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28 जुलाई 2013

चौबीस घन्टे

कितने दिनों बाद 
बिना किसी डायरी के 
बिना शायरी के 
बिताया ज़िंदगी का एक दिन !
खोला नहीं घर का मुख्य द्वार 
नहीं लिया आज का अखबार 
ना ही सुबह से चलाया टी वी 
सिर्फ एक अदद फ़ोन, वह भी 
घर से बीवी 
नहीं , यह भी सिर्फ मेरा ख्याल था 
स्वयं से जूझता अदद सवाल था 
बिना किसी दैनंदिनी के 
बिना किसी कामकाज़ के 
बिना मूल या ब्याज़ के 
कैसे खर्च डाला एक दिन !
सुबह हुई , शाम हुई 
बहुत से जन्म हुए 
बहुत सी जिंदगियां तमाम हुई 
अरबों-खरबों का कारोबार हुआ 
बहुत से बिछड़े 
बहुतों को प्यार हुआ 
तुमने ना ही घड़ी देखी 
ना ही कलेंडर पर की निगाह 
न कुछ लिया न दिया 
अपनी या किसी और प्रजाति से ना किया 
साक्षात्कार 
बिना किसी संसर्ग के 
बिना किसी मर्म के 
कोई कैसे 
किसी दिन को 
इतने सस्ते में ले सकता है ?
चौबीस घन्टे 
चौबीसों घन्टे 
मशीनरत ज़िंदगी 
कलपुर्जे सी 
यन्त्रवत आवर्तनी में 
चकरघिन्नी सी घूमती है 
किसी अनाकोंडा के पाश से 
किसी तरह 
सिर्फ एक दिन बचा पाया !

18 अक्टूबर 2012

उत्सव

लो फिर आ गया मौसम 
त्यौहारों का 
व्यवहारों का
लौटा फिर वृक्षों पर 
नये पात और नये फल लिये 
खेतों में एक नयी फसल लिये 
मौसम हल्की हल्की सर्दी 
गुनगुनी गुलाबी धूप का 
उपवन उपवन मौसम आया 
कौन चितेरा आँक रहा 
बादलों की तूलिका से 
यौवन के सपनों , मस्ती , अंगड़ाई ,
अलसाई , काम-रूप का !!
उत्सव है , तो जीवन है ,
आशा है , श्रृंगार है ,
कामना है ,
शरीर है , व्यसना है ,
उत्सव का अभिमान 
नवयौवना है .

9 मई 2012

सोमवार सुबह सवेरे

वर्षों से 
सुबह सवेरे 
मुँह अँधेरे 
ग्रीष्म, वर्षा, शीत 
सारे मौसम धरे 
साप्ताहिक दिनचर्या का 
अभिर्भूत अंग  
प्रेरक प्रसंग  
घड़ी बजाती गज़र
स्वर लहरी सा फैलता 
आरोह संगीत 
अलसाए गुस्से से 
कुढ़ता बदमिजाज़ 
गला घोट टीपता 
बंद हो जाता साज़ 
अकाल-मृत्यु प्राप्त  
बीच में दम तोड़ देता 
अवरोह गीत 
रात्रि का चौथा प्रहर 
नींद से उठा
बिस्तर से लगभग पटक 
हाथ पैर झटक 
कपड़े ताबडतोड़ पहन 
अपने ही घर से निकलता 
मानों एक शातिर चोर 
सोयी हुई बच्चियों की नींद से 
बचता बचाता 
लुका छिप 
चुपचाप दबे पाँव 
खोलता 
दरवाज़ा 
कूदता फाँदता
दौड़ता कुलांचता
सोये हुए कुत्तों से 
पाँवों की पदचाप 
बचता बचाता 
रास्ते में काली माई 
के सामने 
सिर को नवाता 
आ होता खड़ा 
बस के इन्तेज़ार में 
सुबह तो हो ही जाएगी 
बस, बस कब आएगी?
आकाश में तारा वृन्द 
और द्वितीया का चाँद 
बादलों की ओट से 
ताकता झाँकता
रात्रि के नीरव में 
अलसियाता
खाली पड़ा है अब तक 
बस-डिपो का अहाता 
तभी बिना नहाई-धोई 
अलसाई 
लड़ियाते पैरों से 
चली आई 
कल की थकी हारी 
बस 
लाद ले चली 
रात्रि की कालिमा 
अधखुली भंगिमा 
आधे-जागे 
आधे सोये-अभागे 
दिन दैन्य आदमी 
लादे लादी सी 
महानगर में अज़गर सी 
फैली हुई सड़क पर 
सरपट भागती 
पर क्या वो जानती ?
कैद है उसी की 
सख्त जकड़न 
और साँस रौन्धती गिरफ़्त 
में उसकी जिंदगी अभिशप्त 
फटते धुंधलके 
से इसी बीच 
अंगड़ाई लेता 
सूरज निकल आया 
इधर उधर ताकता
पौ फटाता
बगलें झाँकता 
हावड़ा-ब्रिज 
लालिमा में नहाया 
और सामने 
हमनाम स्टेशन 
रोज़ जैसा घबराया 
वैसा ही अस्त-व्यस्त 
चौबीसों घण्टे 
लस्त-पस्त
दम मारने की फुर्सत जो मिल पाती 
सुस्ता लेता 
कोई हड़ताल 
कोई बंध
ही पुकारता 
मानों तकता बस इसी आस से 
राइटर्स की तरफ़
रात-दिन
पढ़ता ख़बरों का हर्फ़-हर्फ़ 
कहीं तो नज़र जाए
हैं आज भी बस लाल सुर्खियाँ
ख़बरों का डाकिया 
आज भी नैराश्य लाया 
मौसम क्या ख़ाक बदला 
जिस्म अब भी पसीना-पसीना 
प्लेटफार्म की तरफ़ 
दौड़ते 
सिपाहियों की कदम-ताल 
तेज-दर-तेज 
रोज़मर्रा यात्रियों की रेलम-पेल 
भागम-भाग 
तू भी भाग 
कविता के चक्कर में 
ट्रेन न छूट जाए 
सुबह की सारी दौड़ अधूरी होगी 
कविता तो फिर भी
कभी और पूरी होगी !
एक, आज का अखबार देना !
कुछ बाँच लिया जाए !!

