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14 सितंबर 2012

सरकारी हिन्दी की दूकान

दुकानें दो तरह की होती हैं . एक तो सरकारी राशन की दुकानों जैसी . वहाँ हर तरह का माल मिलता है जैसा वहीं मिल सकता है . राशन का चावल राशन जैसा , राशन की चीनी राशन जैसी , राशन का कपडा भी राशन जैसा . "राशन " खुद एक ब्राण्ड हो जाता है . आप वो चावल ले भी आयें , तो पका नहीं पाएंगे , पका लिया तो खा नहीं पाएंगे . आपको वो पका हुआ चावल उसी दुकान पर लौटा देना होगा . और दुकानदार से सुनना भी होगा - हम तो पहले ही कह रहे थे , आप रहने दें , आप नहीं खा पाएंगे , नहीं सुना . अब देखिए पका पकाया वापस लाना पड़ा न . अगर आप खा भी लेते तो मेरा दावा है पचा नहीं पाते . राशन का चावल है . अलग किस्म का पेट चाहिये इसके लिए .ये चावल अलग किस्म की आबो-हवा में पनपते हैं . इन्हें अलग किस्म की मिट्टी में उगाया जाता है . इसे राशन के लिए खरीदा और बेचा जाता है . इसे सिर्फ नेता , अफसर , ठेकेदार खा और पचा सकते हैं .

वैसे ही सरकारी हिन्दी की दुकान है . ये हिन्दी वहीं मिलती है . वही इसके उत्पादक हैं , विक्रेता हैं , और ग्राहक भी . आप इसे पढ़ नहीं सकते , पढ़ लें तो समझ नहीं सकते , समझ लें तो किसी और को समझा नहीं सकते . और अगर समझा लिए तो मेरा दावा है आप आदमी हो ही नहीं सकते .

आपके अंदर सरकारी बाबू , सरकारी अफसर , सरकारी खबरनवीस , सरकारी कवि, सरकारी साहित्यकार एक न एक अदद  छुपा है  .   
आप आइये आप को हम ही छाप सकते हैं , हम ही वितरित करेंगे , हम ही खरीदेंगे , हम ही पढेंगे , हम ही परिचर्चा करेंगे , समीक्षा लिखेंगे ,, और पुरस्कृत भी करेंगे . आप की महान रचना पाठ्यक्रम के योग्य समझी जायेगी . हम ही हिन्दी दिवस पर आपकी हर रचना को अलग-अलग पुरस्कारों , शाल - दुशाले , श्रीफल से नवाजेंगे . आप को अकादमी का अध्यक्ष बनायेंगे .  आपसे भाषण करवाएंगे , आपसे लिखवायेंगे , आपको सुनेंगे , आपसे ताली बजवायेंगे . 

पर हिन्दी का क्या होगा ? क्या होना है ? जो राशन का चावल नहीं पचा सकते भूखे तो नहीं मर रहे . बाजार से खरीद कर खा रहे हैं न ? अगर पैसे होंगे तो खरीदेगा , खायेगा , जिंदा रहेगा . नहीं ? नहीं तो क्या होगा मर जाएगा . आप भी कहाँ कहाँ की चिंता करते हैं . मॉल खुलने से मोहल्ले का दुकानदार मर तो नहीं गया ? बिक्री कम हुई होगी . वो फिर भी पेट भरने को कमा तो ले ही रहा है . अब देखिए जब मॉल नहीं थे तो  तो आपको डांङी मार कर माल कौन देता था ? नकली माल कौन देता था ? ज्यादा छपे भाव पर कौन देता था ? पुराना माल कौन देता था ? गन्दा , सड़ा माल कौन चिपका देता था ? तो अब आप उसकी चिंता में क्यूँ दुबरा रहे हैं ?

