियामक . रेटिंग एजेंसी की तर्ज पर शैक्षणिक रेटिंग एजेंसी . शेयर प्रमाणपत्र की तर्ज़ पर उपाधीपत्र और अंकसूची का अमूर्तिकरण . बाज़ार को एकीकृत करने के लिए एक प्रवेश परीक्षा , एक समान पाठ्यक्रम . अन्य घोषित उद्देश्य हैं – विस्तार , सम्मिलन , श्रेष्ठता , गुणवत्ता ,और पहुँच . इसके लिए महिलाओं की उच्चशिक्षा संस्थानों में भागीदारी और उपस्थिती , अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम समुदाय में शिक्षा का प्रतिशत बढ़ाने के प्रयास. इसके अलावा शिक्षा के अधिकार कानून द्वारा सब बालकों को विद्यालय ले जाने की महत्वाकांक्षी परिकल्पना . एक आंकड़े के अनुसार विश्व के अशिक्षितों का ३५% एक – तिहाई से ज्यादा ,भारत में रहता है .जिसका ६४% भाग औरतें हैं . यूनेस्को के अनुसार २०१५ तक हर बच्चा स्कूल में लक्ष्य प्राप्ति में भारत पिछडता लग रहा है . विश्व-शक्ति का तमगा पहनने की ललक पर यह तमगा भारी पड़ रहा है . इसलिए सरकार की शीघ्रता हमें समझनी होगी .

ऊपर हमने उर्जा क्षेत्र का उल्लेख किया था . तमाम कौशल करतब के बावजूद समस्या न सिर्फ वहीँ के वहीँ है बल्कि हमें घेरती जा रही है . जब नितांत संसाधनों और पूंजी जगत पर निर्भर उर्जा क्षेत्र में सरकार , सारी कवायद के बावजूद सफलता का मुंह नहीं देख पा रही . तब शिक्षा जगत में जहाँ विगत कई दशकों से विश्वविद्यालयों , अनुसन्धान , विज्ञान सभी संकायों में शिक्षा के निरंतर गिरते स्तर पर मंत्री , प्रधानमंत्री , राष्ट्रपति , उप-राष्ट्रपति , वैज्ञानिक , शिक्षाविद अपनी चिंताएं अलग अलग प्रसंगों पर अलग अलग मंच से व्यक्त करते आ रहे हैं क्या अपेक्षाएं रखी जाएँ ? . यह सारे अनुप्रयोग समस्या के समाधान की बजाय उसे और विषम तो नहीं बना देंगे . हाँ होमियोपैथी का चिकित्सक रोग के लक्षण बढ़ने को औषधी के कारीगर होने के संकेत के तौर पर देखता है . क्या पता यह कैसी चिकित्सा चल रही है ? अभी तस्वीर धुंधली ही है . पर एक बात अच्छी हो रही है एक बहुत नितांत जरूरी क्षेत्र जिसे कई दशकों से आवश्यकता थी अब बहस के केंद्र में है . बहस के मुद्दों पर हर आदमी को चिंता करनी चाहिए . और इस बहस से कोई अछूता रहेगा तो वह देश और समाज किसी के हित में नहीं होगा .

दूरसंचार क्रांति से दूरसंचार निगम (अब) और महानगर दूरसंचार निगम वर्षों की मौजूदगी के और पहले-पहल (फर्स्ट मूवर ) की बढ़त के बावजूद पिछडते नज़र आ रहे हैं . अन्य क्षेत्रो में ऐसे कई उपक्रम गुमनामी में भी जा चुके हैं . सरकारी उड़ान कंपनियां भी लड़खड़ा रही हैं .

बाजार स्थायित्व चाहता है . उसे ज्यादा उतार – चढ़ाव पसंद नहीं . सबके लिए एक से नियम चाहता है . इसे बेलगाम रोक –टोक या जरूरत से ज्यादा नियंत्रण पसंद नहीं .बाज़ार में कमजोर प्रतिद्वन्दी को रौंद देने की प्रवृत्ति है . बाज़ार में बड़ी मछली छोटी को मौका पाते ही निगल लेती है . यह प्रकृति का नियम है . और यही प्रकृति में संतुलन भी रखता है . पर प्राकृतिक रूप में मानव जितना भी निष्कपट दिखे – आप और मैं जानते है . यह दुष्ट बुद्धी (अन्य किसी शब्दावली के अभाव में ) ज्यादा और ज्यादा की हवस में दृश्य और अदृश्य सब हथकंडों को कभी जानकर और कभी अनजाने में भी बेहिचक अपना लेती है . और बाज़ार का कुसंस्कार हो जाता है . आप जितने चाहे कठोर – से कठोर नियम बनाना चाहें बना दीजिए . अगर उसे अवसर नजर आता है तो वह उसे भुनाने आ ही जायेगा . उत्पादक बाज़ार ढूँढता है . पहले आस-पास का . फिर क्षेत्र का . फिर देश का . फिर महाद्वीप का . और फिर उत्पादक पूरे विश्व का बाजार चाहता है . बाज़ार बहुत भूखा है . वह सब कुछ लील लेता है . उसकी क्षुधा शांत करना आसान नहीं . बाज़ार एक दावानल है . यह बेरोक टोक बढ़ना सीख ले फिर किसी के बस का नहीं . विश्व की सबसे शक्तिशाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाएं नहीं तो एक-दो वर्ष पहले इतनी लाचार नज़र नहीं आतीं . इसे सरकारे नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं पर वे भी इस प्रयास में इसके हेरफेर का शिकार हो ही जाती हैं .असफलता का भय किसी भी कठोर कदम को लेने से रोक जो देता है . खतरा बाज़ार उठा सकता है उठाता है . यह खतरा सरकारे नहीं उठा सकतीं . बस इसी मानसिकता का अंतर बाजार की सारी सुविधा और दुविधा को जन्म देता है . यह रीछ से पंजे लड़ाने जैसा है . एक बार आपको गिरफ्त में ले ले . फिर जब तक दूसरा शिकार न ढूंढ ले आप का छुटकारा संभव नहीं है .