3 मई 2012

महाभारत

"परिस्थितियों में 
जो उचित हो वही करो "
"यही तुम्हारा धर्म है "
पाञ्चजन्य के साथ 
क्यों किया शंखनाद 
उदघोष 
क्या थी मंशा ? 
शंका - कुशंका के 
उचित-अनुचित के 
किस तराजू पर 
लटका कर चले गये 
कांटे की तरह 
धरती और आकाश के इन पलड़ों में 
मैं कब से लटका हूँ त्रिशंकु जैसा  
अपने ही पासंग विवेक पर 
और लड़ता हूँ 
अपनी ही इच्छाओं और नैतिकताओं के बटखरे से 
डरता हूँ न जाने कब कौन 
डाँड़ी मार ले 
कौन बन मामा 
अवतरित हो 
शकुनी जैसा  
अपने ही दो नेत्रों के बीच 
कौरवों और पांडवों सा 
आ खड़ा हो 
भांजी मारने को 
अकस्मात 
किसी एक आँख की पुतली दबाकर 
चौसर की बिसात पर 
फेंके हुए पासों में 
अटका है मन , जीवन 
लालसाओं के चौंसठ खानों में 
लगा सर्वस्व दाँव पर 
घसिटता अपने को 
युधिष्ठिर के श्वान जैसा 
भूत और भविष्य 
के ध्यान जैसा 
कोई तूणीर , कोई गाण्डीव 
नहीं , जो फिसल रहा है 
फिसलन पर है जीवन
द्वापर और कलियुग के जिस संधिकाल में 
मुझे छोड़ गए हे पार्थ ! 
अपने ही अंदर छुपे  हुए 
शिखण्डी के साथ 
जो स्त्री है न पुरुष
अभिशापित है 
न कुलटा है , न सती
सर्वत्र व्यापित है
न विलक्षण रथी , न सारथी 
है आरूढ़ , किमकर्तव्यविमूढ़ , आमूढ़
फिर भी कुरुक्षेत्र में उतरा है 
न हारा है न जयी है 
मध्यमवर्गीय है !!

2 मई 2012

तब न कविता अधूरी होगी

शब्द सिक्कों की तरह 
दिमाग में खन-खन बजें 
आप जेब में हाथ डाल कर
मन-मन गिनें 
कुल कितने है ?
कहाँ-कहाँ से बीने हैं ?
इनसे क्या आएगा ?
क्या घर चल पायेगा ?
उधेड़ बुनता हूँ 
असमंजस रहता हूँ 
जेब में मुट्ठी बाँध रक्खी है 
कोई शब्द कहीं छूटा तो नहीं ?
कोई फूटा रस्ता तो नहीं ?
हिसाब में कुछ कम होते हैं 
अर्थ उधार पर भी मिलते हैं 
बनिया अगर नहीं  माना तो ?
खाली हाथ फिर लौटा तो ?
और शब्द कमाने होंगे 
जेब काफी भरनी होगी 
शब्दों के बाज़ार में अब 
जिन्सों की कीमत बढ़ी हुई है 
आसमान को छूती हैं अब 
जीना फिर भी लाचारी है 
कम मुकम्मल तैय्यारी है 
कुछ काम नया लेना होगा 
थोड़ा और समय लगेगा 
थोड़ा शब्द कमाना होगा 
कुछ और बचाना होगा 
जब पूरी जेब भरी होगी 
तब न कविता अधूरी होगी 
बाज़ार तभी पहचानेगा 
मुखपृष्ठों पे आने देगा 

