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1 अप्रैल 2012

मैं जानता हूँ

आधा-अधूरा 
थोड़ा-ज्यादा 
सब कुछ पढ़ा  
अक्षरशः
जब भी 
अंतराल आया 
स्मृति का चिन्ह रख छोड़ा 
फिर वहीं से पकड़ा जोड़ा 
मेज़ पर पड़ी हुई किताब ने 
फिर अचानक क्यों पूछा - 
"मुझे पहचानते हो ?"
यही सवाल -
"क्यों बार-बार,
अलमारी में रक्खी किताबें भी पूछने लगी हैं ?"

पंक्ति दर पंक्ति 
पृष्ठ दर पृष्ठ 
उठाया-पलटा  
खंगाला-उलीचा 
कोई नहीं मिला 
फिर कौन बोला 
किसने मौन तोड़ा 
शब्द को अर्थ किसने दिया 
क्या कोई पात्र जीवंत हो गया ?
मैं सहसा कितना डर गया !!
कुछ था जो अन्दर भर गया 
सर से पाँव तक एक सिहरन 
दौड़ गई 
आँखें दरवाज़े तक गईं 
फिर खिड़की के परदे पर जा टिकीं 
और वहाँ से छत पे घुमते पंखे पर 
अगर यह चल रहा है ?
तो मेरे माथे पे पसीना क्यों आ रहा है ?
ज्वर है ?
ये किसकी परछाईं है ?
कौन मेरे सिराहने खड़ा है ?
खुद को चिकुटी काटी
यह कोई स्वप्न नहीं है 
मैं तो जगा हूँ 
अकेला हूँ , अभागा हूँ 
तभी तो किरदारों में पड़ा हूँ 
इन्ही से बातें की हैं 
इन्ही को समझा है 
पात्र-अपात्र 
सखा, भाई , सगे सब यही हैं 
यही रिश्ते-नाते हैं 
यही सखा हैं , प्रेमी हैं 
सुख-दुःख में साथ निभाते हैं 
रोते-हंसाते हैं 
रात-बिरात जागते हैं 
मेरे साथ ही मेज़ पर बैठ 
चाय-नाश्ता होता है 
सिगरेट का छल्ला उड़ता है 
मेरे ही बिस्तर पर 
बेतरतीब पड़ना 
मेरे साथ उठते-बैठते 
मेरी किताबों के किरदार 
कब किताबों से मेरे जेहन में 
घुस गए 
अब मुझसे ही पूछते हैं -
"मुझे पहचानते हो ?"
इस प्रश्न का मैं क्या उत्तर दूँ ?
मैं जानता हूँ ?

22 फ़रवरी 2012

इतिहास ( चतुर्थ किश्त : क्रमशः )


संस्कृत 
वेद , ऋचा , श्लोक , उपनिषद 
दर्शन , शास्त्रार्थ 
एक प्रथा 
सिंधु सभ्यता 
की लिपी अपठित , अलभ
चित्र सन्मुख 
पशुपति – नंदी मुद्रा 
अंकित विशेष 
देवता शिव सा  
स्वरुप महेश
रूद्र महादेव 
देवाधिदेव 
तीर्थ दुर्गम  
कैलाश – मानसरोवर 
अट्ठारह ज्योतिर्लिंग 
प्राचीन अर्वाचीन देवता 
युग बाद आये  द्वापर, त्रेता  
तब छाया था 
शंकर - भाष्य 
संस्कृत भाषा 
ॐकार 
शब्द ब्रह्म 
नाद ब्रह्म
अउम ध्वनि 
व्याकरण पाणिनि 
स्मृति शाश्वत 
वैदिक विरासत 
देववाणी तुल्य 
अमृत-सम-अमूल्य 
पर इनसे इतर 
मनुष्य बहुल 
किस स्वर संकुल 
सकल-संवाद-रत 
क्या उनके प्रयत 
थे स्वर दीर्घ 
या सिर्फ 
ह्रस्व    
क्या पता 
क्या थे सब शतपत 
या एतरेय ?
तैतरीय निषाद 
एकलव्य 
संशय  की पराकाष्ठा 
है मुझे भी सालता  
क्या करें 
कैसे रहें 
सब प्रश्न स्वयं से पूछते रहे 
नचिकेत अग्नि के पूर्वाग्रह 
हों कितने भी गूढ़
हम मूढ़  
यम के द्वार डटे रहे 
आर्य –अनार्य
विभाजित के विपर्यस्त
भोगा 
राम का वनवास 
संपर्क प्रथम 
वनवासी समाज 
केवट संगम 
स्वप्न समागम 
बाँधा एक पुल,एक सेतु 
फिर भी रहा कटा 
जन-ज्वार नहीं पटा
धोबी का ताना 
बना उर-छाला
सीता - त्याग
अग्नि-परीक्षा 
आज तक खीजता 
खोजता मृगमरीचिका  
कल्पनालोक 
यूटोपिया 
किसने दिया , किसने दिया 
रामराज्य , रामराज्य   
तुलसी के सात सोपान 
भक्तिमय उपादान 
श्रवण-पान श्रवण-गान .
बदली , बदली, भाषा बदली 
चार कोस पर बोली 
ब्रज , अवधी , मीरा , रहीम , कबीर, रसखान 
विद्यापति , पद्मावत , जायसी, नानक, सूरदास 
उठे ढोल , मंजीरे 
भक्ति रस में धीरे -धीरे 
पीछे छूटा बमभोला 
हर हर महादेव 
महामृत्युन्जय
कृष्ण की रासलीला 
बाल गोपाल उनका झूला 
बही बही बयार 
उमडा उमडा जनज्वार 
कुछ-कुछ पटा
लोक-जन , जन-जन 
समरसता , समरसता 
ब्रज की बोली , अवधी की सत्ता 
भाषा का रामराज्य बसता !!