अब देखिये जब मांग थी और सरकार ने अवसर मुहैया कराया तब धड़ाधड़ प्रबंध और अभियांत्रिकीय शिक्षा के महाविद्यालय खुले . दक्षिण के चार राज्यों और महाराष्ट्र ने इसमें अग्रता दिखाई . पहल करने वालों ने बाज़ार से बहुत मलाई निकाली . मैनेजमेंट कोटा , एन . आर . आई . कोटा , पेड सीट, कैपिटेशन फीस के नाम पर . कुछ ने लाइसेंस के बलबूते पर उगाही की और उसी से व्यवसाय भी खड़ा कर लिया . बाद में न्यूनतम संरचना के मापदंड बनाये गए . और इसे सत्यापित करने वालों ने मलाई का हिस्सा लिया .वसूली की बढ़ी लागत ग्राहक के खाते ही थी . जब अपने प्रदेश में ग्राहक नहीं मिले तो अन्य प्रदेशों में ग्राहकों को हाँका लगाने के लिए हंकवे नियुक्त किये . वहाँ मांग थी पर उत्पादक नहीं थे . जब इन राज्यों से सैलाब दूसरे राज्यों में जाने लगा . तो यहाँ की सरकारों की नींद उचट गयी . और वे भी लामबंद हो गयीं . अब ज्यादातर सब राज्यों में सैकड़ों की तादात में उत्पादक आ गए हैं . फिर मंदी आ गयी . और ग्राहकों में हिसाब – किताब हुआ . नौकरी मिलेगी तो ? इतना लगाना ठीक होगा ? लागत के अनुसार मुनाफा वसूली तो हो पायेगी ? अब सीटें खाली रहने लगीं . खराब माल बाज़ार उठाने से कतराने लगा . तब बाज़ार संभालने के लिए विज्ञापनों का दौर शुरू हो गया . पूरे पूरे पृष्ठ के विज्ञापन . एक रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा संस्थान प्रकाशन माध्यमों में अब सबसे बड़ा विज्ञापनदाता है . दृश्य माध्यम में भी इनके विज्ञापन पिछले वर्षों में तेजी से बढे हैं . इनके द्वारा विज्ञापनों के स्वरुप पर चिंता , बहस , और शिकायतों का दौर भी शुरू हो गया है .

अब आपूर्ति बढ़ी . सिर्फ गैरसरकारी नहीं सरकारी आपूर्ती भी बढ़ी है . अब मांग से ज्यादा आपूर्ती के कारण उत्पाद की बहुतायत हो गयी . ग्राहक के पास बहुत से विकल्प खुल गए . लाचारी ग्राहक से हटकर उत्पादकों के पाले चली गयी . अब वे उन्हें ललचाने के लिए दाम में छूट का प्रलोभन दे रहे हैं . अपने उत्पादन के बारे में झूठे सच्चे दावे कर रहे हैं . और शिकायते आने पर सरकार ने शिक्षण संस्थाओं द्वारा अनुचित व्यवहार पर निषेध का कानून बनाने की कार्यवाही कर डाली . शिक्षा न्यायाधिकरण बनाने के लिए कानून संसद में पास करने के लिए भी विधेयक पेश कर दिया है . सरकार ने ऐसे संस्थानों की गुणवत्ता पर उठे सवालों के जवाब में राष्ट्रीय प्रमाणन नियामक प्राधिकरण का विधेयक भी पेश कर दिया है . इसी बीच राज्यों द्वारा इन के लिए संबद्धता के मद्देनज़र खोले गए राज्य तकनीकी विश्वविद्यालयों से आजीज आकार मेलजोल और लेनदेन से स्वयं को विश्वविद्यालम में रूपांतरित कर लिया . हंगामा मचा . शोर उठा . अब उच्चतम न्यायालय में सब पक्ष माथापच्ची में लगे हैं . देखिये ऊंट किस करवट बैठता है . पर सरकारों द्वारा पहलकदमी और दूरंदेशी के आचरण के बजाये प्रतिक्रिया के कारण आचरण से ग्राहकों को कभी कभी त्रिशंकु की स्थिति से गुजरना पड़ता है . सांप – छछूंदर जैसी . न निगल सकते हैं ना उगल. अभियान्त्रिकी, प्रबंध , और चिकित्सा शिक्षा का ग्राहक एक दाम देने को तैय्यार था . हालांकि अंधाधुंध उत्पादन ने इसमें कुछ खटाई पैदा जरूर कर दी है . पर देखिये बेदाम की उपाधियों के बाज़ार में कोई नहीं आया . यह उत्पाद केंद्र और राज्यों के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक ही सीमित रह गए हैं . होटल , विक्रय , बीमा , प्रचार , संगणक , फैशन , संजाल , इलेक्ट्रोनिक , दूरसंचार , पूंजीबाजार , फिल्म इन सब क्षेत्रों में बाजारोन्मुखी शिक्षा के उत्पादक आये . और चले भी खूब . हमारे उपलब्ध ढांचे में न बाज़ार की लय थी , न तत्परता . वह न पहल करने के योग्य था न प्रतिक्रिया में कोई कदम उठा सकता था . बाज़ार की शक्तियों से वह डरता था . अपने ग्राहकों को उसने जानने की समझने की कभी कोशिश नहीं की . वह तो ग्राहक को गुलाम समझता है . मेरे पास नहीं आयेगा तो कहाँ जायेगा ? जो दूंगा ले लो . लेना है तो लो नहीं तो आगे बढ़ो . हम तो यही देंगे . इससे बढ़िया चाहिए तो विदेश से ले आओ . पैसे तुम देते हो क्या जो तुम्हे हिसाब दें ? तुम्हे क्या चाहिए यह हम तय करेंगे . तुम्हारी यह जुर्रत की तुम हमारी ही गुणवत्ता पर सवाल उठाओ ? जितना मिल रहा है ले लो नहीं तो ये भी नहीं मिलेगा . उसके लिए ग्राहक एक निम्न वर्ग का प्राणी है . जो उसकी कृपा दृष्टी पर पलता है . हम उत्पादक है . हमारा सिंहासन ऊँचा है . वह नजरें झुका के बात करेगा . हम अपने सिंहासन से उतर कर उससे क्यों बात करें ? वह कौन होता है हमें बताने वाला की हमारा उत्पादन किसी काम का नहीं . बेकार है . की उससे कोई लाभ नहीं निकलता . उसकी जुर्रत तो देखो हमें बताने चला है की हमारे कम दाम का माल उस दाम में भी लेने को कोई तैय्यार नहीं होगा अगर ग्राहक को देना होगा. जब तक सरकार और हमारे माईबाप हमारे साथ हैं . हमें किसकी परवाह. बस वो प्रसन्न रहें . और हम पर अपनी कृपा बनाये रखें .

