आदमी के साथ होती हैं परछाइयाँ ,
जिंदगी बस धूप - छावं नहीं ,
जिंदगी सिर्फ नदी - नाव नहीं ,
जिंदगी है बहुत कुछ फलसफे के अलावा ,
जिंदगी सिर्फ सुविधा - अभाव नहीं .
आइये देखे हजारों रंग यहाँ ,
आदमी के है कितने ढंग यहाँ ,
घर द्वार बहुत बड़े , दिल तंग यहाँ ,
नहीं अब नहीं कोई मलंग यहाँ .
अब नहीं बाकि नदी की गहराइयाँ ,
बाँधों में सब पानी बंद यहाँ ,
रह गयी है बस उसकी परछाइयाँ .
आदमी की उम्र बढ़ गयी तो क्या हुआ ?
बढ़ गया आकार खिलौनों का यहाँ ,
अब सीता को नहीं चाहिए सिर्फ मृग स्वर्ण समान,
अब नीता को मिलेगा पुष्पक - विमान ,
क्यों रहे कोई किसी टप्पर - टीला ?
अब बनेगे सबके घर अट्टिला,
यह होड़ खिलौनों की कब रुकेगी ?
यह दौड़ बौनों की कब रुकेगी ?
किस उम्र तक चलता रहेगा यह खेल सारा ?
विश्व कहाँ रक्खे टूटे खिलौनों का ढेर सारा ?
और नहीं अच्छी बचकानी बचपन की,
कुछ उम्रदराज हरकत हो पचपन की,
टूटते और पिघलते जा रहे हिमनाद ,
और कितने करवट बदले शेषनाग ?
क्या हमारी विरासत रहेंगी सिर्फ कहानियाँ ?
क्या मिलेगा नापने से परछाइयां ?
हर शब्द का हमारा आपका अनुभव अलग है . शब्द के अर्थ हमारे अनुभव के अनुसार हमें सुख-दुःख संताप पीड़ा आह्लाद आनंद शांति द्वेष घृणा प्रेम जैसे उदगार देते हैं - शब्द और अर्थ .मेरे अनुभव और अर्थ का विहंगम . मेरे शब्दों का सफर .
9 दिसंबर 2010
8 दिसंबर 2010
बनारस में बम विस्फोट
यह शीर्षक उपयोग करना एक यातना से गुजरने जैसा है . बनारस की अनेक स्मृतियाँ हैं . कक्षा एक से पांच तक यहीं अध्ययन किया है . सुबह सुबह जब शहर अपनी उनींदी आँखों से जागता तब मैं स्कूल बैग लिए काशी विश्वनाथ की गली से , हनुमान मंदिर से होता हुआ , औरंगजेब मस्जिद को निहारता , सीढियाँ चढ़ , चौक होता हुआ , तक़रीबन एक - दो किलोमीटर चल कर विद्यालय पहुंचता . वर्ष में कभी कभी स्कूल के बाहर मेढकों को चीरफाड़ के बाद देखता . बड़े हो समझा - जीव विज्ञान की कक्षा का परिणाम था . कभी कभी रास्ते में तांगे के पीछे बंधे मुर्दा शरीरों से उतरे ग्रामवासियों द्वारा घाट तक की यात्रा से पूर्व जलपान करते हुए मुलाकात हो जाती . नाग पंचमी से पूर्व चौक के बाजार से नागों के चित्र वाले कागज खरीदते हुए गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तकों से परिचय हुआ . और उन्ही से आदर्श बालक , आदर्श पूर्वज , आदर्श स्त्रियाँ आदि पढ़ा और गार्गेयी, मैत्रेयी ,प्रह्लाद , ध्रुव , भरत आदि पात्रों से परिचय हुआ .
बनारस में ही होली की स्मृतियाँ हैं . वहाँ होली पर स्वांग की परंपरा है . और इसके साथ ही होली पर आलू काटकर स्टेंसिल द्वारा छापा लगाने की स्मृति . श्री ४२० इत्यादि के स्टेंसिल के छापे अक्सर घर लौटने पर कपड़ों पर लगे मिल जाते थे .
बनारस में रहना गंगा स्नान और उसमे पानी से डर लगने पर उसमे जबरदस्ती लगवाई गयी डुबकियाँ या कहूँ गोते . और फिर बहुत देर तक नाक से बहने वाला पानी अब तक याद है . ये बात और है की अपने मिरजापुर निवास के दौरान ना सिर्फ उसी गंगा में तैरना सीखा पर घंटों तैरना और गर्मियों में उसी गंगा को तैर कर पार भी किया .