1 फ़रवरी 2012

खोखला

खेत की मेड़‌‍‌
बहुत बड़ा 
बरगद का पेड़ 
खड़ा है 
ड़ा  है 
अंदर से पोला है  
खोखला है  
कोई आंधी नहीं 
गाँधी नहीं 
हवा का एक हल्का सा झोंका 
गिरा देगा 
हरा देगा 
कोई कुल्हाड़ी मत लाना .
न हँसी असली 
न शब्द न कथनी न करनी 
बहत्तर छेद चलनी  
मिट्टी की  गाड़ी 
मृच्छकटिकम
चलती गड़ड़
हाथों में भरे 
विषभरे अक्षर 
मन से 
मस्तिष्क से 
रक्त कलम से 
गलियों से 
खेतों से
सड़कों से 
गुजरते रहे 
आते रहे जाते रहे 
अकेले अकेले चले 
घर जले 
बस्ती जली
कस्बे जले 
जहाँ जहाँ से गुज़रे 
काफिले
चेहरे  , चेहरे , तमाम चेहरे 
लूले लंगड़े अंधे बहरे 
हाथ , हथेली , मुट्ठी बाँधे
दाँत भींचे , फूले नथुने
रक्ताभ आँखे 
जुलूस  बने , जलसा बने , बहस -मुबाहिसा हुए 
अर्थ की अर्थी उठाए 
सफहा - सफहा 
बिखरे बिखरे हरफ 
एक तरफा , एक तरफ 
गूंजने लगे 
गाने लगे 
चिल्लाने लगे 
पाँवों के तलुए 
चाटने लगे 
सूँघते हुए 
गलियाँ-गलियाँ 
घूमते
कटखौने हुए , काटने लगे 
गालियाँ - गालियाँ 
और सब तटस्थ हैं 
अर्थ सब बौने हुए 
सुविधा के बिछौने हुए 
धूप से बचने के लिए 
आँखों को ढाँप लिया 
स्वार्थों को भाँप लिया 
दाम औने-पौने हुए 
खेत की  मेड़‌‍‌  पर 
सूखे हुए कुँए के पास 
धराशायी बरगद 
भीष्म सा लहुलुहान 
और विजयी मुद्रा में पास ही खड़ा है 
एक बिजुका शिखंडी 
बजउठी रणभेरी
अट्टहास कर , नरमुण्ड बांधकर 
नृत्यप्रवृत कापालिका , चंडी  
हो गया नाटक का अंत 
पर्दा  धीरे -धीरे गिरता है 
मूक - दर्शक  अपनी -अपनी जगह खड़े  , 
बजायेंगे , करतल 
तालियाँ - तालियाँ .

उल्लू

घुग्घू  या मुआ 
किसी भी नाम से पुकारें 
उल्लू का पट्ठा
उल्लू का पट्ठा रहा !!


घोंघा बसंत होने का दर्द 
जिसने सहा हो 
वह जहाँ भी रहा हो 
पानी के करीब 
किसी पुराने खंडहर 
या किसी पेड़ का सगा  
सारी उम्र घुग्घियाता - 
घुग्घूऊ ऊऊ रहा करता ,   
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा !!


गले में पड़ा है 
लक्ष्मी का पट्टा 
भाग्य घिसा-पिटा
परसाई जी का दर्द 
परसाई जी ने कहा 
सबने अपना-अपना 
उल्लू सीधा किया 
चलता बना 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!


प्रेम का फर्द 
ज़माने का सिरदर्द 
पिछली पीढ़ी का क़र्ज़
अगली पीढ़ी का फ़र्ज़ 
अजीर्ण का रोग 
अनिद्रा भोग 
विरह-वियोग 
प्रथम-मिलन-सम्भोग 
भैरवी साधना 
बकवादी की बकवास 
दार्शनिक का फलसफा 
देवों का सोमपान 
देवी का निंदा-सद्यस्नान  
सब का रतजगा 
सारी सारी रात चला 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!



बिसमिल्ला की शहनाई 
पर जैसे आधी रात
राग बिहाग सजा, 
बजा, जब चढ़ी तान
कामदेव का बाण
इस पर चला 
उस पर चला 
पुकारती रही 
नयनों की आतुरता 
बैठा रहा घुग्घू 
निर्मिमेष ताकता 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!