सक्षम को कभी बाज़ार ने भयभीत नहीं किया . प्रतिस्पर्धा ने नहीं डराया . साम्यवादी अर्थाचिन्तन और बाज़ार से बेदखल विस्थापित भारतीयों ने अपने दम पर परचम लहराया .कुछ भाग्यवान जिन्हें इस व्यवस्था के प्रसाद रूप में सहायिकी / अनुदानित शिक्षा मिली . पर जिसके पाने के लिए उन्हें प्रतिस्पर्धा करनी पडी . वह और प्रतिस्पर्धा के कारण अर्जित अनुभव ने उन्हें सफलता दी . इसीलिये वो प्रतिस्पर्धा के पक्षधर हैं . वो जानते हैं लागत का मूल्य किसी न किसी को वहन करना पडता है . स्वयं ग्राहक करे या हम. इस विडम्बना को स्वीकार कर जीते रहें की - हमारी शिक्षा का भार देश के वो अशिक्षित करों के माध्यम से वहन करते रहें जो विश्व के सारे अशिक्षितों का एक – तिहाई अंश हैं . या वे बच्चे जो स्कूल जाने की उम्र में काम करते हैं .

उच्चशिक्षा में सरकारी संस्थानों से इतर कुछ मॉडल जो अब सफल होते दिख रहे हैं . अगर वो नए प्रतिमान गुणवत्ता पर भी कामयाब हो गए . और नए मॉडल भी आ गए . तो सरकार पर नियंत्रण हटाने , विनिवेश , और स्वामित्व के पूर्ण विनियोग की मांग का दबाव बढ़ेगा . मांग होगी पिछड़े , अति-पिछड़े , अनुसूचितजाति, अनुसूचित जनजाति , अल्पसंख्यकों, आर्थिक पिछड़ों, प्रवीण , महिला वर्ग जिसकी भी सहायता करनी है . सीधे उन्हें अनुदान या सहायिकी दें . उत्पादकों को दिया अनुदान अकुशलता बढ़ाता है . इससे भ्रष्टाचार पनपता है . अनुदान हित-ग्राहकों तक नहीं पहुँचता. वो वंचित रह जाते हैं . जो सक्षम हैं उन्हें अनुदान किसलिए ? ऐसे प्रश्न उठाए जायेंगे . अनुदान की राशी से रिसावों की संभावना रहती है . "आधार" के चालू हो जाने से अनुदान सीधे हित-ग्राहकों तक पहुँचाने में मदद मिलेगी .इत्यादि .

अब देखिये उत्पादक का मस्तिष्क कैसे कार्य करता है . पूंजी ढूंढती है अवसर . पूँजी दौडती है और पूँजी की तरफ . पूँजी जहाँ जितनी आसानी से दूना – चौगुना होने की रफ़्तार दिखे लपक लेती है . पूँजी मितव्ययी है . वह जरूरत से ज्यादा नही सिकुडना चाहती . कम से कम लागत, ज्यादा से ज्यादा मुनाफा . उसे स्कूल मास्टर से ज्यादा पर दस्तखत करवाने और कम देने में मुनाफा दिखता है . उसे गणवेश में मुनाफा दिखता है . उसे पाठ्यपुस्तकों में मुनाफा दिखता है . उसे पाठ्यक्रम के अतिरिक्त गतिविधियों में मुनाफा दिखता है . उसे क्रिसमस मेले में मुनाफा दिखता है . उसे प्रवेश के फ़ार्म में मुनाफा दिखता है . उसे स्कूल की कैंटीन और बस सेवा में भी मुनाफा दिखता है . स्कूली परीक्षा के पुराने प्रश्नों को बेचने में मुनाफा है . उसे पाठ के अंत में दिए अभ्यास के हल बेचने में मुनाफा दिखता है . उसे स्कूल के काल के बाद अतिरिक्त कक्षाओं में लाभ दिखता है . एक कक्षा के भर जाने पर नए अनुभाग खोलना मुनाफा है . विद्यालय के भर जाने पर दो पालियां चलाना मुनाफा है . एक स्कूल चल जाने और नाम होने पर दूसरा स्कूल खोलना मुनाफा है. अगर खुद पूँजी नही लगा सकते या बाज़ार बहुत दूर है तो नाम भी किराये पर दिया जा सकता है . यह तो स्कूली शिक्षा के उत्पादक का व्यवहार है .

उच्चशिक्षा में अभियान्त्रिकी शिक्षा के सन्दर्भ में हमने इस वर्ग के उत्पादक का मस्तिष्क भी देखा है . कमोबेश एक सी संरचना है . बस पैमाना अलग है . विन्यास अलग है . पापड़ अलग तरह से बेलने पड़ते हैं . पर उच्चतम शिक्षा या विश्वविद्यालयीन शिक्षा में यहाँ अभी कोई बहुत ज्यादा मॉडल नही हैं . स्नातकोत्तर शिक्षा या अनुसन्धान से जहाँ शिक्षा ज्ञान बढ़ाने का एक सम्मिलित प्रयास है . वहाँ अभी प्रयोग हो रहे हैं . नए कलेवर तैय्यार किये जा रहे हैं . बहुत से विचार सामने आ रहे हैं . अन्य देशों के अनुभवों का अध्ययन किया जा रहा है . अपनी गलतियों में सुधार करने पर बल है . ह्रास के कारणों का अध्ययन हो रहा है . लक्षणों का इलाज चल रहा है . राष्ट्रीय ज्ञान आयोग , यशपाल समिति , अम्बानी और बिरला समिति के प्रतिवेदन सरकारों के पास जमा हैं . साथ ही साथ जिन्हें नयी हवा में अंदर खतरा लग रहा है वो अंदर से. और जिन्हें बाहर खतरा लग रहा है वो बाहर से . बन्द जबान और मुखरता से विरोध दर्ज करा रहे हैं . विरोध और समर्थन के स्वर अपने अपने स्वार्थों के साथ बदल जाते हैं. जिसे खोने का डर है . उसके माथे पर बल पड़ेंगे ही . जिन्हें अवसर के बन्द दरवाजे खुलते दिखेंगे वो सस्वर समर्थन में जुट जायेंगे . परिवर्तन में पुराने मत , ढाँचे, व्यवहार , स्थापित मठों , मठाधीशो का जाना तय है . साथ ही नए सृजन की चुनौतियाँ हैं . और ग्राहक को भी नए बाज़ार से व्यवहार के लिए अपने को तैय्यार करना पड़ेगा .