बनारस की स्मृतियों में कबूतर बाज़ी , पतंग उड़ाना, गिल्ली डंडा खेलना , और दुर्गाकुण्ड का मेला , भरत मिलाप , चेतगंज की नककटीईया याद है . वैसे ही याद है कचोडी गली की कचोड़ियाँ, छोले , और बनारस की चाट . बनारस की मिठाई , गरम जलेबी , तेल की पकोड़ियाँ, और आलू की टिक्की का स्वाद भी .
बनारस के रंगों में मण्डी में घूमना, हम हैं बनारसी बाबू का गाना , या शन्नो नाम मेरा . यह गाना इसलिए क्योंकि विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने सातों चौक जहाँ हम रहते थे वहाँ एक लड़की को सब शन्नो बुलाया करते थे .
बनारस की एक और स्मृति है . पिताजी नवरात्री में पूरे परिवार को लेकर एक बार पूरे नौ दिन नव दुर्गों के अलग अलग मंदिर में दर्शन के लिए ले गए थे . तब साइकिल ही साधन था . बनारस में पहले हम जहाँ रहते थे वह स्थान काल भैरव मंदिर के समीप था . और उस मंदिर के पास से गुजरने पर डर लगता था . एक बार स्कूल से लौटते हुए घाटों के मार्ग से घर पहुंचा था . बनारस में रहकर उस उम्र में भी मस्ती - बनारसी मस्ती आ ही गयी थी . बनारस संस्कृति का शहर है . इस संस्कृति में सारनाथ की यात्रा , सावन में मानस मंदिर , भारतमाता मंदिर , कजरी , और चैती सुनना . एक परिचित थे जिनके घर जाने पर बांसुरी की तरंगे सुनाईं पड़ती थीं . यह निवास आदिविश्वनाथ मंदिर बांसफाटक स्थित है . वहाँ पर रात्रि में शिव आरती पर नगाड़ा और विश्वनाथ के आरती गान के स्वर अब भी कानों में गूंजते हैं .
बनारस में पान और भांग खाने की परंपरा है . और एक परंपरा है घाटों पर अखाड़ों की . जहाँ पर पहलवान वर्जिश करते दिख जाते थे .
उन्ही दिनों में विश्वविद्यालय के छात्रों के आन्दोलन पर शहर में कर्फु भी देखा था .
बनारस की स्मृतियों का वर्णन वहाँ शाम को दल बांधे बंदरों के समूह के पूर्ण नहीं होता . ये बन्दर कुछ मंदिरों में जैसे दुर्गा कुण्ड के लंगूर और संकट मोचन के हनुमान मंदिर में भी दिख जातें है . बनारस छोड़ने के बाद भी कई बार बनारस गया हूँ . और बचपन की स्मृतियों के धुंधला होने के बावजूद वहाँ की गलियाँ परिचित ही लगती हैं . हाँ जहाँ हम स्वछंद खेला करते थे वह विश्वनाथ गली अब सब तरफ से पुलिसिया इन्तेजाम में अपरिचित सी लगती है . सब कुछ चाक चौबंद होने के बावजूद घटनाएँ हो जाती हैं . आम आदमी की तलाशी तो बहुत होती है . पर प्रश्न उठता है क्या जो बम रखने आते हैं वो उन्ही मार्गों से जायेंगे जहाँ तलाशी हो रही है . हमारे सुरक्षा इंतजामों में लगे लोगों को आतंकियों की तरह सोचना चाहिए की ऐसी जगहों पर जो निशाने पर हैं वहाँ कोई बम रखना चाहे तो कहाँ और कैसे रखेगा ?
बनारस में ही होली की स्मृतियाँ हैं . वहाँ होली पर स्वांग की परंपरा है . और इसके साथ ही होली पर आलू काटकर स्टेंसिल द्वारा छापा लगाने की स्मृति . श्री ४२० इत्यादि के स्टेंसिल के छापे अक्सर घर लौटने पर कपड़ों पर लगे मिल जाते थे .
बनारस में रहना गंगा स्नान और उसमे पानी से डर लगने पर उसमे जबरदस्ती लगवाई गयी डुबकियाँ या कहूँ गोते . और फिर बहुत देर तक नाक से बहने वाला पानी अब तक याद है . ये बात और है की अपने मिरजापुर निवास के दौरान ना सिर्फ उसी गंगा में तैरना सीखा पर घंटों तैरना और गर्मियों में उसी गंगा को तैर कर पार भी किया .
बनारस की स्मृतियों में कबूतर बाज़ी , पतंग उड़ाना, गिल्ली डंडा खेलना , और दुर्गाकुण्ड का मेला , भरत मिलाप , चेतगंज की नककटीईया याद है . वैसे ही याद है कचोडी गली की कचोड़ियाँ, छोले , और बनारस की चाट . बनारस की मिठाई , गरम जलेबी , तेल की पकोड़ियाँ, और आलू की टिक्की का स्वाद भी .