कानों में

अपने शब्द अपने कानों में 
आज शरीक़ हुए बेज़बानों में .
फिर  दोस्तों की याद आयी ,
बारिशों के मौसम, रमज़ानों में .
मुल्क में आमद अच्छी नहीं ,
पैसे ज़ेब में, न माल दुकानों में .
बारिशों में रुक जाओ , लुत्फ़ नहीं  
मिलना तुमसे हो जैसे बेगानों में .
तुम्हारी ज़बान बहुत मीठी है 
मिशरी सी घोलती है कानों में .
मौसम ने बदल लिया लिबास 
बहुत चर्चा है आज दीवानों में .
वो जिनके संस्कार अच्छे हैं ,
गिनते नहीं ऊँचे खानदानों में .
कोयल कूकती है न गाती है ,
हमरी बोली, हमरी ज़बानों में .

16 मई 2012

मुखौटा

आदमी के चेहरे पर 
लिखा होता है ?
कौन है ? 
क्या करता है ?
हर चेहरा मुखौटा 
लगता है 
हँसी , उदासी 
मासूमियत 
कुटिलता , लाचारी
इश्कबाज़ी 
के अनेक रंगों से सजा 
रोता-गाता 
चीखता-चिल्लाता 
डराता-धमकाता 
गरियाता-रिरियाता 
कभी 
भिखारी की दयनीय सूरत 
साधुता की पवित्र मूरत 
षड्यंत्र की कुटिल मुस्कराहट 
सुन्दरी की मंद-स्मित 
भावपूर्ण भंगिमा 
नेता की कृत्रिम गर्मजोशी 
या उत्तेजक सम्बन्धों की ठंडक लिए 
आपका अपना रिश्ता , पड़ोसी 
फिर , ऐनवक्त आपसे ज़्यादा व्यस्त 
आपका दांत-काटी रोटी वाला यार 
खाने में ज़्यादा नमक से 
और उग्र हो गया  
जन्म-जन्मांतर का प्यार 
शब्दों की चाशनी में लिपटा
झूट,
सत्य के रस से 
भी बहुत ज्यादा मीठा 
हो गया है 
मुझे तुम्हारा चेहरा 
अच्छा नहीं लगा 
मधुमेह का रोगी जो ठहरा 
क्या ?
कल मिष्ठान-भण्डार पर 
तर-माल खाते देखा था ?
आपको ज़रुर गलतफहमी हुई है 
मैं कहाँ  
मेरा मुखौटा था !
मुझसे मिलता-जुलता था !!

1 अप्रैल 2012

मैं जानता हूँ

आधा-अधूरा 
थोड़ा-ज्यादा 
सब कुछ पढ़ा  
अक्षरशः
जब भी 
अंतराल आया 
स्मृति का चिन्ह रख छोड़ा 
फिर वहीं से पकड़ा जोड़ा 
मेज़ पर पड़ी हुई किताब ने 
फिर अचानक क्यों पूछा - 
"मुझे पहचानते हो ?"
यही सवाल -
"क्यों बार-बार,
अलमारी में रक्खी किताबें भी पूछने लगी हैं ?"

