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12 दिसंबर 2011

कुम्भकर्ण आप अब भी कहेंगे एक काल्पनिक पात्र है!!

"मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह,  ज़िंदगी ने जब छुआ तब फासला रख कर छुआ" - दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ पिछले शुक्रवार को फिर याद हो आयीं . कलकत्ता के एक अस्पताल में रात आग लग गयी . और फिर उसके बाद जो हुआ वह आप सब की स्मृति में ज्यादा पुराना नहीं है . और दुखद स्मृतियाँ फिर से याद दिलाने की ज़रुरत नहीं है . बशीर बद्र की पंक्तियाँ हैं - " मेरे दिल की राख कुरेद मत , उसे मुस्कुरा के हवा न दे". और बात ऐसी दुर्घटनाओं के कारणों की तह में जाने का इरादा भी नहीं है . इसे लिखने का कारण भी यह नहीं है . चलिए आपको अपने और आपके और पुराने भूतकाल में ले चलता हूँ . स्मृतियों की तह खोलते है .

बात १९७९ की है अगस्त ११ , तारीख याद नहीं थी (यहाँ से ली है मोरबी का बाँध टूटा . ) पर समय का अंदाज़ा था . कक्षा ११ वी के छात्र थे . हमारे कुछ अध्यापक हमें मोरबी और स्वामी दयानन्द सरस्वती के जन्मस्थान की यात्रा पर ले के गये थे . मोरबी इसलिए याद था - की वहाँ नदी के ऊपर रस्सियों का पुल बना था और जिसपर पैदल पार हुआ जाता था . लक्ष्मण झूला जैसा ? - हाँ वही हमारे गुरुज़नों ने बताया था . उस पुल पर खड़े होकर जब नीचे नदी कि ओर झाँका तो डर  लगा , यहाँ से गिर गये तो? नदी का पानी कम से कम १०० फीट नीचे था . और सुना जब बाँध टूटा तो पानी उसके ऊपर से बहा और उसे बहा कर ले गया . यह इसलिए लिख रहा हूँ जिससे आपको उस दूर्घटना की भयावहता का अंदाज़ा हो जाए . ऊपर दिए लिंक में १२००० लोगों के मरने की खबर है . पर कितने लोगों को याद है ? आप का दोष नहीं है . मुझे भी क्यों याद रहता , अगर ऊपर लिखी स्मृतियाँ नहीं जुडी होतीं . उस दुर्घटना के वक्त श्रीमती गाँधी प्रधान मंत्री नहीं रही थीं . एक दिन अपने दोस्त परवीन सरीन की ढेबर रोड ,राजकोट स्थित दूकान पर था . सामने ही घंटाघर जैसा कुछ था , जहाँ दुर्घटना से पीड़ीतों को ठहराया गया था , और परंपरागत तरीके से वह उन्हें देखने और उनसे मिलने आयीं थीं . तब पहली बार उन्हें बहुत करीब से पास खड़े होकर देखा था . बहुत करीब से . तब भी सत्ता पक्ष के लोग देखने आये थे याद नहीं . जिनके पास उस वक्त का अखबार हो देख लें . और नहीं तो सत्तापक्ष ऐसी परिस्थितियों में कैसे व्यवहार कर सकता है , करता आया है , अंदाज़ा लगा लें . पर स्मृती इस बात की नहीं है . ऊपर की तारीख पर गौर करें . पुनः . इसके कुछ दिन बाद ही पन्द्रह अगस्त था . हम केंद्रीय विद्यालय में पढते थे . पन्द्रह अगस्त तो मनाना  ही होता था . ऐसी दुर्घटना के बावजूद . जिन्हें मालूम न हो बता देना उचित होगा की केंद्रीय विद्यालय केंद्रीय सरकार द्वारा केंद्रीय कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए खोले गये हैं . ताकि स्थानांतरण के कारण वे बच्चों के स्कूल में भर्ती की किल्लत से बच सकें . और नए -नए पाठ्यक्रमों की जादूगरी के मायाजाल से भी . कार्यक्रमों में जैसा होता है - झंडारोहण, बच्चों द्वारा कुछ कार्यक्रम पेश किये जाते हैं . और उसके बाद प्रधानाध्यापक का भाषण . हमारे प्रधानाध्यापक श्री आनंद कुमार वर्मा साहब थे . सरकारी मुलाजिम थे , जाहिर है . पर बच्चों के लिए तो अध्यापक . अध्यापक जो बोलते हैं , और जो करते हैं , वह बच्चों के मनःपटल पर बहुत गहरी स्मृति छोड़ जाती है . अब जब उन्होंने भाषण दिया तो याद कर अब भी रोमांच हो जाता है . कारण है . पन्द्रह अगस्त को परंपरा है , दिल्ली के लाल किले पर झंडा फहराया जाता है . प्रधानमंत्री का भाषण होता है . भाषण कुछ भी हो . प्रधानमंत्री कोई भी हो . पर हमारे वर्मा सर ने जो कहा , वह अविस्मरणीय है ." इतने लोगों की मृत्यु हो गयी , और प्रधानमंत्री के भाषण में एक उल्लेख तक नहीं , धिक्कार है . " आज का ज़माना होता तो उस सरकारी मुलाजिम की नौकरी चली जाती .अदना सा मास्टर प्रधानमंत्री को धिक्कारे ? खैर छोडिये , नाहक आज का ज़िक्र है - आज कौन ऐसा साहस करेगा . सच बोलना आसान है , अगर सच बोलने का हौसला हो . उन्होंने अपने उस एक भाषण से अपने अनेक छात्रों में वो हौसला पैदा किया था , इसमें मुझे  कोई संदेह नहीं . पर शब्दों से ज्यादा , उस शांत मुंह पर इतना गुस्सा और वह उनका तमतमाया हुआ चेहरा , नहीं भूलता .आप सबको तो मोरबी याद भी नहीं . नहीं है न ?

