1 अगस्त 2011

चंद क्षणिकाएं

(१)
धरती   
समुद्र 
जंगल 
पहाड़ 
को नापना 
अंतरिक्ष में घूमना 
विचरण है 
भ्रमण है 
यात्रा तो बस 
पहला चरण है .
(२) 
बच्चे 
कागज की नाव 
नाली में डाली 
और बहुत दूर तक 
साथ साथ चला 
कागज़ के 
भीग जाने तक .
(३) 
नर्स ने 
लपेट कर 
नवजात शिशु 
लाकर माँ को सौंप दिया 
बहुत देर तक देखने के पश्चात 
माँ  ने हाथ ऊपर उठाया 
शिशु का माथा चूम लिया .
(४) 
हर शाम जब 
पिता घर लौटा 
देखा बिटिया 
बालकनी में  खड़ी  इन्तजार कर रही है 
जब भी वो तीन सीढियां चढ़ा 
बेटी पिता का मुंह देख 
खिलखिला के हंस दी 
और दौड़ के अन्दर चली गयी .
(५) 
पत्नी ने कहा 
'मेरी बात नहीं सुनती '
'तुम जोर से डांट  दो  '
पिता जोर से चिल्लाया -
बिटिया को डांट दिया .
पत्नी ने कहा 
' खाना नहीं खा रही 
मेरी बात नहीं सुनती '
पिता ने जोर जबरदस्ती से खिला दिया .
पत्नी कहती रही 
- 'मैं डांटती हूँ तो प्यार भी करती हूँ '.
बेटी कतराती है 
पास नहीं आती है .
पिता से सहमती है 
सिर्फ महाभारत में नहीं 
युधिष्ठिर चौपड़ में हारता है 
और शकुनी सिर्फ मामा नहीं होता .
(६) 
शिशु के हाथ में 
थमाई 
रोशनाई में डुबाई 
नुकीली  नोक वाली 
नरकुल की लकड़ी 
और हाथ पकड़ 
तख्ती पर उकेरा 
' बिस्मिल्लाह '
और 'हाते-खड़ी'  सम्पन्न हुई .
( बंगाल में ' हातेखड़ी ' यानी शिशु द्वारा खड़ी द्वारा प्रथम अक्षर लिखाकर विद्यारम्भ )

4 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut sundar...Life's aspects described in most mesmerizing words.

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  2. विविध रंगों को उकेरती सुंदर कवितायें

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  3. बहुत सुंदर। सभी क्षणिकाएं एक से बढ कर एक।

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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