पंक्ति दर पंक्ति 
पृष्ठ दर पृष्ठ 
उठाया-पलटा  
खंगाला-उलीचा 
कोई नहीं मिला 
फिर कौन बोला 
किसने मौन तोड़ा 
शब्द को अर्थ किसने दिया 
क्या कोई पात्र जीवंत हो गया ?
मैं सहसा कितना डर गया !!
कुछ था जो अन्दर भर गया 
सर से पाँव तक एक सिहरन 
दौड़ गई 
आँखें दरवाज़े तक गईं 
फिर खिड़की के परदे पर जा टिकीं 
और वहाँ से छत पे घुमते पंखे पर 
अगर यह चल रहा है ?
तो मेरे माथे पे पसीना क्यों आ रहा है ?
ज्वर है ?
ये किसकी परछाईं है ?
कौन मेरे सिराहने खड़ा है ?
खुद को चिकुटी काटी
यह कोई स्वप्न नहीं है 
मैं तो जगा हूँ 
अकेला हूँ , अभागा हूँ 
तभी तो किरदारों में पड़ा हूँ 
इन्ही से बातें की हैं 
इन्ही को समझा है 
पात्र-अपात्र 
सखा, भाई , सगे सब यही हैं 
यही रिश्ते-नाते हैं 
यही सखा हैं , प्रेमी हैं 
सुख-दुःख में साथ निभाते हैं 
रोते-हंसाते हैं 
रात-बिरात जागते हैं 
मेरे साथ ही मेज़ पर बैठ 
चाय-नाश्ता होता है 
सिगरेट का छल्ला उड़ता है 
मेरे ही बिस्तर पर 
बेतरतीब पड़ना 
मेरे साथ उठते-बैठते 
मेरी किताबों के किरदार 
कब किताबों से मेरे जेहन में 
घुस गए 
अब मुझसे ही पूछते हैं -
"मुझे पहचानते हो ?"
इस प्रश्न का मैं क्या उत्तर दूँ ?
मैं जानता हूँ ?

21 फ़रवरी 2012

इतिहास (तृतीय किश्त : क्रमशः )


रेगिस्तान 
रेत का वीरान 
कितने इतिहासों की स्मृति 
कितने कवलयतियों का श्मशान 
ज़िंदगी 
रण-बाँकुरा  
या कालबेलिया बंजारा 
सूरज के सिर पै सवार 
दौड़ता घुड़सवार
टापों की पुकार 
जिंदगी भागती 
रेत की आँधी
सी उड़ चली 
कट चली    
रेत के सब टीले 
बदलते रहे कबीले 
बंजारे , बंजारे 
किसको पुकारे 
आज यहाँ कल वहाँ 
चरैवेति , चरैवेति, चले 
हमको क्या धमकाते ?
क्या है जो हार जाते ?
रेत की आँधियाँ
सहस्त्रार शताब्दियाँ 
सूर्य के प्रहार 
रोज़ हम झेलते 
ज़िंदगी को ठेलते 
लड़ रहे युद्ध हैं 
रंगहीन समुद्र हैं 
किन्तु सब रंग जिया 
बांधे सिर पर लहरिया 
रंगों का इन्द्रधनुष !
जीवन एक युद्ध !
हरदम , मार्ग दुर्गम , अवरुद्ध 
था जिसका वरण
किया धारण 
हाथ - शस्त्र
लौह - वस्त्र 
नेत्र - निमेष 
शत्रु - निषेध 
दुर्ग - प्राचीर  
किले - अभेद्य 
धधकती ज्वालाओं में 
कवलित जौहर 
केसरिया पताकाओं में 
हल्दी रक्त गौहर 
अदम साहस 
अदम साहस 
आदिम अट्टहास
शिशु शैशव बचा 
जो भी बचा
एक ही इतिहास 
रक्त रंजित मञ्जूषा  
सबमें पारंगत 
भाला, बरछी , तलवार
इन्हीं खिलौनों रत  
पीढ़ी दर पीढ़ी 
लड़ाईयां लड़ी 
चलता रहा झगडा 
लड़ा, लड़ा, और लड़ा 
नहीं हुआ नत 
जीवन अस्त-व्यस्त
नहीं कोई नदी 
बहा रक्त-प्रपात 
सिंचित सारी धरा 
रक्त-प्रपात, रक्त प्रपात 
हमें कहाँ नींद , हमें कहाँ सोना
राणा प्रताप , राणा प्रताप
जीवन का तम्बू जहाँ उखड़ा
मृत्यु का वहाँ गड़ा 
जीवन अस्त-व्यस्त 
नहीं हुआ नत. 

