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10 फ़रवरी 2012

प्राक्कथन

मैं न तो समय हूँ , न सत्ता . न मेरे पास दिव्यदृष्टि है , न काल-यंत्र. इतिहास जो भी लिखे , जब भी लिखे , दृष्टी है , कल्पना है , टुकड़ा है , अनुमान है . मधु यामिनी पर खिंचा हुआ एक चित्र . जिसमे उपस्थित युगल के मन में क्या चल रहा है , था , आसपास उपस्थित कोई क्या लिखेगा . और युगल द्वय अगर डायरी दां हों , तो उनका दरयाफ्त अलग होगा , रोज़नामचा अलग होगा , निवेदन अलग होगा , प्रणय अलग होगा . इतिहास द्वैत है .


इसलिए मैं सोचता हूँ , इतिहास लिखने की वस्तु है , पढ़ने की वस्तु है , इतिहास समीक्षा , टीका , टिप्पणी की वस्तु नहीं है . नज़र है , जिसे कोटि-कोटि नज़रें देखें उसके कोटि-कोटि नज़ारे होंगे , कोटि -कोटि नज़रिया होगा . बैरन बन गई - गोरी तेरी नजरिया.


मैं इतिहास नहीं लिखता , न समालोचक हूँ , पढ़ी -पढाई बातों को लिखता हूँ , नज़र खराब है , चश्मा पहन रक्खा है , उसी चश्मे से देखता हूँ . मेरा नंबर , आंखों का भाई , बहुत ज्यादा है , मेरा चश्मा आप पहन लें , तो कुछ दिखेगा भी नहीं .


एक कविता , पद्य , गद्यनुमा पद्य लिखना शुरू किया था , इतिहास को लेकर , बहुत बड़ा हो गया और अभी पूरा भी नहीं हुआ . तब बचपन में पत्रिकाओं में किश्त-वार आती कहानियाँ जेहन में आयीं . क्रमशः, अगले अंक में जारी , गतांक से आगे , पिछले अंक से जारी , अब आगे की कहानी .


सोचा यही तरीका अपनाऊं  . आप भी मुझे किश्तों में झेल लिजीए . कोई किश्त नहीं चुका पाया तो बैंक का क़र्ज़ तो है नहीं जो आप गुंडे भिजवा देंगे . वैसे इतिहास है तो - काशी का गुंडा - एक कहानी का शीर्षक था यह भी .   या सिर्फ गुंडा शीर्षक था , लेखक काशी का था , वैसे काशीनाथ सिंह यकीनन काशी के हैं . वही काशी का अस्सी वाले ! भई संतन की भीड़ वाला घाट तो चित्रकूट में था पर तुलसी दास जी अस्सी पर रहते थे , जिन्होंने यह लिखा. वरुणा और अस्सी के इसी क्षेत्र को वाराणसी कहते हैं . काशीनाथ सिंह के भाई नामवर जी से सब बड़े डरते हैं , ऐसा सुना है , पढ़ा है . हिन्दी वाले आलोचक एक ही मानते हैं . बनारस में गाली देने और सुनने-सुनाने की परंपरा रही है . अगर संस्कृति का हिस्सा हो तो लोग प्यार से गाली भी सुनने में यकीन रखते हैं . आप भी दिल खोल के दें - कुछ दिन मैं भी काशी में रहा हूँ , बुरा नहीं मानूंगा .

11 जनवरी 2012

सच की तलाश

कितनी ज़द्दोज़हद
बड़ी बड़ी तरकीबें 
सबने सजाये सबने उठाये
दूसरों के कंधो पर  सलीबें
ईसा के दिखाए मार्ग पर प्रशस्त 
सच चल पड़ा बनिस्पत .

सच को बोएँ, उगायें 
लाए कुछ विदेशी , कुछ देशी 
लाये ज़दीद , अदद नस्लें 
जितनी जिसकी खेती 
उतनी ज़हद , वैसी फसलें 
अब कुछ संकर , जातियाँ-प्रजातियाँ
देशी पतुरिया , गिटपिटाए
माटी लगी बोली , भाषा है उपनिवेश
पच्छिम से आयी आंग्ल 
फटाफट पहनावा 
फर्राटे से लिपट जावा 
मेम के  ऐश ही ऐश 
छानबीन हुई , जाँच-पड़ताल हुई 
एक बार हुई , बार बार कराई 
सच का भ्रूण देखा परखा 
सच नर है या मादा 
नहीं था इरादा 
हत्या का 
उसका जीना , तिल-तिल मरना 
किसने कहा क्रांति है , आगे मकरसंक्रांति है 
बुद्धिजीवी संस्कार है
जातिवादी समीकरण है
थोड़ा गणित है , नया व्याकरण है  
थोड़ा रूढ़ी है , थोड़ा साम्यवादी है 
सिर्फ सांठगाठ है , थोड़ा लेनदेन है 
बुद्धि से लक्ष्मी का कब हुआ मेल है
क्योँ बोलो निकम्मा है 
समाज का दर्पण है 
प्रजातंत्र का चौथा खम्बा है .
सच का बोलबाला है 
क्या हुआ , अगर अखबार काला है .