बनारस के रंगों में मण्डी में घूमना, हम हैं बनारसी बाबू का गाना , या शन्नो नाम मेरा . यह गाना इसलिए क्योंकि विश्वनाथ मंदिर के ठीक सामने सातों चौक जहाँ हम रहते थे वहाँ एक लड़की को सब शन्नो बुलाया करते थे .
बनारस की एक और स्मृति है . पिताजी नवरात्री में पूरे परिवार को लेकर एक बार पूरे नौ दिन नव दुर्गों के अलग अलग मंदिर में दर्शन के लिए ले गए थे . तब साइकिल ही साधन था . बनारस में पहले हम जहाँ रहते थे वह स्थान काल भैरव मंदिर के समीप था . और उस मंदिर के पास से गुजरने पर डर लगता था . एक बार स्कूल से लौटते हुए घाटों के मार्ग से घर पहुंचा था . बनारस में रहकर उस उम्र में भी मस्ती - बनारसी मस्ती आ ही गयी थी . बनारस संस्कृति का शहर है . इस संस्कृति में सारनाथ की यात्रा , सावन में मानस मंदिर , भारतमाता मंदिर , कजरी , और चैती सुनना . एक परिचित थे जिनके घर जाने पर बांसुरी की तरंगे सुनाईं पड़ती थीं . यह निवास आदिविश्वनाथ मंदिर बांसफाटक स्थित है . वहाँ पर रात्रि में शिव आरती पर नगाड़ा और विश्वनाथ के आरती गान के स्वर अब भी कानों में गूंजते हैं .
बनारस में पान और भांग खाने की परंपरा है . और एक परंपरा है घाटों पर अखाड़ों की . जहाँ पर पहलवान वर्जिश करते दिख जाते थे .
उन्ही दिनों में विश्वविद्यालय के छात्रों के आन्दोलन पर शहर में कर्फु भी देखा था .
बनारस की स्मृतियों का वर्णन वहाँ शाम को दल बांधे बंदरों के समूह के पूर्ण नहीं होता . ये बन्दर कुछ मंदिरों में जैसे दुर्गा कुण्ड के लंगूर और संकट मोचन के हनुमान मंदिर में भी दिख जातें है . बनारस छोड़ने के बाद भी कई बार बनारस गया हूँ . और बचपन की स्मृतियों के धुंधला होने के बावजूद वहाँ की गलियाँ परिचित ही लगती हैं . हाँ जहाँ हम स्वछंद खेला करते थे वह विश्वनाथ गली अब सब तरफ से पुलिसिया इन्तेजाम में अपरिचित सी लगती है . सब कुछ चाक चौबंद होने के बावजूद घटनाएँ हो जाती हैं . आम आदमी की तलाशी तो बहुत होती है . पर प्रश्न उठता है क्या जो बम रखने आते हैं वो उन्ही मार्गों से जायेंगे जहाँ तलाशी हो रही है . हमारे सुरक्षा इंतजामों में लगे लोगों को आतंकियों की तरह सोचना चाहिए की ऐसी जगहों पर जो निशाने पर हैं वहाँ कोई बम रखना चाहे तो कहाँ और कैसे रखेगा ?
7 दिसंबर 2010
नवम्बर की कहानी
बहुत दिनों बाद भोपाल - घर जाना हुआ . दीपावली पर चारों भाई बहन शायद वर्षों बाद एक साथ घर पर थे . पिछले एक वर्ष से एक और उपक्रम चल रहा था . बी एस एस एस कालेज और केंद्रीय विद्यालय में साथ पढ़े मित्रों को इस नए तकनीकी युग में खोजना . बहुत से मित्रों को खोजा और उनसे संपर्क भी हो गया . पर इन दशकों में , हमसब जीवन के बहुत से सोपानों से गुजर गए हैं .
फिर भी , ढूँढने का रोमांच अपनी जगह कायम था . और कुछ स्वरों में आश्चर्य भी था . क्यों ? और कैसे ? उत्साह बहुत दिनों तक शायद कायम नहीं रहता . पर अभी भी जो नहीं मिले उन्हें खोजने की उत्सुकता कायम है . और उत्साह भी . मानव स्वभाव बहुत विचित्र है . कुछ जानने का कौतुहल हमें भीतर तक बैचैन कर देता है . और जानकर मस्तिष्क कहता है - अच्छा ! और फिर नए कौतुहल के पीछे दौड़ने लगता है .