अब आपको १९८४ के दिसंबर की तारीख ३ की रात की भी याद दिला दूँ . शहर भोपाल  . स्थानांतरण होकर भोपाल आ गया था . स्नातक की परीक्षा पास कर ली थी . और भीषण गैस दुर्घटना घट गयी . हर साल उसकी बरसी मनाई जाती है . स्मृती को मरने नहीं दिया जा रहा . अब यह भी पंद्रह अगस्त जैसा हो गया है . मेरे ही ब्लॉग पर इस बारे में पहले भी लिख चुका हूँ . फिर आपको मरने वालों की संख्या नहीं गिनवाने जा रहा . मरने वाले हज़ारों में थे . फिर . और ये रात के अँधेरे में आयी दबे पाँव मौत की , कोई पदचाप नहीं . चीते की तरह शातिर . और शायद टाली जा सकने वाली . मानव निर्मित .

इसके अलावा और भी दुर्घटनाएं हैं - प्राकृतिक जैसे पूरी और भुवनेश्वर घूम के आये और वहां भयंकर तूफ़ान आया , बहुत लोग मरे . टैक्सी वाले से झगड़ा हुआ था , सोचा ऐसे ही लोगों को सजा मिलती है . पर बाकी क्यों ? मद्रास  घूम कर आया , और दो महीने बाद देखता हूँ जिस मरीना बीच के पास वाली सड़क से बहुत दूर चलने के बाद भी समुद्र नहीं देख पाया , माताजी साथ थी और रेत  में चलने में असुविधा हो रही थी और अँधेरा भी था वापस आ गए थे . उस सड़क पर कारें पानी में कागज़ की नाव की तरह हिचकोले खा रही थीं .  फिर बंगाल का 'आईला ' तूफ़ान आया . पर प्राकृतिक विपदाएं तो हमारे हाथों के बाहर की बात है . इनका सिर्फ उल्लेख . की चीता हमारी तलाश में घूम रहा है , जाने कब कहाँ दबोच ले .

पर और दुर्घटनाएं ? जब इनके बारे में सोचता हूँ . तब . लगता है हमारे यहाँ आदमी की जान की कोई कीमत ही नहीं . हम किस मुल्क में पैदा हुए हैं ? जिन चीज़ों को तवज्जो दिया जाना चाहिए उन्हें हम भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं . जहाँ ज़रा भी समझौता नहीं करना चाहिए हम सबसे पहले उन्ही चीज़ों पे समझौता  करते हैं . जिन बातों को सबसे ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए , वह हमारी प्राथमिकताओं में सबसे नीचे के पायदान पर खड़ी मिलती है . जिस सरकार को स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए वह सरकारी और निजी हवाई कंपनियों के स्वास्थ्य को लेकर दुबली है . हमारे महानगरों में बड़े बड़े विशालकाय मीनार और इमारते बन रही हैं . हर एक इंच ज़मीन पर कब्ज़ा हो रहा है . कोई दूकान बना रहा है . कोई मॉल, कोई तरणताल , कोई क्लब , कोई तेज़ गाड़ियों की दौड़ का ट्रैक . व्यवसाईंकरण  की दौड़ में सुरक्षा के लिए छोड़ने वाली जगहें भी व्यापारीकरण की बली चढ़ गयीं हैं . दिल्ली का उपहार सिनेमाघर हो या कोलकाता का आमरी अस्पताल . यह सब इसी कहानी के किरदार हैं . यहाँ जगह भी आदमी की जान पर भारी पड़ रही है . हम सब अपनी छोटी छोटी जरूरतों में इतने मसरूफ हैं की बड़ी से बड़ी दुर्घटना भी हमें नहीं झंझोड़ पाती . कुम्भकर्ण आप अब भी कहेंगे एक काल्पनिक पात्र है . नहीं वो हमारे अन्दर छुपा है . ज़िंदगी जब हमें फासले से ही छू रही है , तब क्या बुरा है मौत हमें चीते की तरह धर दबोचे .