18 जनवरी 2012

भौंकना

भौं ‌‍‌ऽऽऽऽऽ उं उं
भों , भों , भों ,भों , भौं ऽऽऽऽऽऽऽ
भू भू भू भूंह भूंह ब्हुंह ऽऽऽऽऽऽ
भौं भौं भौं भौं भौं भौं भौं भौं भौं भौं भौं ओं ओं ओं ओं
हंसिये मत
हँसना मना है
मैं ऋषि नहीं हूँ
और ना ही ये बीज मंत्र हैं
हाँ ठीक समझे आप यह
भौंकने वाले प्राणी की विविध-भारती है
अब विशेषज्ञ तो हूँ नहीं
इसलिए आपका इसमें परिपूर्णता ढूँढना ज्यादती है
 क्या आप भौंक सकते हैं ?
नहीं यह तो असंस्कृत तरीका हुआ
ऐसे पूछता हूँ -
"क्या आप भौंकना जानते है ?"
किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हैं ?
या सिर्फ सुनी सुनायी ज्ञातक हैं ?
दरअस्ल मैं विभिन्न पाये के भौंकने वाले तलाश रहा हूँ
ऐसे क्या देख रहे हैं ?
नहीं न मुझे कुत्ते पालने का शौक हुआ है
न  मुझे अपनी कुतिया के लिए अच्छी नस्ल के कुत्ते की तलाश है
मेरे हाथों में बचे हुए बिस्किट भी नहीं  हैं
आप निश्चित रहें मुझे किसी कुत्ते ने नहीं काटा.
मैं पिछले के पिछले के पिछले जन्म में
युधिष्ठिर  के साथ साथ हिमालय तक गया था
अपनी कौम का इकलौता था
अब अखबार निकालता हूँ
सपने में टी वी कयास रहा हूँ
मुझे अच्छे रिपोर्टर , एंकर , विशेषज्ञ भी चाहिए
अब आप ही बताइए
चौबीस घंटे , सात दिन
कोई गुर्रा तो नहीं सकता
भौंकने के अलावा क्या बचता
सुबह मुँह अँधेरे सैर को क्या निकले
पीछे से जब ये आवाज गूंजती है
तो न सिर्फ घिग्घी बंधती है
फट जाती है
मन ही मन आसमानों की तरफ तकता हूँ
खुदा वन्द करीम की रहमत की दुआ करता हूँ
संकट में धर्म किसे याद रहता है
आँखों के आगे सिर्फ इंजेक्शन घूमता है
आधी रात को नींद में बडबडाता हूँ
जब भी किसी रोते हुए कुत्ते के रोने की आवाज़ सुनता हूँ
दिल अक्सर ब्रेकिंग न्यूज़ सुनकर दहल जाता है
पर जबसे हर कुत्ता रात-बिरात ब्रेकिंग न्यूज़ की माफिक
कहीं भी कभी भी चालू हो जाता है
तबसे अपनी भी जेब में पत्थर सवार है
पत्नी भी पूछती है
धर्मं बदल कर दूसरा ब्याओ करे क्या
ये पत्थर क्योँ धरे मियाँ ?
अब उस बावरी को कैसे समझाऊं
मानिक वर्मा सा हो गया हूँ
कविता नहीं खम्बा ढूँढता हूँ .
आजकल विश्वविद्यालय में कोई बिना पी एच डी के प्रोफ़ेसर नहीं हो सकता
ऐसे ही एक मित्र कल घर आये
बोले विषय सुझाओ
मैंने कहा बहुतेरे हैं
गाय के मूत्र पर कर लो
कोलावेरी-डी है
ढंका हुआ हाथी है
बोले मेरे को प्रोफ़ेसर न बनने देने की ये क्या ओछी राजनीति है ?
मैंने कहा राजनीति ओछी नहीं , ओबीसी है .
बोले मजाक मत करो
सुझाना है सुझाओ
उपहास तो मत उड़ाओ
वैसे ही दुखी हूँ
देश की शिक्षा रसातल को जा रही है
शिक्षा में विदेशी पूँजी आ रही है
मैंने कहा आप इसके खिलाफ भौंकते क्योँ नहीं ??
दोस्त ने सुना नहीं , या गुना नहीं ,
अपनी ही तान में बोला -
क्या भौंके ?
हम तो गुर्रा तक आये
पर बोटी तो क्या कोई हड्डी तक नहीं डालता .
मैंने कहा गुरु मिल गया
मैं भौंकने पर कविता लिख रहा हूँ
तुम भौंकने पे शोध कर लो .
मित्र बोले - इसमें शोध क्या है ?
कोई भी अगर कुत्ता है , भौंक लेता है
मैंने कहा - नहीं बहुतेरे प्रश्न है
जैसे -
रात और दिन में भौंकने में क्या फर्क है ?
क्या  उभयचर भौकने वाले वास्तव में होते हैं -
जो दिवा और निशा दोनों काल में समान विशेषज्ञता से  भौंक सकें ?
दुम उठाकर और दुम  दबाकर भौंकने में क्या फर्क है ?
लगातार भौंकने या कभी -कभी भौंकने वाले में कौन ज्यादा सफल है ?
