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2 मई 2012

तब न कविता अधूरी होगी

शब्द सिक्कों की तरह 
दिमाग में खन-खन बजें 
आप जेब में हाथ डाल कर
मन-मन गिनें 
कुल कितने है ?
कहाँ-कहाँ से बीने हैं ?
इनसे क्या आएगा ?
क्या घर चल पायेगा ?
उधेड़ बुनता हूँ 
असमंजस रहता हूँ 
जेब में मुट्ठी बाँध रक्खी है 
कोई शब्द कहीं छूटा तो नहीं ?
कोई फूटा रस्ता तो नहीं ?
हिसाब में कुछ कम होते हैं 
अर्थ उधार पर भी मिलते हैं 
बनिया अगर नहीं  माना तो ?
खाली हाथ फिर लौटा तो ?
और शब्द कमाने होंगे 
जेब काफी भरनी होगी 
शब्दों के बाज़ार में अब 
जिन्सों की कीमत बढ़ी हुई है 
आसमान को छूती हैं अब 
जीना फिर भी लाचारी है 
कम मुकम्मल तैय्यारी है 
कुछ काम नया लेना होगा 
थोड़ा और समय लगेगा 
थोड़ा शब्द कमाना होगा 
कुछ और बचाना होगा 
जब पूरी जेब भरी होगी 
तब न कविता अधूरी होगी 
बाज़ार तभी पहचानेगा 
मुखपृष्ठों पे आने देगा 

3 अप्रैल 2012

संभवामि युगे-युगे !!

संभवामि -संभवामि
संभावनाएं हैं
समय की यही विडम्बनाएं हैं
युगे-युगे
हर युग में
किसी से नहीं मिला
क्यों नहीं मिले ?
मिलना चाहिए !
शब्दों को अर्थ
देना चाहिए
देखो
अर्थ के बिना
परसाई जी नहीं रहे
शब्द व्यर्थ रहे !
पाला-पोसा
बड़ा किया
काम नहीं आए
संभावनाएं !
गर्भ का शिशु अभागा
ही डिड-नॉट न्यू !
अभिमन्यु !
किस काल में आ रहा है !
घबरा रहा है
भविष्य अर्थगर्भित है
परिपूर्ण है
"फ्यूचर इज प्रेग्नेंट विथ पोसीब्लीटीज "
वायदा
वायदा-कारोबार 

वायदे-का-कारोबार 
"यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत 
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः "
सूचकांक 
ऊपर-नीचे 
नीचे-ऊपर 
शंकु -त्रिशंकु
सूचना का युग
सूचना-क्रांति
सूचना का विस्फोट
अर्थ नहीं चला
शब्दों में था खोट !!
बदलो -बदलो
वक्तव्य बदलो
ज़िल्द बदलो
कलेवर बदलो 

"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय 
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- 
न्यन्यानि संयाति नवानि देही"
बदलने का युग है  समय परिवर्तनशील है
सुबह का वक्तव्य शाम को वापिस लो
जैसा चाहो तोड़-मरोड़ लो
खुद को अष्टावक्र सा बना डालो
अपने आप को बदलो
आईना बदलो
युग बदलो
संभवामि युगे -युगे
हर हर गंगे !
हर हर महादेव !!
क्या क्या हरे 

गंगे-महादेव
हर्रे लगे न फिटकरी 
फिटकरी से याद आया 
कुछ गंगा में भी डाल देवें 
प्रदूषण कुछ कम हो जाए शायद !
संभावनाएं हैं
सतत-प्रयास करो
प्रयत्नशील रहो
चलते रहो
चरैवेति -चरैवेति
क्रांति-क्रांति
सतयुग आ रहा है
बस रिजर्वेशन मिल जाए !!
सम्भावना कितनी है ?
कोई चांस नहीं
कुछ ले-दे के होगा ?
देखना पड़ेगा 
आप इतना रिकुएस्ट किये है
तो कोशिश करेंगे
आखिर मानवता भी कोई चीज है
हम अपनी तरफ से कोई कसर बाकि नहीं रखेंगे
निसाखातिर रहें
आखिर अपने देस के हैं
परदेस में अपना अपने के काम नहीं आएगा
तो कौन आएगा ?
काम तो हो जाएगा न ?
भरोसा रखिए
वो "ऊपर वाला "है न
वो सबकी "खबर " रखता है
उस पर भरोसा रक्खें
(उसको अपने आप पर है न ?, बस !)
साहस नहीं छोडना चाहिए
सम्भावना पूरी है
भरोसा बनाए रखिए
वो भरोसे वाला क्या मुहावरा है -
भरोसे की भैंस पाड़ा .......??

भैंस से
याद आया 

भाई
किसने खाया
चारा ?
भाई -चारा ? , भाई चारे में सब चलता है !!
संभवामि युगे युगे
"हम सब हैं भाई-भाई
ये सरकार कहाँ से आई ?"
यह तो नारा हो गया !!
वाह !!
आप तो कविता लिखने बैठे थे ?
नहीं ?
फिकर नॉट !!
आपका भविष्य अब उज्जवल है
जल्द ही टिकट मिलने की सम्भावना है !!
संभवामि , युगे -युगे !!

इस युग में सब संभव है !!

1 अप्रैल 2012

मैं जानता हूँ

आधा-अधूरा 
थोड़ा-ज्यादा 
सब कुछ पढ़ा  
अक्षरशः
जब भी 
अंतराल आया 
स्मृति का चिन्ह रख छोड़ा 
फिर वहीं से पकड़ा जोड़ा 
मेज़ पर पड़ी हुई किताब ने 
फिर अचानक क्यों पूछा - 
"मुझे पहचानते हो ?"
यही सवाल -
"क्यों बार-बार,
अलमारी में रक्खी किताबें भी पूछने लगी हैं ?"