अर्थव्यवस्था में उदारीकरण ने देश की मानसिकता में बदलाव अवश्य लाया है . पर इसके साथ ही बाज़ार ने नये भय को भी जन्म दिया है . पुराने अभ्यास के छुटने के भय के साथ नये व्यवहार को अभ्यास बनाने की चुनौती भी है . और नये प्रश्नों ने भी जन्म लिया है . पर प्रतिस्पर्धा से ग्राहक को लाभ मिला है अब तक हर क्षेत्र में . शिक्षा जगत में भी ऐसा ही होगा ऐसी आशा की जानी चाहिए . पर सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य होगा . बाजार से निर्वासित को बाजार में शामिल करना . उत्पादक , बाजार , और ग्राहक के अलावा यहाँ अर्थव्यवस्था , नियामक , नियंत्रक, सामाजिक संस्थाओं की बड़ी भूमिका है . और सबसे बढ़कर भूमिका है समाज में इस विषय पर लगातार चिंतन , मनन , संवाद , और संभाषण की . मुक्तिबोध के स्वर में  "अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे , ढहाने होंगे मठ और गढ़ सब ". 

6 अगस्त 2010

शिक्षा एक वस्तु – ग्राहक या खरीदार (अंश ३ क्रमशः)


असल में शिक्षा का मूल है हर व्यक्ति की अपने व्यक्तित्व से पहचान . अपनी संभावनाओं को पहचानने , परखने और उसे निखारने की प्रक्रिया . वो हर शिशु जो जन्मता है एक सन्देश लेकर आता है . शिक्षा उस सन्देश को ग्रहण करने उससे साक्षात्कार का औचित्य है . यह किसी के जैसा बनने का मंत्र नहीं . यह खुद के बनने का साधन है . यह मानव के द्वारा बड़ी बड़ी चीजों के करने का साधन नहीं है . यह छोटी छोटी चीजें वृहत्तम करने का यज्ञ है . एक बार शरीर के विभिन्न अंगों में अपनी महत्ता को लेकर विवाद हो गया . आँख, हाथ, पैर, जिह्वा, मस्तिष्क, पेट, मुख सबने अपनी-अपनी महत्ता जताने के लिए कार्य करना बंद कर दिया. फलस्वरूप शरीर ने कार्य बंद कर दिया. इस विशाल सृष्टि की काया के हम सब अलग-अलग अंग है. हर अंग अपनी-अपनी जगह अपना-अपना कार्य करेगा. मस्तिष्क का जो आकार और कार्य है वह-वही करेगा. वह हाथ का आकार नहीं ग्रहण कर सकता न ही उसका कार्य कर सकता है. अगर हर मनुष्य औषधि की खोज करने लग गए जाये तो उसका उत्पादन कौन करेगा. उसे एक स्थान से दूसरे पर कौन ले जायेगा? कौन उसे वितरित करेगा? कौन उसे खायेगा? कौन उसके आय व्यय का हिसाब रखेगा? हमें संगीतकार भी चाहिए और चिकित्सक भी. मनोवैज्ञानिक भी और मसखरा भी. कलाकार भी और सैनिक भी. हमें हर कार्य के लिए होनहार की जरुरत है. हमें हर हुनर के लिए होनहार की जरुरत है. हमें नए हुनर की जरुरत है. अगर सब अभियंता बन गए. तो हमें संगीत, चित्र, औषधि, वनस्पति, धातु, अंक सबमें अभियांत्रिकी ही मिलेगी. गेंदा, जुही, कमल, गुलाब, रात-रानी, गुलमोहर, चंपा , चमेली हर उद्यान में हर फूल खिलने दें . गेंदा को गुलाब और गुलाब को गेंदा बनाने की जिद छोड़नी होगी.
एक बार नागपुर से हावड़ा ट्रेन यात्रा में एक जर्मन युवती जो अपनी माँ के साथ भारत भ्रमण पर थी मुलाकात हुई . चर्चा के दौरान बातों-बातों में पता चला वहाँ ज्यादातर युवक-युवती स्कूल तक ही शिक्षा ग्रहण करते है. हां स्कूल शिक्षा में वर्ष सबके लिए अलग-अलग होते है. यह इसपर निर्भर करता है कि उन्होंने क्या पेशा चुना है. वह युवती वस्त्र डिजाइन का पाठ्यक्रम कर रही है/ थी . उसके अनुसार वहाँ छात्र आधा समय कक्षा में और आधा समय अपने चुने हुए पेशे के अनुसार उद्योग में व्यतीत करते है. पेशे के अनुसार स्कूली शिक्षा १५-१६ वर्षों तक जारी रहती है. उसने बताया कि विश्वविद्यालय में वही पढने जाते है जिनकी दिलचस्पी शोध में है. और जो समझते है वे इसके काबिल या योग्य है. बाकि लोग स्कूल में रहकर अपने चुने हुए पेशे का हुनर सीख कर उद्योग में लग जाते है. मालूम नहीं जर्मन युवती सच कह रही थी या नहीं. क्या सचमुच जर्मनी में ऐसी शिक्षा प्रणाली थी या है पता नहीं. पर उसके झूठ बोलने की कोई वजह भी तो नहीं थी. पर लगा जर्मनी में शिक्षा का बाज़ार अपने ग्राहक कि जरुरत के अनुसार ठीक-ठाक कार्य कर रहा है. ग्राहक की बातचीत में कोइ द्वेष या मलाल नहीं था. कोई असंतोष भी उसके स्वर में नहीं पाया. जो जर्मनी की शिक्षा के बारे में जानते है वे इस बात कि तस्दीक करेंगे तो ठीक रहेगा.