भौंकने में बीच-बीच में श्लोक उदधृत करने के क्या फायदे या नुकसान हैं ?
क्या भौंकने की विशेष शैली से यह ज्ञात होता है कि -
भौंकने वाला संघी , कांग्रेसी , साम्यवादी , समाजवादी , या सिर्फ किसी सुविधावादी
घर से बंधा है ?
या फिर छुट्टा है ?
क्या कुत्ते के बकरे की तरह दाढ़ी होती है - अगर हाँ ,
तो दाढ़ी वाले कुत्ते के भौंकने का
अन्य कुत्तों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
दाढ़ी वाला कुत्ता क्या अन्य कुत्तों को डराने के लिए भौंकता है ?
जो कुत्ता अपने मोहल्ले में जोर जोर से भौंकता है
वह क्या अन्य मोहल्ले में भी उतने रूआब से भौंकता है ?
या उसकी आवाज़ मिमिया जाती है ?
कुत्ता अगर अपनी गली में शेर होता है
तो उसवक्त वह गुर्राता है या उसका भौंकना ही गुर्राना मान लिया जाता है ?
कुत्ते  योगासन मुद्रा में दोनों पाँव उठाकर भौंकने से क्या फायदा पा सकते हैं ?
फैंसी ड्रेस में भाग ने वाले कुत्ते क्या भारतीय ड्रेस सलवार कमीज़ पहन सकते हैं ?
क्या कुत्ते सामूहिक रूप से भौंकने के लिए रामलीला ग्राउंड या जंतर-मंतर का इस्तेमाल कर सकते हैं / या करते हैं ?
भौंकने की समयसीमा तय की जानी चाहिए ?
भौंकने के लिए कोई न्यूनतम आयु क्यों नहीं है संविधान में ?
भौंकने के लिए क्या किसी न्यूनतम अहर्ता का होना अनिवार्य होना चाहिये ?
भौंकना क्या मौलिक अधिकारों में शामिल करने के लिए उपयुक्त होगा ?
लिटररी फेस्टिवल में क्या भौकने पर किसी संवाद का आयोजन हुआ है ,
अगर नहीं तो क्या वहाँ भूँकने पर प्रतिबन्ध जायज़ होगा ?
क्या भौंकने पर कोई उपाधि या सम्मान विश्व में दिया जाता है ,
यह सम्मान अब तक किसे -मिला है ?
इसमें कोई प्रवासी भारतीय शामिल है ?
कुत्ते भौंकते वक्त किस भाषा का इस्तेमाल करते हैं ?
क्या उनमे भाषा को लेकर कोई विवाद है ?
या किसी भाषा में भौंकना अपराध है ?
भौंकने पर अब तक कितनी कमिटी या कितने आयोग बिठाए गए हैं ?
भौंकना सुनने वाले खुद आते हैं या किराये पे लाये गए हैं ?
सबसे मूल प्रश्न तो छूट ही गया
भौंकने वाला जब किसी कुतिया को देखता है ,
तो सर क्यों हिलाने लगता है ?
दुम क्यों उठाता है ?
चारों तरफ घूमता है ?
सिर्फ सूंघता है ?
दोनों पंजे लंबे कर लेट सा जाता है ,
भौंकना भूल कर सिर्फ मिमियाता है .
बसंत से कुत्ते का क्या नाता है ?
और बंधु , प्रोफ़ेसर जब हो जाओ ,
यह ,मत भूलना
कुत्ते की जात
जब से रही आदमी के साथ
गुर्राना भूल गयी
सिर्फ अब भौंकती है
सुविधा की हड्डी
पे जिसने मुंह मार लिया
लार किया , लार किया .
मुझे मत ढूँढना
आजकल
सामाजिक मीडिया पर
सक्रिय हूँ
भौंकना -भूंकाना दिनरात जारी है
नौकरी सरकारी है
तरमाल डी पी है
कुतिया है या कुत्ता
क्या पता
आदमी की शक्ल में है
एक अंडा
पर भाषा की सांसत है
हिन्दी में भौंको तो रोमन चाहिए
अब खजराहा कुत्ता अल्सेशियन होने से रहा
पामेरियन हो तो लोग गोद में उठा लेते हैं
हम सब निरपेक्ष देखते हैं
भूँकने की नयी गीता बाँच रहे हैं
नए लेब्राडोर हैं
दूसरे का फेंका लपियाते हैं ,
तलुवे ही नहीं तालू चाट जाते है ,
कुछ सेलेब्रिटी हैं 
एकतरफा भौंकते है 
बीच में बोलो तो सिर्फ टोकते हैं 
और उनपर गुर्राओ तो 
ढंके हुए हाथी हैं 
साफ़ गुज़र जाते हैं 
आप सिर्फ मिमियाते हैं 
पर हम अब भी टेरियर हैं
शिकार पर अकेले  हैं
भौंकना धर्म नहीं
धर्म है काटना
आप अच्छे हैं
तो दुम हिलाऊँगा
नहीं तो सावधान
काट खाऊंगा
शांति में विश्वास है
तरीका उग्रवाद है .