पंक्ति दर पंक्ति 
पृष्ठ दर पृष्ठ 
उठाया-पलटा  
खंगाला-उलीचा 
कोई नहीं मिला 
फिर कौन बोला 
किसने मौन तोड़ा 
शब्द को अर्थ किसने दिया 
क्या कोई पात्र जीवंत हो गया ?
मैं सहसा कितना डर गया !!
कुछ था जो अन्दर भर गया 
सर से पाँव तक एक सिहरन 
दौड़ गई 
आँखें दरवाज़े तक गईं 
फिर खिड़की के परदे पर जा टिकीं 
और वहाँ से छत पे घुमते पंखे पर 
अगर यह चल रहा है ?
तो मेरे माथे पे पसीना क्यों आ रहा है ?
ज्वर है ?
ये किसकी परछाईं है ?
कौन मेरे सिराहने खड़ा है ?
खुद को चिकुटी काटी
यह कोई स्वप्न नहीं है 
मैं तो जगा हूँ 
अकेला हूँ , अभागा हूँ 
तभी तो किरदारों में पड़ा हूँ 
इन्ही से बातें की हैं 
इन्ही को समझा है 
पात्र-अपात्र 
सखा, भाई , सगे सब यही हैं 
यही रिश्ते-नाते हैं 
यही सखा हैं , प्रेमी हैं 
सुख-दुःख में साथ निभाते हैं 
रोते-हंसाते हैं 
रात-बिरात जागते हैं 
मेरे साथ ही मेज़ पर बैठ 
चाय-नाश्ता होता है 
सिगरेट का छल्ला उड़ता है 
मेरे ही बिस्तर पर 
बेतरतीब पड़ना 
मेरे साथ उठते-बैठते 
मेरी किताबों के किरदार 
कब किताबों से मेरे जेहन में 
घुस गए 
अब मुझसे ही पूछते हैं -
"मुझे पहचानते हो ?"
इस प्रश्न का मैं क्या उत्तर दूँ ?
मैं जानता हूँ ?

14 मार्च 2012

जुबान

मैनें जुबान कब खोली है 
मौन ही अपनी बोली है 
निर्मिमेष नैनों की भाषा 
आँखों में कैसी जिज्ञासा 
ज़िंदगी छल-प्रपंच-धोखा 
दुनिया बच्चों सी भोली है ||


स्वप्न सारे थे अनूठे,
ह्रदय के अभिसार झूठे,
कहीं गिरे , कहीं उठे ,
इससे जुड़े , उससे रूठे, 
बुना यही ताना-बाना 
झीनी-झीनी झोली है ||


पूर्व में गोला सहसा ,
क्षितिज से झांके कैसा,
नील देह ओढ़े भगवा ,
रात्रि ले अंगडाई जैसा,
इतना न निहारो प्रिय 
तनि कसक चोली है ||

9 मार्च 2012

होली में


हाथों में है आज बरसों बाद फिर गुलाल होली में
मुझे क्यों याद आते हैं तुम्हारे गाल होली में||


बहुत दिनों से नहीं की कोई धमाल होली में
साली याद आती है चलो ससुराल होली में ||


जाने मनचला कर गया क्या मनुहार होली में
बिना रंग के ही हो गई गोरी पूरी लाल होली में ||


चढ़ाई भांग, ठंडाई, और हुआ अब ये हाल होली में
पड़ोसन के घर ना हो जाए कोई बवाल होली में ||


भीगा बदन , चोली, दुपट्टा, , सर, बाल होली में
न उसने ना-नुकुर की न ही कोई सवाल होली में ||


छोडो बाल्टी , गुब्बारे , पिचकारी , अबीर-गुलाल
चलो रंगों से घोल दें इस साल पूरा ताल होली में ||


मिलेगा  दिन में न मौका लगा नवकी दुल्हिन को
रात में ही किया देखो दूल्हे का क्या हाल होली में ||


गाली , मस्ती, चुहल , छेड़छाड़ , और थोड़ी ठिठोली
भड़ास दिल की औ' मन का मैल निकाल होली में ||


न ठुमरी, दादरा, चैती , फाग, होरी कोई मनवा में
उसके बाद नहीं जमता हमेँ कोई सुर-ताल होली में ||


न अब चाहता है कोई हम उसे रंग में अपने डूबो दें
बुढ़ापा रंग गया है सफ़ेद हमारे सब बाल होली में ||


उड़ाओ घर पे गुझिया, मालपुआ , तरमाल होली में
हमारे हिस्से वही परदेस वही रोटी दाल होली में ||

22 फ़रवरी 2012

इतिहास ( चतुर्थ किश्त : क्रमशः )