दूसरे देश के शिक्षा जगत से मेरा साबका न के बराबर है. बस सुनी-सुनी बाते है. मेरे पिता के मामाजी श्री श्याम सुन्दर जोशी. लोग उन्हें श्यामू सन्यासी के नाम से जानते है. आजसे लगभग तीन दशक पूर्व , वो शायद सिर्फ इंटर पास थे, टोक्यो विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए. उस समय उनकी उम्र ६०-६५ वर्ष रही होगी. उस उम्र में वहाँ रहते हुए उन्होंने ऐक्युप्रेशर की डाक्टरी पढाई में प्रवेश लिया था. और कालांतर में नागासाकी में एक चिकित्सक के रुप में कार्य भी किया. अन्य देशो की शिक्षा प्रणाली के ऐसे स्पर्श मुझे अचंभित जरुर करते है. हमारे देश की शिक्षा प्रणाली भी अचंभित करती है पर अपनी तरह से.
हमारे यहाँ बाज़ार में ग्राहक ने अपने को बाज़ार के अनुरूप ढाल लिया है आज़ादी के बाद पनपी समाजवादी सोच ने जीवन के हर पहलू पर अपना शिकंजा कसा . सरकार के बाहर कुछ भी नहीं था . नौकरियाँ सरकारी थीं . कला सरकारी थी . शिक्षा सरकारी थी . खेल सरकारी थे . संस्कृति सरकारी थी . सरकारी तंत्र में कौशल या हुनर की जरूरत सतही ज्ञान तक ही सीमित है. इनकी आवश्यकता न के बराबर थी . प्रजातंत्र में बहुमत की बात ही की जा रही है . कक्षा १२ वीं में इतिहास का विद्यार्थी था . पढ़ा था . दिल्ली के सुल्तान सूबों में सूबेदार नियुक्त करते थे . और सूबेदार ज़मींदार . आप लगान पहुंचाते रहिये और अपनी ज़मींदारी आप कैसे चलाते हैं इससे न सूबेदार को कुछ लेना देना था न सुल्तान को . न ही इससे की दिल्ली का लगान जुटाने के ऐवज में आप अपने लिए कितना लगान वसूलते हैं . आपकी जवाबदेही कहीं नहीं थी . हाँ आपकी वफ़ादारी की पूरी परख जरूर की जाती थी . निजी उद्योग भी इसी कसौटी पर जीते या मरते थे . हुनर , कौशल , काबीलियत अतिरेक पूर्ण बातें थी . न ये साधन थे ना साध्य . कमजोर राजा को कभी भी काबिल मंत्री नहीं भाये . वे खतरे की घंटी थे . उन्हें सुल्तान सल्तनत से , सूबेदार सूबेदारी से , और ज़मींदार अपनी ज़मींदारी से पहले मौके पर दूर खदेड़ देते . स्वयं की सुरक्षा पुख्ता करने के लिए . दरबारों में वैसे भी विदूषक , भांड , स्वांगी , विरदावली या प्रशस्ति गायकों के पनपने की परंपरा रही है . अन्य बिरले योग्यता - तंत्रों में लोगों को हुनर के साथ ओहदे प्रदत्त किये जाते हैं . पर ज़मींदारी प्रथा में ओहदा हुनर का पर्याय मान लिया जाता है .मसलन साधारण तौर पर जो विज्ञान में शोध या अनुसंधान का कार्य करता है उसे वैज्ञानिक कहते हैं . पर यहाँ वैज्ञानिक एक ओहदा होकर रह गया है . आप सारा जीवन इस ओहदे के साथ विज्ञान से कोसों दूर रहकर वैज्ञानिक की तरह हाव-भाव दिखाकर या उसके जैसा अभिनय करके सफलता पूर्वक गुज़ार सकते हैं . हाँ जी-हुजूरी , चापलूसी से गुरेज महंगा पड़ सकता है . वैसे भी हमारे प्रजातंत्र में टंकण या आशुलिपि के अलावा अन्य किसी कौशल परीक्षा का चयन करते वक्त आयोजन नहीं होता . सब मौखिक आचरण हैं . और टंकण और / या आशुलिपि जानने वाले सुल्तान , सूबेदार , या ज़मींदार के निजी सचिवों की अगाध शक्तिसम्पन्नता और प्रभावशीलता पर आज़ादी से अब तक पर एक पूरा महाकाव्य लिखा जा सकता है . अगर आपका ओहदा लेखा –परीक्षक का है तो अगर न आप लेखा जानते हैं न परीक्षण . कुछ व्यवधान नहीं होगा . प्रवेश के लिए चाहिए उपाधि . जिसे आप हासिल कर अपनी योग्यता प्रमाणित कर चुके हैं . ओहदा पाकर आप में हुनर भी आ ही जायेगा .
ऐसे वातावरण में मित्रों की माने तो – किस किस को सोचिये , किस किस को रोइए , आराम बड़ी चीज है , मुंह ढँक कर सोइए . पर ग्राहक के लिए इस वातावरण में बाजार जो लाया वह सार –संक्षेप में इस प्रकार है .
  1. ज्यादातर उच्च शिक्षा सरकारी क्षेत्र में रही.
  2. ज्यादातर उच्च शिक्षा संस्थानों के लाइसेंस, परमिट, कोटा राजनीतिज्ञों , नौकरशाहो या छोटे मोटे कारोबारीयों ने हस्तगित कर लिए.
  3. इनके लिए यह करना अज्ञात स्रोतों के अर्जित आय को जायज करने का उपक्रम भी था.
  4. इस क्षेत्र में अभियांत्रिकी की लालसा ग्राहक में ज्यादा थी और इसके साथ प्रबंधशास्त्र का आकर्षण. अतएव इन की ज्यादातर दुकाने बाज़ार में आई.
  5. चिकित्साशास्त्र की भी मांग कम नहीं है. पर इसमे निवेश भी ज्यादा है.
  6. AICTE और MCI यूँ ही कुख्यात नहीं हुए.
  7. बहुत से शिक्षाविद् और शिक्षाशास्त्री या शिक्षा जगत से जुड़े लोग भी इस बाज़ार में आ गए.
  8. शोध कर देखें ज्यादातर संस्थानों के प्रवर्ता कौन हैं.
  9. बाज़ार, संस्थान, उपाधि सब पर नियंत्रण की पहचान बना 'मान्यता प्राप्त'.