इतिहास - ( द्वितीय किश्त: क्रमशः )

मैदान में बस गए
गंगा दोआब भए
पंजआब भए
यहाँ वहाँ सर्वत्र
भागीरथ के साठ सहस्त्र
पुरखों की हड्डियों से उर्वरा
भर गया सुनहरी
बालियों सा सोना खरा
खेती-किसानी की
तुम्हारे खलिहान भए
कोल्हू के बैल भए
गाय को माता किए
आता किए , जाता किए
खता किए, खाता किए
घाट नहाए , मंदिर के द्वार रहे
गुरु द्वारे मत्था टेका
फ़कीर की मज़ार गए
गाए कजरी , ठुमरी , चैती , फगवा
इन सबसे ऊबे तो डार लिए भगवा
बांचन लागे तुलसी की रामायन
गाए लागन मीरा,सूर के भजन
पार की वैतरणी
कबीर की बानी
दुनिया आनी जानी
थके हारे , सुते रहे
दस माह जुते रहे
पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ
कुछ बूझा, कुछ नहीं बूझा
वही काटा , जो बुआ
हम का कहें बबुआ
कोऊ नृप होए हमैं का हानी ?

हम तो पढ़ें मित्रों मरजानी ?

17 फ़रवरी 2012

प्रेम

देह है 
दैहिक है 
दहकता है 
मस्तिष्क से पैर 
शिराओं में तरल 
बहता लावा
देह वन में दावानल 
देहयष्टि 
पोर-पोर अंगारा
एक टुकड़ा  
होंठों पै 
अब भी दग्ध है 
एक टुकड़ा 
कनपटी से चिपका 
आसपास गालों तक 
रोम-रोम 
तप्त है 
सुर्ख हैं  
रक्ताभ कपोल 
जिस्म का ज्वार !
बहती है स्वेद की क्षीण धार !!
यह क्या है ह्रदय का उदगार !!!
प्रेम है 
लौकिक है 
ललकता है 
आँखों में 
थिरता है 
बैचेन एकलता है
रीझना , रूठना , मनाना
सजना , संवरना, इठलाना 
समझना , समझाना 
वृथा बहलाना 
खेल , खिलौना , खेलना 
उम्र का बचपना 
सृष्टी की रचना 
ऐसी ही है संरचना 
पिहु-पिहु पुकारना 
चकोर का ताकना 
मन की सरलता 
मन का जोड़ना 
विश्व क्या द्वैत है ?
शाश्वत द्वन्द 
ये नश्वर काया 
जो पाया   
क्या माया   
यह कैसा भोग ?
प्रेम क्यों रोग ??
क्या कहते ज्ञानी 
प्रेम की क्या बानी  
एक ही वचन बोल 
प्रिये ! सिर्फ तुमसे है प्यार !
ले कोई प्रियतम पुकार !!
ढाई आखर आखिरकार !!!


(१४ फरवरी का बुखार उतरने के बाद )

11 फ़रवरी 2012

इतिहास -अंतिम किश्त

हम सब मुद्राएँ हैं 
चांदी के सिक्के हैं 
सोने की अशर्फियाँ हैं
डालर हैं , रूपइया हैं 
मार्क हैं , फ्रांक हैं 
बुद्ध अब जेन है
जापानी येन है
यात्री ह्वेन्सांग , फाहियान 
शाखा महायान , हीनयान 
दर्शन अब युआन 