संस्कृत 
वेद , ऋचा , श्लोक , उपनिषद 
दर्शन , शास्त्रार्थ 
एक प्रथा 
सिंधु सभ्यता 
की लिपी अपठित , अलभ
चित्र सन्मुख 
पशुपति – नंदी मुद्रा 
अंकित विशेष 
देवता शिव सा  
स्वरुप महेश
रूद्र महादेव 
देवाधिदेव 
तीर्थ दुर्गम  
कैलाश – मानसरोवर 
अट्ठारह ज्योतिर्लिंग 
प्राचीन अर्वाचीन देवता 
युग बाद आये  द्वापर, त्रेता  
तब छाया था 
शंकर - भाष्य 
संस्कृत भाषा 
ॐकार 
शब्द ब्रह्म 
नाद ब्रह्म
अउम ध्वनि 
व्याकरण पाणिनि 
स्मृति शाश्वत 
वैदिक विरासत 
देववाणी तुल्य 
अमृत-सम-अमूल्य 
पर इनसे इतर 
मनुष्य बहुल 
किस स्वर संकुल 
सकल-संवाद-रत 
क्या उनके प्रयत 
थे स्वर दीर्घ 
या सिर्फ 
ह्रस्व    
क्या पता 
क्या थे सब शतपत 
या एतरेय ?
तैतरीय निषाद 
एकलव्य 
संशय  की पराकाष्ठा 
है मुझे भी सालता  
क्या करें 
कैसे रहें 
सब प्रश्न स्वयं से पूछते रहे 
नचिकेत अग्नि के पूर्वाग्रह 
हों कितने भी गूढ़
हम मूढ़  
यम के द्वार डटे रहे 
आर्य –अनार्य
विभाजित के विपर्यस्त
भोगा 
राम का वनवास 
संपर्क प्रथम 
वनवासी समाज 
केवट संगम 
स्वप्न समागम 
बाँधा एक पुल,एक सेतु 
फिर भी रहा कटा 
जन-ज्वार नहीं पटा
धोबी का ताना 
बना उर-छाला
सीता - त्याग
अग्नि-परीक्षा 
आज तक खीजता 
खोजता मृगमरीचिका  
कल्पनालोक 
यूटोपिया 
किसने दिया , किसने दिया 
रामराज्य , रामराज्य   
तुलसी के सात सोपान 
भक्तिमय उपादान 
श्रवण-पान श्रवण-गान .
बदली , बदली, भाषा बदली 
चार कोस पर बोली 
ब्रज , अवधी , मीरा , रहीम , कबीर, रसखान 
विद्यापति , पद्मावत , जायसी, नानक, सूरदास 
उठे ढोल , मंजीरे 
भक्ति रस में धीरे -धीरे 
पीछे छूटा बमभोला 
हर हर महादेव 
महामृत्युन्जय
कृष्ण की रासलीला 
बाल गोपाल उनका झूला 
बही बही बयार 
उमडा उमडा जनज्वार 
कुछ-कुछ पटा
लोक-जन , जन-जन 
समरसता , समरसता 
ब्रज की बोली , अवधी की सत्ता 
भाषा का रामराज्य बसता !!

21 फ़रवरी 2012

इतिहास (तृतीय किश्त : क्रमशः )


रेगिस्तान 
रेत का वीरान 
कितने इतिहासों की स्मृति 
कितने कवलयतियों का श्मशान 
ज़िंदगी 
रण-बाँकुरा  
या कालबेलिया बंजारा 
सूरज के सिर पै सवार 
दौड़ता घुड़सवार
टापों की पुकार 
जिंदगी भागती 
रेत की आँधी
सी उड़ चली 
कट चली    
रेत के सब टीले 
बदलते रहे कबीले 
बंजारे , बंजारे 
किसको पुकारे 
आज यहाँ कल वहाँ 
चरैवेति , चरैवेति, चले 
हमको क्या धमकाते ?
क्या है जो हार जाते ?
रेत की आँधियाँ
सहस्त्रार शताब्दियाँ 
सूर्य के प्रहार 
रोज़ हम झेलते 
ज़िंदगी को ठेलते 
लड़ रहे युद्ध हैं 
रंगहीन समुद्र हैं 
किन्तु सब रंग जिया 
बांधे सिर पर लहरिया 
रंगों का इन्द्रधनुष !
जीवन एक युद्ध !
हरदम , मार्ग दुर्गम , अवरुद्ध 
था जिसका वरण
किया धारण 
हाथ - शस्त्र
लौह - वस्त्र 
नेत्र - निमेष 
शत्रु - निषेध 
दुर्ग - प्राचीर  
किले - अभेद्य 
धधकती ज्वालाओं में 
कवलित जौहर 
केसरिया पताकाओं में 
हल्दी रक्त गौहर 
अदम साहस 
अदम साहस 
आदिम अट्टहास
शिशु शैशव बचा 
जो भी बचा
एक ही इतिहास 
रक्त रंजित मञ्जूषा  
सबमें पारंगत 
भाला, बरछी , तलवार
इन्हीं खिलौनों रत  
पीढ़ी दर पीढ़ी 
लड़ाईयां लड़ी 
चलता रहा झगडा 
लड़ा, लड़ा, और लड़ा 
नहीं हुआ नत 
जीवन अस्त-व्यस्त
नहीं कोई नदी 
बहा रक्त-प्रपात 
सिंचित सारी धरा 
रक्त-प्रपात, रक्त प्रपात 
हमें कहाँ नींद , हमें कहाँ सोना
राणा प्रताप , राणा प्रताप
जीवन का तम्बू जहाँ उखड़ा
मृत्यु का वहाँ गड़ा 
जीवन अस्त-व्यस्त 
नहीं हुआ नत. 

इतिहास - ( द्वितीय किश्त: क्रमशः )

मैदान में बस गए
गंगा दोआब भए
पंजआब भए
यहाँ वहाँ सर्वत्र
भागीरथ के साठ सहस्त्र
पुरखों की हड्डियों से उर्वरा
भर गया सुनहरी
बालियों सा सोना खरा
खेती-किसानी की
तुम्हारे खलिहान भए
कोल्हू के बैल भए
गाय को माता किए
आता किए , जाता किए
खता किए, खाता किए
घाट नहाए , मंदिर के द्वार रहे
गुरु द्वारे मत्था टेका
फ़कीर की मज़ार गए
गाए कजरी , ठुमरी , चैती , फगवा
इन सबसे ऊबे तो डार लिए भगवा
बांचन लागे तुलसी की रामायन
गाए लागन मीरा,सूर के भजन
पार की वैतरणी
कबीर की बानी
दुनिया आनी जानी
थके हारे , सुते रहे
दस माह जुते रहे
पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ
कुछ बूझा, कुछ नहीं बूझा
वही काटा , जो बुआ
हम का कहें बबुआ
कोऊ नृप होए हमैं का हानी ?