  10. हमारे यहाँ नकली वह भी नवाजा गया जो असली से कहीं बेहतर होने पर भी 'मान्यता प्राप्त' नहीं की श्रेणी में था.
  11. डिग्रियाँ, हर तरह की डिग्रियाँ, डिग्रियाँ ही डिग्रियाँ उपलब्ध की गईं.
  12. मान्यता प्राप्त डिग्रियों के लिए मान्यता प्राप्त संस्थान जरुरी थे.
  13. मान्यता लेना देना एक व्यावसायिक गतिविधी हो गयी .
  14. मान्यता प्राप्त संस्थान मान्यता प्राप्त डिग्री के साथ गैर मान्य भी खपाने लगे.भोले-भाले ग्राहकों को .
  15. एक राज्य ने एक वर्ष में सैकड़ों विश्वविद्यालय बनाने की शीर्षक पंक्ति भी बनाई.
  16. इसमे भी कुछ अग्रणी और फिसड्डी राज्य साबित हुए. पांच राज्यों (महाराष्ट्र और चार दक्षिण के ) में ६३% अभियांत्रिकी महाविद्यालय हैं .
  17. मान्यता प्राप्त संस्थानों ने मान्यता प्राप्त उपाधि वितरण के लिए देश-विदेश में एजेंट नियुक्त कर दिए.
  18. सैकड़ो प्रवेश परीक्षा, सैकड़ो प्रवेश के आवेदन पत्र, सैकड़ो परीक्षाओ के सैकड़ो केंद्र, सभी परीक्षाओं के लिए सैकड़ो प्रश्न पत्र, प्रश्न पत्र बनाने वाले , उनके मूल्यांकनकर्ता, परीक्षा की प्रक्रिया संपन्न करने वाले, फार्म बेचने वाले केंद्र, रिज़ल्ट भेजने वाले वेबसाइट और टेलिकॉम कंपनिया. सब अपने-अपने हिस्से का पैसा बटोर रहे हैं.
  19. जहाँ प्रवेश परीक्षा नहीं अंक . वहाँ हर कोई ज्यादा से ज्यादा अंक देने और अंक पाने की जुगत में लगा रहता है और पकड़े जाने पर भोले माता पिता कहते है वो नहीं जानते थे. 'अंक तालिका नकली है'. प्रतिशत बढ़ता गया. सत्तर, अस्सी, नब्बे और फिर सौ में सौ. और वह भी खुदरा नहीं थोक में. सैकड़ो , जो सौ में सौ पा रहे हैं. यह होड़ एक राज्य से दूसरे राज्य में फ़ैल गई. मेरी कमीज तुम्हारी कमीज से सफ़ेद कैसे. अब ग्राहक में क्षोभ/ कुंठा इस बात से है की ९८-९९ प्रतिशत पाकर भी वह पायदान में काफी नीचे है.
  20. अब कुछ संस्थान जो मान्यता नहीं प्राप्त कर सके वो विदेशी संस्थानों का नाम अपने से जोडने लगे है. स्थानापन्न के तौर पर.
  21. कुछ जो उपाधि के कारोबार में नहीं आ सके वो प्रमाणन में उतर गए. और कुछ विदेशी प्रमाणन की तर्ज पर हमनाम या मिलते जुलते नाम के प्रमाणन आरंभ करके.
  22. और फिर बॉम्बे क्लब की तर्ज पर विदेशी संस्थाओं के आने पर विरोध के स्वर मुखरित हुए. भारतीय उद्योग के संरक्षण के नाम पर.
  23. उच्च शिक्षा में शिक्षा पर ध्यान कम था. परीक्षा मुख्य हो गयी. अतएव जाहिर था प्रश्नपत्र गुपचुप तौर पर और खुलेआम बिकने का कारोबार भी हुआ.
  24. उच्च शिक्षा में नियुक्ति के लिए डाक्टर की उपाधि की अनिवार्यता के साथ इसे देने-दिलाने का व्यवसाय भी फला फूला.
  25. जो वास्तव में उच्च शिक्षा चाहते थे वे उन बाजारों का रुख कर गए जहाँ यह उपलब्ध थी.
  26. तकनीकी शिक्षा के उच्चतम शिखर भारतीय तकनीकी संस्थान का कोई बिरला स्नातक ही वहाँ स्नातकोत्तर / डाक्टरेट उपाधि का प्रयास करता है. क्यों ? उस शिखर में चार-पांच साल बिताकर उससे रूबरू होने के बावजूद. जबकि देश का यह गौरव है. जहाँ करोड़ो की पूंजी लगती है. जहा ऊँची-ऊँची उपाधि वाले ऊँची तनख्वाहो और सहूलियतो से नियोग होते है. जिन्हें सरकारी शोध का बड़ा हिस्सा भी बाँटा जाता है. प्राप्य है .
  27. इस उच्च शिक्षा नियुक्ति में जातीय, क्षेत्रीय, और खेमाबंदी जिसे कुछ लोग माफ़िया तक कह डालते है शामिल होते है. पुत्र, दामाद नियुक्ति का भाई-भतीजावाद . जिसमे नियुक्ति के मानकों में शिथिलता का अपवाद भी शामिल है. प्रो. सी. एन. आर. राव जो यू. पी. ए. सरकार में प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाह परिषद के अध्यक्ष है उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया की एक विश्वविद्यालय के एक विभाग में विभागाध्यक्ष से लेकर सब प्राध्यापक सिंह उपनाम के है. या किसी राज्य में कुलपति नियुक्ति कुल के उपनाम पर निर्धारित होती है .
  28. देश में लंबे काल तक कांग्रेस का शासन रहा है. और साम्यवादी देशों के खेमे से नजदीकी रही है. साम्यवादी पार्टियों से सहयोगिता / भागीदारी रही है. अतएव आश्चर्य क्या कि उच्च शिक्षा के अनेक संस्थानों में साम्यवादी विचारधारा के प्राध्यापक, कुलपति, इतिहासकार, छात्र राजनीती कि राजनैतिक पार्टिया बहुतायत से विराजमान हों. कांग्रेसी राजनीतिज्ञ तो वैसे भी स्टीफन , दून स्कूलों, कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड की परंपरा के रहे हैं. सहयोगियों में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व इस भांति भी तो विद्यमान हो सकता है.