30 सितंबर 2011

यथावत

घड़ी के कमान सी 
चल रही है जिन्दगी 
वक्त कट रहा है 
वक्त में सी रहा है 
खुद को आदमी .
आँखों के आंसुओं से 
उभरी दो लकीरें 
और जिन्दगी का रुख 
नहीं बदला ;
टूट टूट कर बालों ने 
समय के पहले 
बूढा किया और गर्द 
चेहरों पर सिमटी 
और इन सिमटी लकीरों में 
यादों सा पी रहा है 
अपना लहू आदमी .
समस्याओं के घेरे में घूमता पंखे सा 
और हो उठा है ठण्ड की चाहत में गर्म 
आदमी ; अंतरिक्ष में घूमता 
कैद हो गया कमरे में .

सत्य

सत्य का रूप हर दौर में बदला है 
सत्य क्या दुनिया में एक रहा है ?
सत्य है एक सुलगते चूल्हे जैसा  
हर कोई अपनी रोटी सेंक रहा है .
एक झूठ जिसे गर्द ही गर्द मिली 
सत्य के मामले मीनमेख रहा है .
सत्य जैसे एक अछूत गुडिया हो
गाल खींच हर कोई फेंक रहा है .
सत्यवादियों ने ही सत्य को छला
सत्य खुद को शर्म से देख रहा है .
सत्य की जात गिरगिट पी आई है 
सत्य तबसे राजसत्ता की सेज रहा है .  

चंद ख़यालात

किसी को उस मोड़ से दहशत नहीं होती 
जहाँ अब हाथों से ईबादत नहीं होती  .
हर मुलाकात इक  रस्म से ज्यादह नहीं 
कोई जुम्बिश कोई हरकत नहीं होती .
पहले हर चीज को मचलता था दिल 
अब किसी बात को तबियत नहीं होती .
हर चोट पर दर्द होता था जिसे , उसे 
अब जख्मों से भी दिक्कत नहीं होती .
ये दिल जो यहाँ वहां रहने से डरता है   
वर्ना रहने को क्या ईमारत नहीं होती  .
रोज़ का मजमून इक दिन का माजरा नहीं  
इसे रिश्ता कहते हैं ये सोहबत नहीं होती .  

29 सितंबर 2011

मैं कब कब पैसे के बारे में सोचता हूँ

मैं सोचता बहुत कम हूँ 
खासकर पैसे के बारे में 
क्योंकि मेरे पास अब बहुत पैसा है 
पैसा तो है 
पर आसपास आवरण है 
उसके भीतर 
मेरा खोखला आदर्श 
दम्भपूर्ण आत्मविश्वास .
मुझे याद है 
जब मैंने कभी 'चालू चाय ' के लिए 
कहा था
तो एक क्षण ख्याल आया था 
अपनी हैसियत का .
और जब स्पेशल पी गया , शंका के साथ 
अपनी और बेयरे की भूल से 
और चूका नहीं पाया उसकी कीमत 
तब तमाशबीन भीड़ के बीच 
जब 
मेरे झुकने का एहसास मुझे हुआ था 
तब और उसके बाद 
मेरे पेट पर पडी थी घुटनों की टक्कर 
यह मेरे कपड़ों पर थी 
पैसे वाले मालिक की 
और उसके कानूनदार साथी की 
मुझपर और बेयरे पर 
तब मैंने पैसे के बारे में सोचना शुरू कर दिया 
हाँ , बेयरे के बारे में नहीं कह सकता 
वह , अब भी वहीँ है , मेरी होटल में .
मैंने गलती से उच्चशिक्षा में दाखिला लिया 
वैसे तो मन की आग भी नहीं बुझती 
पर तन की भूख के आवरण में मेरा तन 
छटपटाने  लगा था 
उच्चघराने की बहू - बेटियों को देखकर 
उस छटपटाहट  के जख्म मैंने आज भी बो रक्खे हैं 
अपने सीने में 
तब मैंने सोचा ये नारी तो नहीं 
मैं इन्हें नहीं पा सकता 
इनका मापदंड पैसा है 
और मैं आदमी ज्यादा हूँ 
फिलहाल .
तब मैंने औरतों के बारे में 
बंद कर दिया  
और शुरू कर दिया सोचना 
पैसे के बारे में , सिर्फ पैसे के बारे में 
मेरे स्वयं के बिकने की वजह मिल गयी थी मुझे .
वो अब भी वहां महफ़िल जमती है 
पर मैं 
यहीं पर अकेला ठीक हूँ 
मैं बाँटकर पीता जरूर हूँ 
पर जहर नहीं 
और फिर यह मेरा तब का खून है 
जब मैं आदमी था 
मुझे याद है मेरे बाप की ईमानदारी पर हँसे थे ये 
मेरी लेडीज घड़ी पर हँसे थे 
मुझे समय का एहसास हुआ था 
और मैंने सोची थी उन गरीब मन की दयनीयता 
और मैं हँसने वाला था ,
पर उससे पहले कोई हंस दिया था जोर से 
मेरी फटी कॉलर पर 
और फिर मैं स्वयं भी हंस दिया 
अपनी फटी कॉलर पर .
और मैंने अब सोचना शुरू कर दिया 
फिर से पैसों के बारे में . 
अपने लौटने में एक करीब की टेबल पर पड़ा 
बटुआ उठा लिया मैंने और दरवाजे से 
बाहर आकर भी अब मैं लगातार सोच रहा था 
पैसे के बारे में 
अपने बारे में सोचना मैंने बंद कर दिया है 
वैसे भी मैं खोयी हुई चीजों के बारे में 
कम ही सोचता हूँ .