हम तो पढ़ें मित्रों मरजानी ?

17 फ़रवरी 2012

प्रेम

देह है 
दैहिक है 
दहकता है 
मस्तिष्क से पैर 
शिराओं में तरल 
बहता लावा
देह वन में दावानल 
देहयष्टि 
पोर-पोर अंगारा
एक टुकड़ा  
होंठों पै 
अब भी दग्ध है 
एक टुकड़ा 
कनपटी से चिपका 
आसपास गालों तक 
रोम-रोम 
तप्त है 
सुर्ख हैं  
रक्ताभ कपोल 
जिस्म का ज्वार !
बहती है स्वेद की क्षीण धार !!
यह क्या है ह्रदय का उदगार !!!
प्रेम है 
लौकिक है 
ललकता है 
आँखों में 
थिरता है 
बैचेन एकलता है
रीझना , रूठना , मनाना
सजना , संवरना, इठलाना 
समझना , समझाना 
वृथा बहलाना 
खेल , खिलौना , खेलना 
उम्र का बचपना 
सृष्टी की रचना 
ऐसी ही है संरचना 
पिहु-पिहु पुकारना 
चकोर का ताकना 
मन की सरलता 
मन का जोड़ना 
विश्व क्या द्वैत है ?
शाश्वत द्वन्द 
ये नश्वर काया 
जो पाया   
क्या माया   
यह कैसा भोग ?
प्रेम क्यों रोग ??
क्या कहते ज्ञानी 
प्रेम की क्या बानी  
एक ही वचन बोल 
प्रिये ! सिर्फ तुमसे है प्यार !
ले कोई प्रियतम पुकार !!
ढाई आखर आखिरकार !!!


(१४ फरवरी का बुखार उतरने के बाद )

10 फ़रवरी 2012

इतिहास (प्रथम किश्त )

इतिहास चर्चा 
कभी भी कहीं भी 
इफ़रात से 
सुकरात से 
औने -पौने दाम 
टाईम पास मूँगफली
तोड़ी-फोड़ी, छिली
आड़ी-तिरछी लकीरें 
विहंगम पटल
सबका शगल 
जैसे चाहो उड़ेल दो रोशनाई 
वृहत्तर कैनवास 
सीता की अग्निपरीक्षा 
राम का वनवास 
द्रौपदी का चीरहरण 
सावित्री का व्रत-उपवास 
दुर्योधन का अट्टहास 
गांधारी का उपहास 
अंधा है धृतराष्ट्र
अंधा है धृतराष्ट्र
न चाहिए विवेक 
न शिष्टाचार 
डालो अचार , डालो अचार 
नहीं कुछ खर्चा
इतिहास चर्चा .
(क्रमशः जारी )

1 फ़रवरी 2012

खोखला

खेत की मेड़‌‍‌
बहुत बड़ा 
बरगद का पेड़ 
खड़ा है 
ड़ा  है 
अंदर से पोला है  
खोखला है  
कोई आंधी नहीं 
गाँधी नहीं 
हवा का एक हल्का सा झोंका 
गिरा देगा 
हरा देगा 
कोई कुल्हाड़ी मत लाना .
न हँसी असली 
न शब्द न कथनी न करनी 
बहत्तर छेद चलनी  
मिट्टी की  गाड़ी 
मृच्छकटिकम
चलती गड़ड़
हाथों में भरे 
विषभरे अक्षर 
मन से 
मस्तिष्क से 
रक्त कलम से 
गलियों से 
खेतों से
सड़कों से 
गुजरते रहे 
आते रहे जाते रहे 
अकेले अकेले चले 
घर जले 
बस्ती जली
कस्बे जले 
जहाँ जहाँ से गुज़रे 
काफिले
चेहरे  , चेहरे , तमाम चेहरे 
लूले लंगड़े अंधे बहरे 
हाथ , हथेली , मुट्ठी बाँधे
दाँत भींचे , फूले नथुने
रक्ताभ आँखे 
जुलूस  बने , जलसा बने , बहस -मुबाहिसा हुए 
अर्थ की अर्थी उठाए 
सफहा - सफहा 
बिखरे बिखरे हरफ 
एक तरफा , एक तरफ 
गूंजने लगे 
गाने लगे 
चिल्लाने लगे 
पाँवों के तलुए 
चाटने लगे 
सूँघते हुए 
गलियाँ-गलियाँ 
घूमते
कटखौने हुए , काटने लगे 
गालियाँ - गालियाँ 
और सब तटस्थ हैं 
अर्थ सब बौने हुए 
सुविधा के बिछौने हुए 
धूप से बचने के लिए 
आँखों को ढाँप लिया 
स्वार्थों को भाँप लिया 
दाम औने-पौने हुए 
खेत की  मेड़‌‍‌  पर 
सूखे हुए कुँए के पास 
धराशायी बरगद 
भीष्म सा लहुलुहान 
और विजयी मुद्रा में पास ही खड़ा है 
एक बिजुका शिखंडी 
बजउठी रणभेरी
अट्टहास कर , नरमुण्ड बांधकर 
नृत्यप्रवृत कापालिका , चंडी  
हो गया नाटक का अंत 
पर्दा  धीरे -धीरे गिरता है 
मूक - दर्शक  अपनी -अपनी जगह खड़े  , 
बजायेंगे , करतल 
तालियाँ - तालियाँ .

उल्लू

घुग्घू  या मुआ 
किसी भी नाम से पुकारें 
उल्लू का पट्ठा
उल्लू का पट्ठा रहा !!