  29. इसके विपरीत दक्षिण पंथी ज्योतिष शास्त्र, सरस्वती वंदना , वन्देमातरम, सूर्य नमस्कार, और ताजमहल हिंदू परंपरा का निर्माण था. पर शोध करते व्यस्त रहे.
  30. शिक्षा में एक झगड़ा भाषा का रहा. कुछ प्रदेशो में यह उर्दू विरोधी, अंग्रेजी विरोधी के रूप में सामने आया. और कही-कही हिंदी विरोधी के रूप में. बंगाल में अभी हाल में ऐतिहासिक भूल को सुधार कर किश्तों में अंग्रेजी माध्यम को वापिस लाया जा रहा है.
  31. विज्ञान में पढ़ाई और शोध, पदार्थो, प्रक्रियाओं, विचारों, यंत्रों, औजारों और बुद्धि के चिंतन द्वारा संपन्न होता है या यह इस बात पर निर्भर होता है कि हम उसे किस भाषा में पुकारते या व्यक्त करते है? जर्मनी, जापान, फ़्रांस इसमें भाषायी औचित्य को अंगूठा दिखा चुके है. और चीन को हमारे उद्योगपति, नौकरशाह , शिक्षाविद, अंग्रेजी ज्ञान में हमसे काफी पिछड़ा बताकर गौरवान्वित ही होते है.
  32. भारत कि सौ करोड़ जनता को साक्षर बनाने में इतने पापड़ बेलने पड़ रहे है. इन्हें अंग्रेजी साक्षर बनाने में तो शायद सदियाँ लग जाएँ.
  33. शिक्षा विशेषज्ञ स्कूली शिक्षा जहाँ पाठ्यपुस्तको का खरीद वितरण एक दुधारी गाय कि तरह पूजी जाती है. उसी तरह उच्च शिक्षा संस्थान जहाँ करोड़ो की शोधग्रंथो और किताबो की आपूर्ति शोध का विषय है.
  34. पिछले दशकों में उच्च शिक्षा संस्थानों और कतिपय विद्यालयों में संगणक शिक्षा, संगणक खरीद, स्थानीय क्षेत्र जालक्रम, ब्रॉड-बैंड खरीद, नेटवर्क बिछाना और उसकी देख रेख संस्थान, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक और दुधारी गाय की नई नस्ल के रूप में उभरी है.
  35. निचले स्तरों पर यह आपरेशन ब्लैक-बोर्ड, साक्षरता मिशन, प्रौढ़- शिक्षा, मिड-डे-मील की दुधारी गायों की नयी नस्लो के रूप में उभरी है.

    हो सकता है बाज़ार के बहुत से पहलू जो ग्राहक की मांग को रखकर सामने आए हैं छूट गए हों . पर जब हम उत्पादकों की बात करेंगे. और बाज़ार के नियंत्रक और संचालक की बात करेंगे तो इन पर गौर होगा. अब ग्राहक को लेकर स्वस्थ / प्रतियोगी बाज़ार हेतु कुछ मूल प्रस्तावना रखूँगा.
  1. स्कूली शिक्षा में पूरा समाज सहभागिता करे .
  2. स्कूल निवास स्थलों के पास हों . जिससे स्थानीय समाज उसमे भागीदारी कर सके . सबके बच्चों के लिए एक ही विद्यालय हों . नौकरशाह , गरीब , उद्योगपति , व्यापारी , श्रमिक , मध्यमवर्ग , राजनेता सबके .
  3. सबके शामिल होने से उसमे शिक्षा की तिलांजलि के अवसर कम होंगे .
  4. स्कूली शिक्षा मातृ भाषा में हो . शोधकर्ताओं के अनुसार शिशु भाषा तेजी से सीखता है . अतेव उन्हें कई कई देशी विदेशी भाषा सीखने के अवसर उपलब्ध कराएँ जाएँ .
  5. शिक्षा उम्र के लिहाज से नहीं बुद्धि विकास की गति से हो .
  6. शिक्षा छात्र के ग्रहण करने की गति से हो .
  7. ज्यादा तेज ग्रहण करने वालों को आगे बढ़ा दिया जाये .
  8. जिज्ञासा और प्रश्न करने और उत्तर खोजने की प्रवृत्ती को बढ़ावा दिया जाये .
  9. शिक्षा किसी भी स्तर पर वजनी न लगे .
  10. हर स्कूल जाने वाली वयस् का शिशु विद्यालय में हो .
  11. शिक्षा का खर्च माता –पिता उठायें . उनकी सामर्थ्य न होने पर समाज . और स्वयंसेवी संस्थाएं . और बाकि सबका सरकार . खर्च विद्यार्थी को दिया जाये . या उसकी तरफ से विद्यालय को .
  12. उच्च शिक्षा का पूर्ण लाभ व्यक्ति उठाता है . या उसके परिजन . आर्थिक लाभ . ज्ञान संवर्धन वापस समाज को अवश्य जाता है . अतैव व्यय व्यक्ति पर हो .
  13. ऋण उपलब्ध हो .
  14. जिन संकायों की मांग कम है उन्हें बढ़ावा देने को संस्थाएं या सरकार यह ऋण मेधाव्रृति के रूप में दे सकती है . बाज़ार भी विशेष कालखण्ड या स्थापित क्षमता के उपयोग या किसी उत्पाद के न सरकने पर ग्राहकों को प्रलोभन या छूट देता ही है . इससे मांग और आपूर्ति में संतुलन लाया जाता है .
  15. उच्च शिक्षा और शोध के लिए रुचि और क्षमता ही अनिवार्यता हो . हमारे सबसे उर्वर मस्तिष्कों को ज्ञान – संवर्धन के लिए आकर्षित करना ही होगा . सारी बंदिशें हटानी होंगी . सारे बहानों की गुंजाईश खत्म करनी होगी . यह आगे की पीढ़ी और सभ्यता के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व और कदम है .
  16. शोध और ज्ञान या शिक्षा के विभाजन को खत्म करना होगा . शोध को संस्थागत सहूलियतें देते हुए भी ज्ञान की पिपासा और ज्वाला से जूझते एकल व्यक्ति को सौंप देना होगा .