कालेज और स्कूल के मित्रों से मिलना हुआ . समय की कमी से सबसे मिलना नहीं हो पाया . सब अपने - अपने जीवन के चक्र से बंधे हैं . और किसी चक्र से मुक्ति कितनी कठिन है यह मशीन का पुर्जा ही जानता है .
नवम्बर पर ब्लॉग में बहुत सी प्रविष्टीयां हुईं हैं . पर सब एक पुरानी डायरी जो भोपाल प्रवास में मिल गयी थी , से हैं . यह सब तब लिखा था जब पढता था . लगभग दो दशक पुराना है. ब्लॉग पर देकर खुद पढना चाहता था . महसूस करना चाहता था . लिखने के उस दौर की मानसिकता से स्वयं का साक्षात्कार . उम्र के उस दौर में लिखना स्मृतियों और अनुभवों , और भावनाओं को समेटने जैसा था . आप को कैसा लगा ? १९८२-१९९० के वर्षों में क्या सब युवा वैसा ही महसूस करते थे ? हमारे अनुभव भी तो हमारे आसपास के वातावरण और हमारे स्वयं के जीवन द्वारा निर्धारित होते हैं . और हम जहाँ भी हैं . वह इनसे हुए हमारे स्वयं के आदान -प्रदान का निष्कर्ष ही तो है .
अपने मित्रों को तो खोजा ही . और इस प्रक्रिया में अपने मित्रों के मित्र को खोजने का आमंत्रण मिला . और उन्हें खोजने और उनको मिलाने का सुख जो मित्रों को मिला , वह भी महसूस किया . पर इस अनुभव पर एक टिपण्णी से खुद को नहीं रोक पा रहा - कुछ मित्रों को खोजकर पाना , ऐसा लगता है , उनका पता पाने जैसा है . जैसे हम सब जानते हैं , 7 , रेसकोर्स रोड , दिल्ली पर कौन रहता है . पर यह सिर्फ पता जानने जैसा है . वहाँ रहने वाले से सब कहाँ मिल पाते हैं .
फिर भी , ढूँढने का रोमांच अपनी जगह कायम था . और कुछ स्वरों में आश्चर्य भी था . क्यों ? और कैसे ? उत्साह बहुत दिनों तक शायद कायम नहीं रहता . पर अभी भी जो नहीं मिले उन्हें खोजने की उत्सुकता कायम है . और उत्साह भी . मानव स्वभाव बहुत विचित्र है . कुछ जानने का कौतुहल हमें भीतर तक बैचैन कर देता है . और जानकर मस्तिष्क कहता है - अच्छा ! और फिर नए कौतुहल के पीछे दौड़ने लगता है .
कालेज और स्कूल के मित्रों से मिलना हुआ . समय की कमी से सबसे मिलना नहीं हो पाया . सब अपने - अपने जीवन के चक्र से बंधे हैं . और किसी चक्र से मुक्ति कितनी कठिन है यह मशीन का पुर्जा ही जानता है .
नवम्बर पर ब्लॉग में बहुत सी प्रविष्टीयां हुईं हैं . पर सब एक पुरानी डायरी जो भोपाल प्रवास में मिल गयी थी , से हैं . यह सब तब लिखा था जब पढता था . लगभग दो दशक पुराना है. ब्लॉग पर देकर खुद पढना चाहता था . महसूस करना चाहता था . लिखने के उस दौर की मानसिकता से स्वयं का साक्षात्कार . उम्र के उस दौर में लिखना स्मृतियों और अनुभवों , और भावनाओं को समेटने जैसा था . आप को कैसा लगा ? १९८२-१९९० के वर्षों में क्या सब युवा वैसा ही महसूस करते थे ? हमारे अनुभव भी तो हमारे आसपास के वातावरण और हमारे स्वयं के जीवन द्वारा निर्धारित होते हैं . और हम जहाँ भी हैं . वह इनसे हुए हमारे स्वयं के आदान -प्रदान का निष्कर्ष ही तो है .
अपने मित्रों को तो खोजा ही . और इस प्रक्रिया में अपने मित्रों के मित्र को खोजने का आमंत्रण मिला . और उन्हें खोजने और उनको मिलाने का सुख जो मित्रों को मिला , वह भी महसूस किया . पर इस अनुभव पर एक टिपण्णी से खुद को नहीं रोक पा रहा - कुछ मित्रों को खोजकर पाना , ऐसा लगता है , उनका पता पाने जैसा है . जैसे हम सब जानते हैं , 7 , रेसकोर्स रोड , दिल्ली पर कौन रहता है . पर यह सिर्फ पता जानने जैसा है . वहाँ रहने वाले से सब कहाँ मिल पाते हैं .
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