29 जुलाई 2011

मृत्यु पर्व


 भोपाल की भीषण त्रासदी के बाद
 विश्व कविता समारोह के आयोजन पर्व पर
 गूंजा विख्यात कवि का स्वर
 “मरे हुए लोगों के साथ मरा नहीं जा सकता “
 मनुष्य कहाँ मरता है ?
 मरती है संवेदना
 भोग नहीं मरता
 इच्छायें नहीं मरतीं
 कामना नहीं मरती !
 कौवा , कुत्ता , गाय , ब्राह्मण
 दसवाँ, बारहवाँ, तेरहवीं
 मुंडन ,स्नान , पगड़ी
 पिण्डदान, हांडी , अस्थिफूल
 सब संगम के कूल
 संस्कार है मृत्यु !!
 मणिकर्णिका , गया , गंगासागर
 जिसको जो अनुकूल
 गौदान , सीधा , भोज
 तर्जन , विसर्जन
 सबकी अपनी सोच
 व्यापार है मृत्यु !!
 अर्पण , तर्पण
 संध्या , इक्कीस एकादशी
 क्या हुआ , अगर है ये इक्कीसवीं सदी
 अब इस अवसर की ड्रेस बनती
 त्यौहार है मृत्यु !!
 शोर है जीवन , श्मशान है मृत्यु .
 प्रगटती है अभिलाषा
 अब भी है प्रत्याशा –
 “किसी जगह की मिटटी भीगे ,
 तृप्ति मुझे मिल जायेगी”
 कौन पीये जीवन हाला ?
 मृत्यु अगर हो मधुशाला ?
 उपहार है मृत्यु !!
 पहले आत्मा शरीर को त्याग देती थी
 अब शरीर ने आत्मा को त्याग दिया है
 कठोपनिषद , गीता है ,
 यम है , नचिकेता है
 और कृष्ण का विराट स्वरुप
 शब्द तो सारथि है
 अर्थ असल पारखी है
 कवि परंपरा का निर्वाह करता है
 पितृपक्ष में पुत्र को ही याद करता है
 बेटियों वाले कहाँ जाएँ ?
 क्या हम हैं ‘ब्रह्मराक्षस’ ? 
 'मुक्ति – बोध' के ?
( परिकल्पना पर सर्वप्रथम प्रकाशित )

16 जुलाई 2011

सादा कबूतर

शब्दों में बेबसी , बेचारगी , गुस्सा हो 
पहले नहीं देखा कभी  वो इतना डरा हो ||
लीडरान की चाक -चौबंद हिफाजत हो 
देखो न आसपास भी, वो सिरफिरा हो ||
मुंडेर पर नहीं दिखा वो सादा-कबूतर 
हो न हो किसी बाज के पंजों ने धरा हो ||
आँखें जागने से लाल हैं या खून उतरा है 
रात बड़ी कश्मकश से शहर गुजरा हो ||
आँखें खोलो तो बाज़ार की लाशों का मंज़र 
बंद करूँ तो सामने उसी बच्चे का चेहरा हो ||
चार सू आवाजें दीं सब लौट के आती हैं 
ये शहर जैसे हर सू पहाड़ों से घिरा हो ||
जो  धमाका  हमारे  कान सुन्न कर गया 
कई घरों  में अबतक सन्नाटा पसरा हो ||

4 जुलाई 2011

कुछ यूँ ही

जमीं पर उतरे चाँद से बतियाता है कौन
स्निग्ध चांदनी में है ये किसका मौन
किसने साहिल पे बिखेरी चांदी की रेत
इन पत्तियों पर खिला किसका स्वेद
हिमाच्छादित चोटियों पर किसका तेज
हजारों रास्ते कौन सा उससे आमेज
चलो फिर इन घाटियों में ढूंढें खोई हवा
हमारी बस्तियों से रूठ कर निकली सबा
फिर  पुरनम आँखों से हुआ विसाल
पत्थर से बादल टकराए बरसे हिमाल
गर्मिए ग़म से निकले कितने चेनाब
दौड़ता  दरिया सागर से मिलने बेताब
फिर इन चश्मो  से निकलें मौजें बहारां
गूंजे यहाँ उसके जलवों का लश्कारा.

23 जून 2011

सपनो को उग आयें पर

ख़त का जवाब ले आएगा हरकारा
चाहो मीत पुराना जब टूटे एक तारा .


निस दिन चहुँ ओर कोयल कूकेगी
भूला भटका दिख जाये  बादल बंजारा.


पत्ता पत्ता जलतरंग जब झूमे सावन
अम्बर नाचे हाथों में ले इकतारा.


हम नदी में दीप  जलाने  आ गए,
तुम्हारे गाँव जायेगी यह जलधारा .


अक्सर चांदनी रातों में छत पर ,
ढाई अक्षर अपने ढूंढे शहर सारा .

उस कुँए में सिक्का डाल के चाहा ,
सपनो को उग आयें पर , यारा !!




22 जून 2011

बारिशों के मौसम में

हमारे शहर का हाल भीगा भीगा है ,
गीला गीला उसकी आँखों में तारा .

तुम्हारे ख़त के अक्षर धुंधले धुंधले 
मोती का पानी अब उतरा उतरा .

सूरज का नूर छुपा है बादल में, 
अब झांके तब झांके काला-गोरा .

बूढ़े बरगद के नीचे सिमटा जंगल ,
प्लावन में दुबका सहमा हर चेहरा.


कभी गर्मी की लू सताती है उसको,
कभी बारिश में वो बिफरा बिखरा .

घुटने घुटने पानी तेरी गलियों में
कागज  की कश्ती सहरा सहरा .


यादों के बादल जब मन में घुमड़े  ,
गीली लकड़ी , धुआं गहरा गहरा . 