आपने महाभारत पढ़ी है ?
किसे हडबड़ी है
देखो कितने पात्र है 
सब आसपास हैं 
अपनी अपनी ज़िंदगियों से ऊबे - उकताए 
सन्निपात ज्वर में सब बडबड़ाएं
अश्वत्थामा हन्तो , नरो वा कुंजरो वा 
क़ानून का पता नहीं 
धृतराष्ट्र अंधा था 
गांधारी ने बांधी थी पट्टी ?
क्या पता ? नहीं सकता .
किन्तु कुंती को नहीं था दिखता 
नहीं मैं आँखों का डॉक्टर नहीं 
नहीं द्रौपदी पिज्जा नहीं थी बेटी !!
फिर पाँच लोग कैसे बाँट के खाते 
तुमने ठीक ही पूछा 
कुंती को नहीं था दिखता 
परन्तु लोग बताते हैं 
धृतराष्ट्र अंधा था 
गांधारी ने बांधी थी पट्टी .
पात्र स्मृतियों में आते हैं , जाते हैं 
हम सब गीता उठाते हैं ,
माथे से लगाते हैं 
लोग हाथ रखकर कसम खाते हैं 
- जो भी कहूँगा , सच कहूँगा , सच के अलावा कुछ नहीं कहूँगा .
तुम झूठ बोलती हो ,
मैं क्योँ हसूँगा ??
महाभारत के पात्र 
पॉकेट में पड़ी रेज़गारी हैं ,
आप इसे भगवान के नाम पर चढ़ा दीजिए
किसी भिखारी की तरफ उछाल दीजिए 
किसी नदी में डाल दीजिए 
किसी इच्छापूर्ति फव्वारे में इस्तेमाल कीजिये 
किसी बच्चे के कौतूहल की भर दीजिए अँजुरी 
और अगर अंतरात्मा की आवाज़ जो कचोटे 
तो चित भी मेरी पट भी मेरी 
सिक्का निकालिए 
जो खोटा है खरा है 
- क्या बडबडा रहा हूँ मैं ??
सच की खोज में लगा हूँ ??
नहीं टाइमपास कर रहा था .
ठीक कहते हैं 
इसके लिए आपके पास बेहतर आइडिया है 
मुन्ना लगाओ तो -
"राजा दिल मांगे चव्वनी उछाल के "  
(नेपथ्य में स्वर : सच की खोज के लिए जाँचआयोग की नियुक्ति की जाती है 
रिपोर्ट आने पर सार्वजनिक की जाएगी 
सच सामने लाना है , सच को सामने लाएँगे
सच को सामने आना ही होगा 
ये हमारा आपसे वादा है 
एक ईमानदार, स्वच्छ , और पारदर्शी प्रशासन के लिए हम कटिबद्ध हैं )
वैसे यहाँ प्रासंगिक नहीं है 
पर आपकी जानकारी के लिए -
अर्धसत्य के निर्देशक गोविन्द निहलानी थे .

6 जनवरी 2012

भूल गए

बचपन में दादी के किस्से-कहानियाँ 
माँ की लोरियाँ 
रेडियो पर बजती चैती , कजरी 
सरसों की मालिश , छत की धूप 
धूत - अवधूत 
पर नींद गहरी
सुनी, गुनी 
खाए , फूल गए 
भूल गए .


आदर्श नारी 
आदर्श बालक 
हमारे पूर्वज 
सब सहज   
पढ़ा , बनारस रहा 
स्कूल गए
बाकी सब भूल गए .


कवितायें , कहानियाँ , उपन्यास 
उपनिषद , स्मृतियाँ , इतिहास 
भाषा , विज्ञान , गणित 
विषय मूल , विषय अतिरिक्त 
प्रबंधन , वाणिज्य 
भौतिकी , जीव , रसायन 
अनुक्रमणिका , पाठ , प्राक्कथन 
उपसंहार 
प्रश्न और उत्तर 
और प्रश्न , और उत्तर 
व्याकरण , विश्लेषण 
संविधान , कानून , मनोविज्ञान 
साहित्य और समाज 
संस्कृति , व्यंग्य , उपहास 
सबने छला
कौन बचा भला 
प्रकृति का दोहन 
उत्पादन , विपणन
आये सब झंझावात 
एक के बाद , एक निष्पात 
परीक्षा दर परीक्षा 
होती रही समीक्षा 
उतीर्ण , अनुतीर्ण 
फला , अफला 
पादप फला - फूला 
ऋतुएँ हुई अवतीर्ण 
कभी पादप जीर्ण 
नये किसलय , नयी काया 
पतझड़ वसंत आया 
कोंपलें आती रहीं 
ग्रीष्म कुछ ताप लाया 
बढ़ती रही शाखा -प्रशाखा 
पाताल विस्तृत जड़ 
नभ प्रसरित चेतन 
यौवन का नया राग 
गाये विहाग 
आये कुछ शूल नये 
फिर सब भूल गए .


यहाँ वहाँ घूमा 
अँजुरी में ओस ली 
माथे पे माटी 
झील की शांति 
लौ की काँति 
समुद्र का गर्जन 
भ्रमर का गुंजन 
ग्राम कि निस्तब्धता 
शहर का कोलाहल 
कभी मन शांत स्थिर 
कभी वाचाल , पागल 
देखा , सुना , गुना , भान , विपान 
सब विस्मृत , सब वितान
एक मृगमरीचिका 
शब्द है छलावा 
पर्त दर  पर्त 
सत्य हो निर्वस्त्र 
ज्ञान का आवरण 
सबके मूल गए 
फिर सब भूल गए .
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