घोंघा बसंत होने का दर्द 
जिसने सहा हो 
वह जहाँ भी रहा हो 
पानी के करीब 
किसी पुराने खंडहर 
या किसी पेड़ का सगा  
सारी उम्र घुग्घियाता - 
घुग्घूऊ ऊऊ रहा करता ,   
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा !!


गले में पड़ा है 
लक्ष्मी का पट्टा 
भाग्य घिसा-पिटा
परसाई जी का दर्द 
परसाई जी ने कहा 
सबने अपना-अपना 
उल्लू सीधा किया 
चलता बना 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!


प्रेम का फर्द 
ज़माने का सिरदर्द 
पिछली पीढ़ी का क़र्ज़
अगली पीढ़ी का फ़र्ज़ 
अजीर्ण का रोग 
अनिद्रा भोग 
विरह-वियोग 
प्रथम-मिलन-सम्भोग 
भैरवी साधना 
बकवादी की बकवास 
दार्शनिक का फलसफा 
देवों का सोमपान 
देवी का निंदा-सद्यस्नान  
सब का रतजगा 
सारी सारी रात चला 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!



बिसमिल्ला की शहनाई 
पर जैसे आधी रात
राग बिहाग सजा, 
बजा, जब चढ़ी तान
कामदेव का बाण
इस पर चला 
उस पर चला 
पुकारती रही 
नयनों की आतुरता 
बैठा रहा घुग्घू 
निर्मिमेष ताकता 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!

28 दिसंबर 2011

त्वरितर : नयी ज़मीन की तलाश

त्वरितर  पर बहुत दिनों से सक्रिय हूँ . बहुत से और लोग भी हैं साथ में . ऐसे जो नागरी में त्वरित करते हैं और कुछ लोग रोमन हिन्दी में . और कुछ जब जैसा अच्छा लगे . सुविधा अनुसार .

हिन्दी में ब्लॉगिंग पर बहुत दिनों से हाथ आजमा रहा था . फिर त्वरितर पर क्यों ? ब्लॉग पर कुछ लिखो , फिर लोग जो पढ़ने वाले हैं वो भी या तो खुद ब्लॉग लिखते हैं या लिखना चाहते हैं . प्रतिक्रिया और टिप्पणी ज्यादातर बहत अच्छा लिखा है या कुछ उससे मिलता जुलता .

त्वरितर पर उससे ज्यादा कुछ होता है ? नहीं . ब्लॉग को ज्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिये मित्र आमंत्रण भी देते हैं टिप्पणी के साथ , हमारे ब्लॉग पर आइये . हमने आपकी पीठ खुजाई है , आप हमारी खुजा जाइए की तर्ज़ पर .

इसके साथ फीड है , हिंदी ब्लॉग के ऐग्रीगेटर (समन्वयक ) हैं जैसे हमारीवाणी , ब्लॉगअड्डा, नेटवर्कड ब्लॉग, चिटठाजगत , ब्लॉगजनता , ब्लॉगप्रहरी ईत्यादी. इसी के साथ जखीरा , अनुभूति , कबाडखाना जैसे ब्लॉग हैं जिसके कई लेखक हैं . इसके साथ कुछ और प्रयास हैं जैसे आज की हलचल , वटवृक्ष आदि जो अन्य ब्लॉग लेखन को अपने यहाँ रोज प्रस्तुत करते हैं . कुछ ने पाठकों की खोज में फेसबुक पर भी पृष्ठ बना लिए हैं .

फिर इसमें त्वरितर जो की महज  १४० टंकको की समरभूमि है पर क्या जोर आजमाइश की  जा सकती है . दरअसल हिन्दी के लेखकों या कवियों की समस्या पाठक है . पाठक को पठन सामग्री नहीं मिल रही . पत्र-पत्रिकाएं प्रायः नगण्य उपलब्ध है . पढ़ना पढ़ाना कम हो रहा है . लेखक और कवि सुपरिचित नाम नहीं रहे . हिन्दी की पत्रिकाएं अब या तो बहनजी मार्का रह गयी हैं या मनोहर , मधुर कहानियों की तरह या अंगरेजी में प्रकाशित पत्रिकाओं की चचेरी बहन जैसी . जो घर में रहती है साथ , हाँ ये भी है की तरह .

और इसी में हमारी इती श्री हो जाती है . हम लिख तो रहे हैं पर पाठक वर्ग खोता जा रहा है . मैंने पूर्व लेख में लिखा था की हमारा हिंदी पढने वालों के साथ लिखने वालों का दायित्व बनता है पाठक वर्ग तक श्रेष्ठ हिन्दी साहित्य की झलक ले जाना . बड़ी बड़ी कम्पनियां अपने उत्पाद का मुफ्त सैम्पल बांटी फिरती हैं . ताकि हम और आप फिर जब बाज़ार में जाएँ तो नाम याद रक्खें और फिर माल खरीद भी लायें . लिखने वाले अगर चाहते हैं की पाठक उन्हें पढ़ें तो उन्हें पाठक भी तैयार करने पड़ेंगे . और इसके लिए आपको सिर्फ अपना लिखा नहीं परन्तु आप जिस परंपरा के हैं उस परंपरा को भी आप को पाठकों तक ले जाना पडेगा .

इसीलिए आह्वान किया था की समय की कमी है , लोग बहुत लम्बा एक साथ नहीं पढ़   पाते , सब समय संगणक के सामने नहीं बैठ सकते , अतएव जब मोबाइल फ़ोन जो लोगों के पास करोड़ों में हैं . और जिस पर जहाँ चाहें जब चाहें त्वरितर पर लोग सक्रिय हैं उसका इस्तेमाल इसलिए किया जाए .