लम्बी भीगी रातों में ऐसा होता है ,
गर्म लिहाफों में रिश्ता ठहरा ठहरा.


जब जवाँ दरिया हो उफान पर ,
टूट जाता हर बांध कतरा-कतरा .



16 जून 2011

ईश्वर है या नहीं

कर रहा हूँ
तलाश ईश्वर की .
उसने स्वर्ग को नकार कहा -
वह है परी - कथा .
नहीं, यह नहीं है मेरी व्यथा .
कुछ ने कहा -


ईश्वर का अस्तित्व नहीं है
मैं नहीं तलाश रहा
ईश्वर को
किसी प्रमाण के लिए .
ना मुझे करनी है प्रार्थना
न चाहिए कोई वर
मुझे उससे कोई शिकायत नहीं करनी
न दूसरों की न अपनी
मैंने चढ़ावे के लिए नहीं रखी है चवन्नी
वो तो मैं लंगड़े भिखारी को दे चुका.


आकार और निराकार का फर्क नहीं देखना , दिखाना
मुझे उसके अवतारों और दूतों का पता नहीं लगाना
मैं किसी सत्य और असत्य के विवाद में नहीं पड़ा
किसी इंसान या शैतान का नहीं झगडा
मैंने किसी गुरु की नहीं लेनी शरण
मुझे नहीं चाहिए धर्मग्रंथों के निर्देशों का प्रमाणीकरण
मैं नहीं किसी लिंग , जाति, देश , भाषा, संस्कृति का प्रचारक
किसी की संस्तुति में लिप्त या वाचक .


मैं तलाश रहा हूँ ईश्वर को
सिर्फ पूछना है -
अगर वह सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी ,अन्तर्यामी है
तो बताये
सृष्टी - जिसकी भी बनाई हो
उसमे कोई और जगह तो है
धरती के अलावा .
जहाँ जाकर रह लेंगे


अज्ञानी , ज्ञानी , विज्ञानी ;
धर्मांध , आस्तिक , नास्तिक ;
नेता , अभिनेता , राजा, प्रजा ;
वैज्ञानिक , कलाकार , ज्योतिष ;
व्यवसायी , उद्योगपति , भूखा , भिखारी ;
कर्महीन , मेहनती , लेखक , कवि;


जिस तरह से रौंदी जा रही है प्रकृति
उजड़ी जा रही है धरा
धुंए में सिसकती हैं सांसे
सुलगते हैं आच्छादित वन
सूखती जा रही हैं नदियाँ , तालाब, जलाशय
विलुप्त हो रही हैं जातियाँ-प्रजातियाँ
पिघलते जा रहे हैं हिमनद
फैलते जा रहे हैं रेगिस्तान
और बढ़ता जा रहा है तापमान


अगर नहीं है ऐसी कोई जगह
तो क्या फर्क पड़ता है
की मैं आस्तिक हूँ या नास्तिक
ईश्वर है या नहीं
और इस प्रश्न का उत्तर
उसके पास भी है या नहीं
वो मुझे मिले या नहीं !
क्या फर्क पड़ता है ?

15 जून 2011

अबकी बारिशों में

अबकी बारिशों में सराबोर  का मन है 
उसकी यादों से रक्स  मोर का मन है .
कौन खड़ा है बंद दरवाजों  के पीछे ,
तांकता-झांकता किस चोर का मन है .
सुलगा  जिनके चुम्बन से दावानल ,
उन पत्थरों से घटा- घनघोर का मन है .  
समंदर के किनारे  रेत पर  लेटे हुए
तुम्हारे नाम की हिलोर का मन है .
अँधेरी रात कड़कती बिजली से डर के
लिपट जाये सोचता कमजोर का मन है .
अबकी बारिश में दरक  जायेगा ये मंका
तुम्हारे शहर में किसी ठोर का मन है .
इन वादियों में  लेकर तुम्हारा नाम 
खामोशी तोड़ने , कुछ शोर का मन है .
मौसम के दस्तूर बहुत पुराने हैं 
गर्म पकौड़ी - चाय  चटोर का मन है

13 जून 2011

ठगा हुआ

सुबह बहुत ऊमस थी 
दोपहर  तल्ख़ धूप
शाम सराबोर बारीश मुंह चिढ़ा रही विद्रूप 
मौसम के सामने खड़ा ठगा हुआ 
इतना तेजी से क्या बदलना हुआ ?
जब हम तैयार नहीं होते 
हाथों में हथियार नहीं होते 
हाथों से उड़ जाते तोते 
जब कोई परिचित नहीं पहचानता 
अपना - अपना नहीं मानता
तब लगता है ठगा सा 
जैसे कोई दगा सा 
बिना किसी ठौर -ठिकाने के 
आदमी खड़ा होता है ठगा हुआ 
बदले हुए मौसम का फलसफा हुआ 
बहुत बेचारगी सा , वो लम्हा 
कितना दिल-फरेब , कितना तन्हा
किसी घर की खड़खड़ाई साँकल
उधर से आयी आवाज़ "कौन"
"कमलेश  जी घर पर हैं?"
फिर एक लम्बा मौन 
नहीं वो तो नहीं हैं , कुछ कहना था ?
"नहीं यूँ ही , कुछ खास नहीं ,बस मिलना था ,
एक स्वर दबा हुआ ,
शब्द लगता है - ठगा हुआ !!     

