घड़ी के कमान सी
चल रही है जिन्दगी
वक्त कट रहा है
वक्त में सी रहा है
खुद को आदमी .
आँखों के आंसुओं से
उभरी दो लकीरें
और जिन्दगी का रुख
नहीं बदला ;
टूट टूट कर बालों ने
समय के पहले
बूढा किया और गर्द
चेहरों पर सिमटी
और इन सिमटी लकीरों में
यादों सा पी रहा है
अपना लहू आदमी .
समस्याओं के घेरे में घूमता पंखे सा
और हो उठा है ठण्ड की चाहत में गर्म
आदमी ; अंतरिक्ष में घूमता
कैद हो गया कमरे में .