30 सितंबर 2011

यथावत

घड़ी के कमान सी 
चल रही है जिन्दगी 
वक्त कट रहा है 
वक्त में सी रहा है 
खुद को आदमी .
आँखों के आंसुओं से 
उभरी दो लकीरें 
और जिन्दगी का रुख 
नहीं बदला ;
टूट टूट कर बालों ने 
समय के पहले 
बूढा किया और गर्द 
चेहरों पर सिमटी 
और इन सिमटी लकीरों में 
यादों सा पी रहा है 
अपना लहू आदमी .
समस्याओं के घेरे में घूमता पंखे सा 
और हो उठा है ठण्ड की चाहत में गर्म 
आदमी ; अंतरिक्ष में घूमता 
कैद हो गया कमरे में .

सत्य

सत्य का रूप हर दौर में बदला है 
सत्य क्या दुनिया में एक रहा है ?
सत्य है एक सुलगते चूल्हे जैसा  
हर कोई अपनी रोटी सेंक रहा है .
एक झूठ जिसे गर्द ही गर्द मिली 
सत्य के मामले मीनमेख रहा है .
सत्य जैसे एक अछूत गुडिया हो
गाल खींच हर कोई फेंक रहा है .
सत्यवादियों ने ही सत्य को छला
सत्य खुद को शर्म से देख रहा है .
सत्य की जात गिरगिट पी आई है 
सत्य तबसे राजसत्ता की सेज रहा है .  

चंद ख़यालात

किसी को उस मोड़ से दहशत नहीं होती 
जहाँ अब हाथों से ईबादत नहीं होती  .
हर मुलाकात इक  रस्म से ज्यादह नहीं 
कोई जुम्बिश कोई हरकत नहीं होती .
पहले हर चीज को मचलता था दिल 
अब किसी बात को तबियत नहीं होती .
हर चोट पर दर्द होता था जिसे , उसे 
अब जख्मों से भी दिक्कत नहीं होती .
ये दिल जो यहाँ वहां रहने से डरता है   
वर्ना रहने को क्या ईमारत नहीं होती  .
रोज़ का मजमून इक दिन का माजरा नहीं  
इसे रिश्ता कहते हैं ये सोहबत नहीं होती .  

20 जुलाई 2011

Terror attacks and our public spaces

We blame the intelligence, the politicians, the police, the bureaucrats - all and sundry. Life in the city moves at such a fast pace that we have no option but to go on with our lives, almost as though the death-fest never took place. Some call it the spirit of the city; for most, it is a necessity. The media covers it 24x7,feeds on every minute detail and, at times, even goes on to exaggerate. The same news is broadcast-ed simultaneously on almost every channel 24/7 and yet they label it "exclusive". 

But that is not what my thoughts are at this moment. I too have been bombarded with all the above, and my brain was numb from the assault. Have a pause and a take a look at our cities and our surrounding everyday life. What do we see? We see shops which are not treated more than a box, the goods jut out every morning strewn and stretched, and footpath space becomes extension of shops. What little is left is occupied by hawkers. The taxis are parked everywhere, so are cars, trucks , Hand-carts, bikes, Pull-carts, Autos, buses. Families live, ambulate on any available space. As if everyone is on lookout for a niche and grabs it as soon as it appears. Cows, Dogs, Bulls, Goats, at times monkeys, and roosters also vie for space. Our markets, stations, parks, buses, trains, and even some airports are too crowded for comfort. Are we too populated, over populated? Why we always under-plan. Our shops are inadequate. We do not like to buy another shop and expand. Our natural tendency is to expand the goods and cover surrounding areas. We do not have adequate buses or trains forcing people to travel like cattle. Everywhere utter chaos rules. Nothing seems to be out of place. No person, no vehicle, no goods. 

For the terrorist, a perfect place, to quietly leave a bag or an umbrella or a pressure cooker or a radio or a Tiffin-carrier and still not be noticed by anyone in the crowd. Nothing ever seems out of place. Nothing looks odd. Not even a bomb. 

We take our civil liberties too seriously. We treat the public spaces as an extension of our living spaces. We stretch ourselves everywhere. As long as our public spaces look inviting to jingle and mingle, we should be prepared to such acts being perpetuated upon us. Not that an organised civic space will be any less prone to such attacks. But to some extent it will make the perpetrators task a little difficult, if not impossible. Let’s get a little organised and show some respect for civic discipline and respect for rules. We should not lower our guards ever. Always remember - We have to be successful in saving our lives all the time and the terrorist has to succeed just once. 
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