22 मार्च 2012

काश

एकांत में बैठ 
मैं तुम्हारे वक्ष से गुज़रती धडकनें देखूँ 
तुम मेरी आती-जाती सांसें गिनो
सुनो और बताओ 
इस जुगलबंदी से 
कोई नया राग उपजा है क्या ?
एक पुरानी किताब में 
एक खत मिला है 
लिखा है -
"तुम मुझे प्राणों से प्रिय हो 
तुम्हारा प्रेम मेरे रोम-रोम में बसा है 
तुम्हे याद न किया हो , 
ऐसा शायद ही कोई पल गुजरा है 
क्या तुम्हे पता है ?"
किसकी कहानी है यह ?
क्या वो अब भी जिंदा है ?
क्या ये प्यार जिंदा है ?
किसको पता है ?
नदी के जिस किनारे हम बैठे हैं 
घास पे लेट के जिस आसमान को तक रहे हैं 
अपने में घुल-मिल मगन 
चौपाटी की भीड़ में आइसक्रीम की तरह 
एक-दूसरे में पिघल रहे हैं 
ऐसा पहले कभी हुआ है क्या ?
यह सब एकदम नया है क्या ?
मैंने तुम्हारे लिए एक कविता लिखी थी 
मैंने तुम्हारे ऊपर एक गाना बनाया था 
मैंने तुम्हे लेकर एक सपना देखा था 
तुम्हे साथ लेकर मैं कहाँ -कहाँ गया था 
कितने दिन आवारा किये थे , कितनी रातें जगा था
तुम मौसम में रातरानी सा खिली थी 
मैं पलाश सा जला था 
मैंने तुम्हारे बिना ,तुम्हे लेकर 
एक पूरी ज़िंदगी का सफर किया था 
चाँद का सफ़र बादलों में तन्हा था 
तुम हँसती थी , मैं हँसता था
तुम्हे मालूम था लोग कहते थे 
मैं तुम्हे लेकर पगला गया था
याद करता हूँ - 
उसका भी एक मज़ा था 
जैसे तेज बारिश में कोई भीगता है
तुमने भीगते हुए मुँह पोछा है क्या ?
ऐसे में कोई रोता है क्या ?
ऐसा सबके साथ होता है क्या ? 
ये बचपना है , ये सच है क्या ? 
ऐसा कभी हुआ तो नहीं ,
ऐसा मैंने सोचा तो नहीं ,
यह सब कल्पना ही तो है ,
ज़िंदगी सपना ही तो है ,
काश, मेरी काश वाली दुनिया सच होती *
मैं होता , तुम होती , काश !!
(यह पंक्ति मित्र गुरनाम  से साभार )

23 फ़रवरी 2012

इतिहास ( सप्तम किश्त : क्रमशः )

व्यापार , फिर व्यापार है 
लक्ष्मी है चंचला 
कब कहाँ ठहरी है 
ये क्या ज्ञान की गठरी है 
कुबेर का खज़ाना 
कौन सदा महेंद्र है 
बदलता केन्द्र है
वक्त का पहिया दौड़ता , चलता 
बदलती है धुरी 
हारे हुए हाथी, हाथीदांत सामग्री बने 
सूत के वस्त्र , ऊनी कालीन 
इत्र , विचित्र 
काली मिर्च 
लौंग , इलायची 
मसाले , मसाले
आदि इत्यादि 
नावें बनी 
तोपची रहे तोपची 
बंदूकें बन गईं जब 
तब 
प्यादे बादशाहों पर पड़े भारी 
समुद्र के रास्ते 
बढ़ गई 
राजशाही इज़ारेदारी
झुक पहाड़ गए
अगस्त्य विन्ध्य लांघ गए
स्वतंत्र सब देश बने 
साम्राज्य उपनिवेश बने 
नवजागरण काल 
प्रतिष्ठित हुआ 
बढ़ गई पशुता 
दास व्यापार हुआ 
लज्जित मनुष्यता 
आदमी पर आदमी की प्रभुता 
उस साम्राज्य में सूर्य नहीं डूबता 
फैला इतने योजन 
चवन्नी में नहीं बिकता 
उस 
इतिहास का पर्चा
सबसे सस्ता मनोरंजन 
इतिहास चर्चा .