  17. उपाधि की अनिवार्यता समाप्त की जाये . कौशल या हुनर की ओर जाया जाये . शिक्षा ही नहीं पूरे समाज को योग्यता मुखी बनाना होगा .
  18. छात्र संस्थाओं के जीवन से राजनीती को समाप्त किया जाये .
  19. छात्र उच्च शिक्षा के छात्र वयस्क मस्तिष्क के प्रतिभाशाली काफी जिम्मेदार व्यक्तिव हैं . उन्हें प्रबंधन , समागमों , आयोजनों का भार सौंप देना चाहिए .
  20. प्रवेश परीक्षा एक ही हो . और वह भी योग्यता – रुझान की परख के लिए .
  21. ज्ञान - प्रतिभा के अलावा प्रतिभा और व्यक्तित्व के अन्य पक्षों को भी तरजीह दी जाये .
  22. उपाधि की अनिवार्यता के बदले कौशल की अनिवार्यता हेतु व्यावसायिक शिक्षण पर ध्यान दे . स्कूली और व्यावसायिक शिक्षा को एकीकृत करना होगा . स्कूली शिक्षा का सैद्धांतिक पक्ष विद्यालय में और प्रायोगिक पक्ष संबद्ध उद्योग में हो .
  23. इससे शिक्षा और उद्योग की जरूरतों में सामंजस्य हो पायेगा . उनमे अंतर भी पट जायेगा .
  24. हर पेशे के लिए विद्यालय हो . संगीत के गुरुकुल , नाट्य ग्राम , हस्तशिल्प के गुरु इन सब अनौपचारिक शिक्षा समूलों को लोकाचार शिक्षण में संकल करना होगा .
  25. हर पेशे के लिए प्रमाणन का प्रबंध हो . ताकि विद्यालयों द्वारा प्रदत्त शिक्षा का स्वतंत्र प्रमाणन हो सके .
  26. मूल्य देने वाला स्वयं लागत-लाभ का विश्लेषण कर लेता है . और बाज़ार को उत्पाद सही कीमत पर , उचित गुणवत्ता का देने पर मजबूर करता है . यह उसके उत्पादकों को निपुण और दक्ष भी बनाता है .
  27. मूल्य देने वाला जवाबदेही भी लाता है अपने प्रति . वह इसकी मांग भी करता है . यह स्वायत्तता को स्वछंदता में परिवर्तित होने को भी स्वयमेव नियंत्रित करता है .
  28. उच्च गुणवत्ता वाले अपनी गुणवत्ता के संवर्धन के लिए और उसे निरंतर प्रश्रित करने के लिए उच्च गुणवत्ता की चाह वाले ग्राहकों को किसी भी कीमत पर अपने प्रतिद्वंदियों के पास नहीं जाने देते . शिक्षा के बाज़ार में शिक्षा का ग्राहक (छात्र ) उत्पाद का हिस्सा भी जो ठहरा . वह उत्पाद का सृजक , स्वयं उत्पाद , और उसका उपभोक्ता भी है .
  29. इसी लिए विश्वविद्यालय ऐसी प्रयोगशालाएं ज्यादा हैं जहाँ प्रशिक्षु और शिक्षक मिलकर नए सृजन का प्रयोग करते हैं . न की ऐसे कारखाने जहाँ मशीन में एक ओर कच्चा माल डाला जाये और और दूसरी तरफ से तैयार माल निकल आये .
  30. ऐसे संस्थान ऐसी प्रतिभा की खोज भी करेंगे . और संभावनों की पहचान भी . ताकि पारस के उपयोग से धातु सोना हो जाये .
  31. शिक्षा धीरे सीखने वालों को दौड़ा कर उनके आत्मबोध को न तोड़े . और उन्हें कुंठा के सागर में गोते लगाने के लिए न छोड़े. और शिक्षा अतिमेधावी विरलों को उनके पाँव बांधकर उनकी उड़ान के पर न काटे .शिष्यों को तदनुसार गुरुओं को सौंपकर ही समाज वृहत्तर उद्देश्यों को प्राप्त कर सकेगा .
  32. कक्षा वैसे भी औसत के पैमाने पर संगोष्ठीत है . यह औसत विद्यार्थियों के समूह से ही न्याय कर पाती है . औसत से कुछ ज्यादा नीचे या औसत से कही ऊपर के विद्यार्थीयों के लिए विशेषज्ञ शिक्षक और विशेष शिक्षा प्रबंध की जरूरत है . यह उन्हें औसत या सामान्य से परे ढकेलनेवाला आयोजन नहीं है . यह सामान्य से हटकर विशेष प्रबंध की जरूरत की ओर इंगित है . यह उनके लिए भी आवश्यक है . बाध्यता कदापि नहीं .  
जानता हूँ मेरी प्रस्तावना में ज्यादातर विचार आदर्शवादी हैं . कपोल-कल्पित समाज का दिवा-स्वप्न . पर इधर आर्थिक क्रांति की तर्ज पर शैक्षणिक जगत में भी शैक्षणिक सुधारों की हलचल है . सब अपनी पतंग उड़ा रहे हैं . मैं अकिंचन क्यों पीछे रहूँ ? आखिर १८-१९ वर्ष छात्र रहा हूँ . पांच वर्ष शिक्षण किया है . और विगत सत्रह वर्षों से शोध संस्थानों और उच्च शिक्षा जगत में विचरण कर रहा हूँ . शिक्षा , मनोविज्ञान , दर्शन , संस्कृति , साहित्य , अर्थव्यवस्था पसंदीदा विषय रहे हैं . इनसे संबंधित बहस आकर्षित करती है . वाक्-विवाद करता हूँ . टिपण्णी करता हूँ . घटनाओं , धारा , और प्रव्रृत्ति पर नज़र रखता हूँ . सम्बंधित समाचारों पर दृष्टिपात है . पत्रों , परिपत्रों , शोधपत्रों , संगोष्ठियों , वार्तालापों , साक्षात्कारों , लेखों, प्रतिवेदनों का संग्रह करता हूँ , पढता और सुनता भी हूँ . देश – विदेश सब जगहों के .
ग्राहक पर बहस इतनी ही . आगे शिक्षा के उत्पादकों , उनकी संरचना , अधोरचना, उद्देश्यों , गतिविधियों , प्रबंधन पर नज़र दौड़ाएंगे . ग्राहक अब स्वतंत्र है .
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