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6 जनवरी 2012

भूल गए

बचपन में दादी के किस्से-कहानियाँ 
माँ की लोरियाँ 
रेडियो पर बजती चैती , कजरी 
सरसों की मालिश , छत की धूप 
धूत - अवधूत 
पर नींद गहरी
सुनी, गुनी 
खाए , फूल गए 
भूल गए .


आदर्श नारी 
आदर्श बालक 
हमारे पूर्वज 
सब सहज   
पढ़ा , बनारस रहा 
स्कूल गए
बाकी सब भूल गए .


कवितायें , कहानियाँ , उपन्यास 
उपनिषद , स्मृतियाँ , इतिहास 
भाषा , विज्ञान , गणित 
विषय मूल , विषय अतिरिक्त 
प्रबंधन , वाणिज्य 
भौतिकी , जीव , रसायन 
अनुक्रमणिका , पाठ , प्राक्कथन 
उपसंहार 
प्रश्न और उत्तर 
और प्रश्न , और उत्तर 
व्याकरण , विश्लेषण 
संविधान , कानून , मनोविज्ञान 
साहित्य और समाज 
संस्कृति , व्यंग्य , उपहास 
सबने छला
कौन बचा भला 
प्रकृति का दोहन 
उत्पादन , विपणन
आये सब झंझावात 
एक के बाद , एक निष्पात 
परीक्षा दर परीक्षा 
होती रही समीक्षा 
उतीर्ण , अनुतीर्ण 
फला , अफला 
पादप फला - फूला 
ऋतुएँ हुई अवतीर्ण 
कभी पादप जीर्ण 
नये किसलय , नयी काया 
पतझड़ वसंत आया 
कोंपलें आती रहीं 
ग्रीष्म कुछ ताप लाया 
बढ़ती रही शाखा -प्रशाखा 
पाताल विस्तृत जड़ 
नभ प्रसरित चेतन 
यौवन का नया राग 
गाये विहाग 
आये कुछ शूल नये 
फिर सब भूल गए .


यहाँ वहाँ घूमा 
अँजुरी में ओस ली 
माथे पे माटी 
झील की शांति 
लौ की काँति 
समुद्र का गर्जन 
भ्रमर का गुंजन 
ग्राम कि निस्तब्धता 
शहर का कोलाहल 
कभी मन शांत स्थिर 
कभी वाचाल , पागल 
देखा , सुना , गुना , भान , विपान 
सब विस्मृत , सब वितान
एक मृगमरीचिका 
शब्द है छलावा 
पर्त दर  पर्त 
सत्य हो निर्वस्त्र 
ज्ञान का आवरण 
सबके मूल गए 
फिर सब भूल गए .

3 जनवरी 2012

खत

समय पे लिखा था
हर्फ़ - हर्फ़
अक्षर - अक्षर पढ़ा था
ज़िंदगी ने गढा था
कोई तहरीर नहीं थी
गूँजता था
ओंकार
ध्वनि - प्रतिध्वनि - ध्वनि
रोम रोम में कंपन
छिद्र - छिद्र में टंकार
ओंकार
किसी तूफ़ान के पूर्व का हुंकार
विचलित सा कर जाता
ह्रदय था कंपकपाता
फिर निःशब्द
शांत
शून्य
स्थिर निरंतर
अन्धकार.
कोई उत्तर नहीं , कोई प्रत्युत्तर नहीं
न ही कोई कामना
स्थिरप्रज्ञ हो जैसे
प्रश्न सारे , अनगिनत असंख्य तारे
न दिवा - न रात्रि
कौन है जो मौन मुझको पुकारे
है किसका आमंत्रण
न कोई क्षितिज  न कोई किनारा
यहाँ
सब स्थिर
सब स्थित
न जरा घटता न जुड़ता
होता सिर्फ प्रस्फुटित
क्या यही है संपूर्ण कविता
क्या आदि से जिसे चाहा , ढूँढा
वो सब समय यहीं था
जिसका न था आदि,  न अनादि
जो था स्वयं में संपूर्ण
मैं अपनी ही
सीमाओं में बद्ध
उसे नाप रहा था
भांप रहा था .
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