22 फ़रवरी 2012

इतिहास ( षष्ठ किश्त : क्रमशः )

सिर्फ नहीं बर्फीली हवाओं
और हमारे बीच मानों
हिमालय जैसे
काल के मध्य खड़ा 

वैसे ही
विन्ध्य -सतपुड़ा
दुर्गम , दुष्कर , दुरूह
प्रस्तर चोटियाँ
एक एक खण्डकाव्य
वाल्मिकी रामायण
भाषा का एक अरण्य
ऋषि अगस्त्य
वनाच्छादित
संस्कृति वांग्मय
लाँघ न पाया कोई
शत्रु, दस्यु , लुटेरा
शब्द , ध्वनि , ॐकार
वयं रक्षामः
और बच गए
सोमनाथ
जाने कितने सोमनाथ
वयं यक्षामः
एक, पद्मनाभ .

इतिहास ( पंचम किश्त : क्रमशः )

इतिहास फिर क्या है 
एक निरंतर यात्रा 
कुछ पड़ाव 
फिर आये 
बाली,जावा,सुमात्रा 
दूर-सुदूर से भरा 
स्वर्ण अर्जित कोषागार 
धन-धान्य व्यापार
तक्षशिला, नालंदा 
और करने संचय 
ज्ञान-कोष अक्षय 
ज्ञानपिपासु व्हेनसांग , फाह्यान 
मेगास्थनीज, अलबरूनी 
यूनान-मिस्त्र-रोमा  
चीनो-अरब-सारा 
इतिहास की गोचर पृष्ठभूमि 
ले फिरे किम्वदंतियां
सम्पन्नता-विवृत्तियाँ  
व्यापारी , यात्री , छात्र 
यात्रा-वृतांत 
आये , हुआ समागम
बुद्ध , गौतम , शरणागत 
धम्मं शरणं गच्छामि 
संघम शरणं गच्छामि 
बुद्धम शरणं गच्छामि 
हुआ प्रसार , प्रचार 
महावीर आगमन 
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं 
णमो आइरियाणं 
जय जिनेन्द्र 
जय महावीर 
थी यह शून्य की आय ?
या थी यही भूमि धाय ?
सब प्रश्न पूछते हैं प्राय: !
सत्ता और शक्ति 
बदलने लगे समीकरण 
फिर छिड़ा संग्राम 
युद्ध था संहारक 
भग्नावशेष स्मारक 
लूट ली सम्पत्तियाँ
मिटा दीं सब रीतियाँ 
शोकाकुल सब समाज
कुलीन और साधारण जमात 
नैराश्य का उद्दीपन 
आस्था का उद्वेलन 
विश्वास डगमग डगमग 
इतिहास का प्रतिफलन 
कौंधा अँधेरे में चमक 
अंधकार को प्रकाश सूझा 
ज्ञान की प्रकाश्य पूजा 
मार्ग था भक्ति
भक्ति और भक्ति 
आसक्ति , विश्वास, श्रद्धा , शक्ति 
जन-संबल लौटा  
उधर बिछा 
चौसर का हाथ 
चलो चलें नए दाँव 
फिर चलो हस्तिनापुर 
रचें नई महाभारत 
इतिहास ले रहा करवट
हाथी , ऊंट , वजीर, बादशाह 
फिर बिछी बिसात 
शतरंज के प्यादे 
ढाई घर उलांघे
घोड़े आये , दौड़े आये
सरपट भागे 
पोरस के साथी 
डुबो गये हाथी 
सिकंदर को मिला आम्भी 
आया , एक अजनबी 
फारस का गज़नवी
फिर जिसके 
हाथ से 
छुटा समरकंद 
और छुटा वादी-ए-फरगना 
वहाँ से चला मंगोल 
फारस में ढला मुग़ल 
बना मुग़ल सरगना 
लाया साथ 
गोला , बारूद , आग्नेयास्त्र, तोपखाना 
पड़ गया पुराना 
धनुष की प्रत्यंचा, गदा, बर्छी, भाला, तलवार 
शक्ति का ह्रास 
बदलने लगा इतिहास 
बदला भूगोल 
हिंदुकुश निर्वासना 
दोआब में बस गया 
यहीं रच गया 
कहते रहे ज्ञानी 
बूझल बानी 
कोऊ नृप होए हमैं का हानी.
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