3 जून 2011

रात सखा दीवार छिपकली

बहुत दिनों से 
मौसम से बतियाता था
वो बूढा या बच्चा था
उसको हर बात सताती
क्यों फूलों के पंख झडे हैं
और हवा में धूल पसरी है
जुगनू में क्यों आग नहीं है
क्यों आकाश में बदरी है ?
अम्बर अगर बड़ी छतरी है
तो क्यों सर पर धूप चढी है
कलियाँ क्यों ना आँख मिलाती
किससे इतना शर्माती ?
दिन इतनी जल्दी क्यों ढल जाता है
उसको कहाँ की हडबडी है
ध्रूव तारा क्यों वहीं अटका है
पैरों में क्या जंजीर पड़ी है ?
चाँद दुल्हन क्या नई नवेली
जो बादल की ओट हो जाती
जब भी तारों की बारात गुजरती
क्या उनमे है रिश्तेदारी ?
और बदलिया क्या पायल पहने है
जब गुजरे है रुनझुन बाजे है
गुलमोहर क्या दुल्हा है
इतना क्यों हरसिंगार साजे है ?
पत्ते क्यों सब झर जाते हैं
इतन रूखापन क्या अच्छा है
लाल कोपले क्या फबती हैं
जैसे कोई नवजात बच्चा है
और रंगीनी तितली की देखो
सब फूलों पर सो जाती
क्यों तालाब का पानी मैला
मिट्टी इतना क्यों घुलमिल जाती 

कितने सारे फूल खिले हैं
जैसे सजा कोई छैला
सब अपनी में उलझें हैं
गिरगिट भी घिघियाता है
मेंढक अपनी ही टरियाता है
इतनी भीड़ नहीं अच्छी है
तबीयत अपनी घबराती है
जुगनू मेरी कहाँ सुनता है
बस अपनी भिनियाता है .
पंछी घास पर सो जाते
सूखे पत्ते पैरों से रौंदे जाते
आंधियां सब उड़ा कहाँ ले जातीं
उसकी अपनी भी क्या कोई बरसाती ?
गर्मी इतना क्यों सताती ?
नींद रात भर खो जाती
रात सखा दीवार छिपकली 
अब फिसली तब फिसली !

1 जून 2011

ईश्वर का हाथ

बेगानों के बीच
भीड़ में खड़ा अकेला
तब धरा हाथ तुमने काँधे पर
जोर जोर से धडकता दिल शांत हुआ |
जिसे पुकारता था
उस ईश्वर को याद किया
अश्रुपूरित नम आँखों से
जब धरा हाथ तुमने काँधे पर |
बुझते दीये की लौ को हाथों की अँजुरी से लिया ओट में
रोते हुए बच्चे को उठा लिया गोद में
रात में अनजाने पथिक के लिए जलाया द्वार पर दीपक
ग्रीष्म में पंछी के लिए छत पर रक्खा दाना - पानी
कमरे में फरफराती गौरैय्या के लिए किया बन्द पंखा
किसी खाँसते हुए मरीज की पीठ पर फिराया हाथ
किसी लड़खड़ाते हुए को झट लिया थाम
देख कर लगा बंधू , सखा !
ईश्वर का हाथ, मुझे छूकर चला गया
वो हाथ जो धरा तुमने काँधे पर |

31 मई 2011

शब्द सारथी थे

मैंने  हमेशा शब्दों को अहमियत दी 
अंकों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया 
जोड़ना घटाना
अंको का पहाड़ा
गुणा भाग , सबने 
मुझे हमेशा पछाड़ा 
वो तीन तेरह करता रहा 
मैं नौ दो ग्यारह हो गया 
अंक में बच्चा 
हिसाब में कच्चा 
बीजगणित सोचता
कृषि विज्ञान है 
और रेखा से कौन अनजान है 
शब्द तो सावन भादों 
बाग़ बगीचों 
बाज़ार ले जाते रहे 
हम उँगलियों से जुल्फ सहराते रहे 
लोग गिनते गए 
हम अलंकार मात्रा और छंद पीते गए 
शब्द यहाँ वहां बिखरे थे 
उन्हें आँखों में पढ़ा 
चेहरे पै गढ़ा
हाथों से थामा
पलकों से जिया 
दिल से तलाशा 
गढ़नी थी भाषा 
अनकहा लिखना था 
बिन लिखा पढना था 
मौन को नापना था 
कितना कुछ बांटना था 
शब्द सारथी थे 
कल्पना के रथ की लगाम थामे 
डटे थे कुरुक्षेत्र  में 
गिनना था युद्ध के पश्चात
दोनों पक्षों के क्षत विक्षत शरीर 
क्रंदन , करुणा, अवसाद 
ईश्वर का गणित समझना 
हमसे इतर था 
या था शून्य या 
सूक्ष्म से सूक्ष्म
अनंत से अनंत 
हमारी पहुँच से परे 
शब्द हमारी जेब में पड़े सिक्के थे 
जब चाहा निकाला,  खेला , उछाला 
असली या खोटा
अर्थ हमारा मितर था
जितना हमारे  बाहर था 
उतना भीतर था .
मुझे तुम्हारा नाम याद है 
तुम्हारा नम्बर - पता नहीं ?
वैसे तुम आदमी हो या मकान हो ?
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