विषय भूगोल नहीं 
जी पी एस प्रद्दत है 
दुनिया कितनी मस्त है 

पृथ्वी अब गोल नहीं 
गूगल है 
आइंस्टाइन , न्यूटन से बड़ा ब्रांड 
ऐपल है 
गंगा से वोल्गा तक 
पेप्सी, कोक है 
मैक है , पिज्जा है 
मुर्गी अब के एफ सी का ब्रांड एम्बैसडर है 
मुल्कों से बड़ा मुल्क फेसबुक ट्विटर है .
वालस्ट्रीट नया मक्का है 
गीक ऋषियों की सिलिकोन वैली है 
एमोटीकोन भाषा की रोती-हँसती शैली है 
ध्यान अब डाओ-जोन्स है 
पूजा नैशडैक है 
ज़िंदगी रिपोर्टर है 
एक सौ चालीस चिन्हों में अक्षरा ट्विटर है 
बाईबल , कुरान, गीता सब विकीपीडिया है 
दौड़ती भागती ज़िन्दगी की सीढ़ियाँ है 
यंत्रवत ज़िंदगी है 
मानव एक पुर्ज़ा है 
युद्ध का कारण ज़र ज़ोरू ज़मीन नहीं 
तेल है , क्रूड है , ऊर्जा है .
पौरुष वाईग्रा है 
काम कंडोम है 
बहके हुए कदमों को थाम ले वो पिल है 
दुनिया सारी एड्स के दायरे में शामिल है  
सभ्यताओं का संघर्ष 
९/११ , कर्बला , कुरुक्षेत्र 
छोटे -छोटे युद्धों की एक सी श्रृंखला 
खर्च , खर्चा , क्रेडिट-कार्ड, खर्चा 
ज़िंदगी किश्तों में सब कुछ खरीद लाई
भविष्य अब विश्वव्यापी अवसाद की ईएमआई 
चमड़े के सिक्के जब जब चले 
ज़िंदगी दिल्ली से दौलताबाद तक जले 
हमसब अब बाइनरी गणित हैं 
विश्व के बाजार में या तो हैं खरीदार 'एक '
या फिर 'शून्य' हैं 
इससे ज्यादा नहीं हमारा कोई अस्तित्व 
इतना ही बचा खुचा 
संवेदनाओं का सतीत्व 
और हमारी भूख की भट्ठी में 
इतना सब जला है 
हवा में सांस लेना तक दूभर है 
हम विषधरों नें इतना फुँफकारा है 
अपनी ही सांसों में अब विषभरा है 
फन उठाये तैय्यार नागराज कोबरा है 
सिर्फ चित्रों और गानों में 
हरी हरी वसुंधरा है 
विश्वव्यापी तापक्रम वृद्धि से 
कौन डरा -डरा है 
पिघला दिए हिमनद 
हम नए भगीरथ 
किया नए ईश्वरों का वरण 
आज फिर कुरुक्षेत्र में खड़ा है रथ 
हे पार्थ ! हे अर्जुन !!
हे पताका पर आरूढ़ !!
सब के सब !!
किम्कर्तव्यविमूढ़ 
मुझे याद आ रहा है -
पुनश्च :
गांडीव हाथ से फिसलता जा रहा है 
- कोई है ?
कौन आ रहा है ?  

10 फ़रवरी 2012

इतिहास (प्रथम किश्त )

इतिहास चर्चा 
कभी भी कहीं भी 
इफ़रात से 
सुकरात से 
औने -पौने दाम 
टाईम पास मूँगफली
तोड़ी-फोड़ी, छिली
आड़ी-तिरछी लकीरें 
विहंगम पटल
सबका शगल 
जैसे चाहो उड़ेल दो रोशनाई 
वृहत्तर कैनवास 
सीता की अग्निपरीक्षा 
राम का वनवास 
द्रौपदी का चीरहरण 
सावित्री का व्रत-उपवास 
दुर्योधन का अट्टहास 
गांधारी का उपहास 
अंधा है धृतराष्ट्र
अंधा है धृतराष्ट्र
न चाहिए विवेक 
न शिष्टाचार 
डालो अचार , डालो अचार 
नहीं कुछ खर्चा
इतिहास चर्चा .
(क्रमशः जारी )