बहुत से ब्लॉगमित्र नहीं लेखक , मित्र कैसे कह सकता हूँ वो मुझ अकिंचन को जानते तक नहीं अपना खाता त्वरितर पर खोल तो लिए पर उसे समझ नहीं पाए और निष्क्रिय हैं . सतीश पंचम जी हैं , प्रतिभा कटियार जी  हैं . और कुछ हैं जो वहां सिर्फ अपने या अन्य ब्लॉग के लिंक डाल कर समीर लाल उड़नतश्तरी की तरह फुर्र हो जाते हैं . यह काम तो ब्लोगवाणी सरीखे समन्वयक अच्छे से कर रहे है.

कौतुहल होना चाहिए , कौतुहल जगाना चाहिए , जिज्ञासा उठे , इच्छा जगे - क्या है ? तब तो सार्थकता है .

त्वरितर का उपयोग कैसे हो , यह बहुत कठिन नहीं है . अविनाश वाचस्पति तो बहुत धुरंधर हैं , किसी को घास ही नहीं डालेंगे . पर संतोष त्रिवेदी हैं , भाई नवीन चतुर्वेदी हैं , रवीश जी हैं , अविनाश हैं , ब्रह्मात्म अजय हैं , अलोक रंजन हैं अर्कजेश हैं प्रवीण त्रिवेदी हैं सब धीरे धीरे हिंदी के दर्शन त्वरितर पर करा देते हैं . वंदना जी हैं . सब मिलजुल कर सहयोग कर सकते हैं . त्वरित का सहायता पृष्ठ भी है . जिसका लिंक पूर्व में मकडजाल वाले लेख के नीचे टिप्पणी में दिया था . आंग्ल भाषा में है . अगर दुविधा न हो तो उपयोग सहज है . वैसे भी जिसने ब्लॉग पर कारस्तानी कर ली वह हाथपाँव पटके तो इसमें भी सिद्धहस्त हो जायेगा .

मकडजाल पर पूर्व में लिखा था की त्वरितर का उपयोग कैसे हो . इस बारे में कुछ उदहारण एकत्रित किये हैं . जैसे किसी ने पाने त्वरितर पर अनुभव को लेकर एक कहानी लिखी . वह भी आंग्लभाषा में हैं पर उपयोगी होंगी . आप सब बुद्धिजीवी हैं . आप के लिए सहज और सरल है अपने लिए रत्न चुन लेना .

फिर कुछ और उदाहरण हिन्दी कविता , ग़ज़ल , त्वरित टिप्पणी इत्यादि की भी एकत्र की हैं . आज फिर एक कहानी मिली है जो किसी ने अपने  त्वरितर  पर एक वर्ष जन्मदिन मनाने को लेकर लिखी है .

यहाँ समाचार हैं , प्रेमकहानियाँ  भी हैं . खेल है , जीवन के सब रंग हैं , सब रस हैं,  सब भावनाएं हैं . आपको कई कवितायें , कई शेर , कई कहानियाँ मिल जायेंगी . मुक्तिबोध जी के शब्दों के साथ इस प्रकरण को यहीं समाप्त करना चाहता हूँ , ऊपर उल्लेखित सामग्री आप के साथ आगे बाटूंगा . तब तक आप मुक्तिबोध जी को पढ़ लें :

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए !!

एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं
व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने
सब सच्चे लगते हैं
अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है
मैं कुछ गहरे मे उतरना चाहता हूँ
जाने क्या मिल जाए !!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य-पीड़ा है
पलभर मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ
इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ
अजीब है जिंदगी !!
बेवकूफ बनने की खतिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ
और यह देख-देख बड़ा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ
हृदय में मेरे ही
प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण,मत्त हुआ जाता है
कि जगत्..... स्वायत्त हुआ जाता है।

कहानियाँ लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहाँ जरा खड़े होकर
बातें कुछ करता हूँ
......उपन्यास मिल जाते।

दुख की कथाएँ, तरह तरह की शिकायतें
अहंकार विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
जमाने के जानदार सूरे व आयतें
सुनने को मिलती हैं !

कविताएँ मुसकरा लाग- डाँट करती हैं
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियां
श्रद्धाएँ चढ़ी हैं !!

घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप- चित्र
लेकर मैं घर पर जब लौटता.....
उपमाएँ द्वार पर आते ही कहती हैं कि
सौ बरस और तुम्हें
जीना ही चाहिए।
घर पर भी,पग-पग पर चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए रोज मिलती है सौ राहें
शाखाएँ-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं
नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय
रोज-रोज मिलते हैं....
और,मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन् यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है
और वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है !!
                                      

7 दिसंबर 2011

आज कल नहीं लिखता कविता

आज कल नहीं लिखता कविता
नहीं लिख पा रहा हूँ कविता 
कुछ सूझता ही नहीं 
कोई शीर्षक नहीं 
न विषय .
और तुमने भी तो नहीं कहा -
"मेरे ऊपर कुछ लिखो ."
शब्द और अर्थ अब नहीं मिलते 
बहुत दिनों से किसी गौरैय्या को नहीं देखा बाल्कनी में 
नहीं देखा सुबह क्षितिज से उठता सूरज 
किसी नदी के घाट पर बैठ
पाँव नहीं भिगोया बहते पानी में झुलाकर 
दोपहर खाली पाँव नहीं दौड़ा घाट की जलती सीढ़ियों पर
पत्थर बहुत जल्दी जल जाता है न ?
क्या इसीलिए तुमने आना बंद कर दिया ?
कुरते की जेब में से एक पुराना कागज़ निकला है अलबत्त.
और पुरानी रेगज़ी के कुछ शब्द 
पर काम नहीं बनेगा .
रेगज़ी बंद कर दी गयी है .
वैसे एक ,
रूपया भी निकला है अर्थ का 
पर बाज़ार में सब चीज़ों के भाव बहुत बढ़ गएँ हैं .
कुछ नहीं सोचता , कुछ नहीं सूझता .
बहुत दिनों से एक ही कुरता पहने पहने
काफी मैला हो गया है 
बदलना है 
नया पत्ता पलटना है 
पर करें क्या ?
ये धोबी भी तो नहीं आया कपडे लेने 
पिछले महीने का गया -
और जब तक आगे वाले धुल कर नहीं आते - क्या पहने ?
पेड़ से जैसे झड गए हैं पत्ते 
नंगा हो गया है 
सारा का सारा ठूंठ 
मैं भी क्या उतार फेंकूं ?
कुछ जल्दी ही करना पड़ेगा 
ऐसा बहुत दिन नहीं चलने का .
किराया नहीं दिया न 
मकान मालिक ने कह दिया है 
-मकान खाली कर दीजिये जल्दी .
अगले महीने लड़की और दामाद 
यहीं ट्रान्सफर हो के आ रहे  हैं .
कविता का कोई रिश्तेदार भी नहीं .
कहाँ जाये ??
क्या करे ?
चलो कहीं घूम ही आयें .
कहीं कोई खाली कमरा मिल जाये .
काम चलाऊ भी चलेगा .
आप की निगाह में हो तो बताइयेगा .
नहीं नहीं .
फ़ोन कर पैसा क्यों जाया करेंगे .
एक एस एम् एस भेज दीजियेगा .
मेरा काम हो जाएगा .
आजकल इससे ज्यादा कोई लिख भी कहाँ रहा है .

14 नवंबर 2011

कौन हूँ मैं

कौन हूँ मैं ?
हाड़ माँस का पुतला 
जैसे शेर, शेर 
और पीपल ,पीपल 
या कोई और है मसला?
कौन हूँ मैं ?
नदी की तरह बहता हुआ 
पहाड़ से समुन्दरों की ओर
या फिर नभ में विचरता 
पंक्षी उड़ता 
विभोर 
कौन हूँ मैं ?
किसी देश की मिट्टी में कैद 
एक शरीर - 
जिसने पहन रक्खा है एक नंबर 
जिसकी सीमाओं के चारों ओर है 
तैनात सिपाही 
जिनकी बाज़ सी आँखों को छला नहीं जाता 
कोई नहीं जो , लांघ के जा सकता 
सीमा के उस ओर 
और फिर कहते हो 
- हम आजाद हैं .
कौन हूँ मैं  ?
उधेडो , काटो , बांटो , जोड़ो 
रक्त-हड्डियाँ-छाल 
वही आँखे , वही हाथ , वही वसा , वही गात 
सिर्फ एक दुर्घटना 
या फिर कोई और रचना 
मेरे दिमाग को उलटो - पलटो 
धोलो , खंगालो  
पर इस दर्द से बचा लो 
इस दंश से उबारो 
इसमें कौन सा कीड़ा कुलबुलाता है 
जो मुझे बार बार बताता है 
कि मैं किसी ग्रन्थ की ईबारत हूँ 
कि मैं पवित्र हूँ , मैं सच हूँ , आयत हूँ 
कि मैं ईश्वर हूँ , ईसा हूँ , खुदा हूँ 
कि मैं अपने ही जैसे किसी और आदमी से जुदा हूँ 
कौन हूँ मैं ?

30 सितंबर 2011

यथावत

घड़ी के कमान सी 
चल रही है जिन्दगी 
वक्त कट रहा है 
वक्त में सी रहा है 
खुद को आदमी .
आँखों के आंसुओं से 
उभरी दो लकीरें 
और जिन्दगी का रुख 
नहीं बदला ;
टूट टूट कर बालों ने 
समय के पहले 
बूढा किया और गर्द 
चेहरों पर सिमटी 
और इन सिमटी लकीरों में 
यादों सा पी रहा है 
अपना लहू आदमी .
समस्याओं के घेरे में घूमता पंखे सा 
और हो उठा है ठण्ड की चाहत में गर्म 
आदमी ; अंतरिक्ष में घूमता 
कैद हो गया कमरे में .

सत्य

सत्य का रूप हर दौर में बदला है 
सत्य क्या दुनिया में एक रहा है ?
सत्य है एक सुलगते चूल्हे जैसा  
हर कोई अपनी रोटी सेंक रहा है .
एक झूठ जिसे गर्द ही गर्द मिली 
सत्य के मामले मीनमेख रहा है .
सत्य जैसे एक अछूत गुडिया हो
गाल खींच हर कोई फेंक रहा है .
सत्यवादियों ने ही सत्य को छला
सत्य खुद को शर्म से देख रहा है .
सत्य की जात गिरगिट पी आई है 
सत्य तबसे राजसत्ता की सेज रहा है .  

चंद ख़यालात

किसी को उस मोड़ से दहशत नहीं होती 
जहाँ अब हाथों से ईबादत नहीं होती  .
हर मुलाकात इक  रस्म से ज्यादह नहीं 
कोई जुम्बिश कोई हरकत नहीं होती .
पहले हर चीज को मचलता था दिल 
अब किसी बात को तबियत नहीं होती .
हर चोट पर दर्द होता था जिसे , उसे 
अब जख्मों से भी दिक्कत नहीं होती .
ये दिल जो यहाँ वहां रहने से डरता है   
वर्ना रहने को क्या ईमारत नहीं होती  .
रोज़ का मजमून इक दिन का माजरा नहीं  
इसे रिश्ता कहते हैं ये सोहबत नहीं होती .  