1 फ़रवरी 2012

खोखला

खेत की मेड़‌‍‌
बहुत बड़ा 
बरगद का पेड़ 
खड़ा है 
ड़ा  है 
अंदर से पोला है  
खोखला है  
कोई आंधी नहीं 
गाँधी नहीं 
हवा का एक हल्का सा झोंका 
गिरा देगा 
हरा देगा 
कोई कुल्हाड़ी मत लाना .
न हँसी असली 
न शब्द न कथनी न करनी 
बहत्तर छेद चलनी  
मिट्टी की  गाड़ी 
मृच्छकटिकम
चलती गड़ड़
हाथों में भरे 
विषभरे अक्षर 
मन से 
मस्तिष्क से 
रक्त कलम से 
गलियों से 
खेतों से
सड़कों से 
गुजरते रहे 
आते रहे जाते रहे 
अकेले अकेले चले 
घर जले 
बस्ती जली
कस्बे जले 
जहाँ जहाँ से गुज़रे 
काफिले
चेहरे  , चेहरे , तमाम चेहरे 
लूले लंगड़े अंधे बहरे 
हाथ , हथेली , मुट्ठी बाँधे
दाँत भींचे , फूले नथुने
रक्ताभ आँखे 
जुलूस  बने , जलसा बने , बहस -मुबाहिसा हुए 
अर्थ की अर्थी उठाए 
सफहा - सफहा 
बिखरे बिखरे हरफ 
एक तरफा , एक तरफ 
गूंजने लगे 
गाने लगे 
चिल्लाने लगे 
पाँवों के तलुए 
चाटने लगे 
सूँघते हुए 
गलियाँ-गलियाँ 
घूमते
कटखौने हुए , काटने लगे 
गालियाँ - गालियाँ 
और सब तटस्थ हैं 
अर्थ सब बौने हुए 
सुविधा के बिछौने हुए 
धूप से बचने के लिए 
आँखों को ढाँप लिया 
स्वार्थों को भाँप लिया 
दाम औने-पौने हुए 
खेत की  मेड़‌‍‌  पर 
सूखे हुए कुँए के पास 
धराशायी बरगद 
भीष्म सा लहुलुहान 
और विजयी मुद्रा में पास ही खड़ा है 
एक बिजुका शिखंडी 
बजउठी रणभेरी
अट्टहास कर , नरमुण्ड बांधकर 
नृत्यप्रवृत कापालिका , चंडी  
हो गया नाटक का अंत 
पर्दा  धीरे -धीरे गिरता है 
मूक - दर्शक  अपनी -अपनी जगह खड़े  , 
बजायेंगे , करतल 
तालियाँ - तालियाँ .

उल्लू

घुग्घू  या मुआ 
किसी भी नाम से पुकारें 
उल्लू का पट्ठा
उल्लू का पट्ठा रहा !!


घोंघा बसंत होने का दर्द 
जिसने सहा हो 
वह जहाँ भी रहा हो 
पानी के करीब 
किसी पुराने खंडहर 
या किसी पेड़ का सगा  
सारी उम्र घुग्घियाता - 
घुग्घूऊ ऊऊ रहा करता ,   
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा !!


गले में पड़ा है 
लक्ष्मी का पट्टा 
भाग्य घिसा-पिटा
परसाई जी का दर्द 
परसाई जी ने कहा 
सबने अपना-अपना 
उल्लू सीधा किया 
चलता बना 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!


प्रेम का फर्द 
ज़माने का सिरदर्द 
पिछली पीढ़ी का क़र्ज़
अगली पीढ़ी का फ़र्ज़ 
अजीर्ण का रोग 
अनिद्रा भोग 
विरह-वियोग 
प्रथम-मिलन-सम्भोग 
भैरवी साधना 
बकवादी की बकवास 
दार्शनिक का फलसफा 
देवों का सोमपान 
देवी का निंदा-सद्यस्नान  
सब का रतजगा 
सारी सारी रात चला 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!



बिसमिल्ला की शहनाई 
पर जैसे आधी रात
राग बिहाग सजा, 
बजा, जब चढ़ी तान
कामदेव का बाण
इस पर चला 
उस पर चला 
पुकारती रही 
नयनों की आतुरता 
बैठा रहा घुग्घू 
निर्मिमेष ताकता 
उल्लू का पट्ठा 
उल्लू का पट्ठा रहा  !!
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