29 सितंबर 2011

मैं कब कब पैसे के बारे में सोचता हूँ

मैं सोचता बहुत कम हूँ 
खासकर पैसे के बारे में 
क्योंकि मेरे पास अब बहुत पैसा है 
पैसा तो है 
पर आसपास आवरण है 
उसके भीतर 
मेरा खोखला आदर्श 
दम्भपूर्ण आत्मविश्वास .
मुझे याद है 
जब मैंने कभी 'चालू चाय ' के लिए 
कहा था
तो एक क्षण ख्याल आया था 
अपनी हैसियत का .
और जब स्पेशल पी गया , शंका के साथ 
अपनी और बेयरे की भूल से 
और चूका नहीं पाया उसकी कीमत 
तब तमाशबीन भीड़ के बीच 
जब 
मेरे झुकने का एहसास मुझे हुआ था 
तब और उसके बाद 
मेरे पेट पर पडी थी घुटनों की टक्कर 
यह मेरे कपड़ों पर थी 
पैसे वाले मालिक की 
और उसके कानूनदार साथी की 
मुझपर और बेयरे पर 
तब मैंने पैसे के बारे में सोचना शुरू कर दिया 
हाँ , बेयरे के बारे में नहीं कह सकता 
वह , अब भी वहीँ है , मेरी होटल में .
मैंने गलती से उच्चशिक्षा में दाखिला लिया 
वैसे तो मन की आग भी नहीं बुझती 
पर तन की भूख के आवरण में मेरा तन 
छटपटाने  लगा था 
उच्चघराने की बहू - बेटियों को देखकर 
उस छटपटाहट  के जख्म मैंने आज भी बो रक्खे हैं 
अपने सीने में 
तब मैंने सोचा ये नारी तो नहीं 
मैं इन्हें नहीं पा सकता 
इनका मापदंड पैसा है 
और मैं आदमी ज्यादा हूँ 
फिलहाल .
तब मैंने औरतों के बारे में 
बंद कर दिया  
और शुरू कर दिया सोचना 
पैसे के बारे में , सिर्फ पैसे के बारे में 
मेरे स्वयं के बिकने की वजह मिल गयी थी मुझे .
वो अब भी वहां महफ़िल जमती है 
पर मैं 
यहीं पर अकेला ठीक हूँ 
मैं बाँटकर पीता जरूर हूँ 
पर जहर नहीं 
और फिर यह मेरा तब का खून है 
जब मैं आदमी था 
मुझे याद है मेरे बाप की ईमानदारी पर हँसे थे ये 
मेरी लेडीज घड़ी पर हँसे थे 
मुझे समय का एहसास हुआ था 
और मैंने सोची थी उन गरीब मन की दयनीयता 
और मैं हँसने वाला था ,
पर उससे पहले कोई हंस दिया था जोर से 
मेरी फटी कॉलर पर 
और फिर मैं स्वयं भी हंस दिया 
अपनी फटी कॉलर पर .
और मैंने अब सोचना शुरू कर दिया 
फिर से पैसों के बारे में . 
अपने लौटने में एक करीब की टेबल पर पड़ा 
बटुआ उठा लिया मैंने और दरवाजे से 
बाहर आकर भी अब मैं लगातार सोच रहा था 
पैसे के बारे में 
अपने बारे में सोचना मैंने बंद कर दिया है 
वैसे भी मैं खोयी हुई चीजों के बारे में 
कम ही सोचता हूँ .

19 अगस्त 2011

वह नहीं बोलती

वह नहीं बोलती 
खिड़की के पास बैठे 
आते जाते लोगों को देखती 
टकटकी लगाये 
देर तक 
बहुत देर तक
बिना हिले डूले
लगातार 
घंटो घंटो तक
बस देखती
नहीं बोलती .
मैंने देखा है उसे 
सामने वाले मकान की 
खिड़की के पास बैठे
वह गली से तीसरा मकान
खिड़की
तीसरी खिड़की
पहली मंजिल की
दूसरी खिड़की के सामने खम्भा है
बिजली का 
जिसके तार पर बैठा कबूतर 
इधर उधर तार पर खिसकता 
दायें बाएं .
मेरी निगाह कभी कभी
उस ओर भी चली जाती 
गली से गुजरते हैं सारा सारा दिन 
बहुत से लोग 
सुबह सुबह
दूध वाला साईकल पर
अखबार वाला
धीरे धीरे
डालता , फेंकता , सरकाता अखबार
घर घर
कभी कभी हाथों में धर देता 
गरम गरम खबरें 
सब्जी वाला ठेला 
आवाज़ लगाता - ' सब्जी - सब्जी ले लो '
सुबह सुबह एक लम्बे बांस में बंधी झाड़ू लिए 
बुहारती सड़क 
जमा करती बुहारा हुआ कूड़ा 
खम्बे के पास
नहीं कोई ख़ास 
मर्तबान 
बस यूँ ही 
एक स्थान जमा करने का
खम्बा 
जो सामने वाले घर की
दूसरी खिड़की के  सामने  था 
जहाँ उसका चबूतरा ख़त्म होता है
मैं यह सब देखता हूँ 
सोचता हूँ
पर नहीं मालूम 
वह क्या सोचती है
वह सिर्फ देखती है
खिड़की के पास बैठे
आते जाते लोगों को देखती
टकटकी लगाये
देर तक
बहुत देर तक
शब्द कभी कभी
चुप रहें तो बहुत बोलते हैं
कुछ लोग बिना बोले
कितना कुछ कह जाते हैं
हमें सारी जिन्दगी याद आते हैं
कविता बिना शब्दों के कैसी होगी ?
सामने वाले मकान की
तीसरी खिड़की
पहली मंजिल की
ओर ताकता हूँ
तीस साल बाद लौटा हूँ
अब वहां कोई नहीं बैठा है
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