13 जनवरी 2012

तोता

द्वापायन वेदव्यास के अयोनिज पुत्र शुक देव बारह वर्ष तक गर्भ में रह कर कृष्ण के इस आश्वासन के बाद निकले की उनके ऊपर माया का प्रभाव नहीं पड़ेगा .


द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयारन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यश्रत्रन्यो अभिचाकशीति ॥( ऋग्वेद)
एक डाल पर बैठे हैं वे दोनों दोनों के पंख सुनहरे हैं पेट भी दोनों के हैं एक का पेट भरा है वह फिर भी खाता है दूसरे का पेट खाली है वह फिर भी देखता है केवल देखता है!(ऋषभ )


अर्थात समान आख्यान वाले दो पक्षी एक वृक्ष पर एक साथ बैठे हुए हैं उनमें एक मधुर फल का स्वाद लेता है और दूसरा निष्क्रिय बना उसे देखता करता है।


राजा परीक्षित को भगवान शुकदेव ने भागवत सुनाई और मुक्त किया . कलियुग से इस कथा का सम्बन्ध है |इससे हमारा भी है .


उपरोक्त कथा इस बात का द्योतक है कि तोता कोई साधारण पक्षी नहीं है . जब शंकराचार्य निकले और मंडनमिश्र के घर शास्त्रार्थ का फैसला उनकी विदुषी पत्नी के द्वारा हुआ पर उनके घर की पहचान का कारण यही साधारण पक्षी तोता था .


अतैव जब विचार हुआ की कोयल , मयूर , गरुड़  , नीलकंठ  , क्रौंच पक्षी जो स्थापित ब्रांड हैं इसके विपरीत किसी ऐसे पक्षी को विषयवस्तु बनाया जाए जो उपयोगी तो बहुत है परन्तु जिस पर व्यवस्थित  सामग्री उपलब्ध नहीं है .और यह आपको परोस रहा हूँ .


अब फुटपाथ पर बैठे पिंजरे में कैद तोता जब बाहर आकर आपका भाग पढ़ सकता है तो वह मेरे लेखन की विषयवस्तु अवश्य  बन सकता है .शायद मुझ बिल्ली के हाथ छींका नहीं तोता आ जाए . वैसे हो सकता है मेरा भाग्य उस जादूगर सा हो जिसकी जान किसी द्वीप में कैद किसी तोते में अटकी है . जिसे आप आज़ाद कर दें .  परीक्षा की ऋतु आये तो आपको इस देश की पूरी शिक्षा प्रणाली एक तोते रूपी कृष्ण के विराट स्वरूप जैसी नज़र आएगी . जहाँ सारा ज्ञान रटंत विधा द्वारा एक कान से अंदर जाता और दूसरे से बाहर आता नज़र आएगा . ठीक वैसे ही जैसे विशाल आकार से छोटा स्वरुप ग्रहण कर हनुमान नागमाता सुरसा के मुख से प्रवेश कर कान से बाहर आ गए थे . वैसी पूरी रामायण कैकेयी और दशरथ की जुबान , सुपर्णखा  के नाक कान , रावण की नाभि के अमृत  , अंगद के पाँव पर टिकी हुई है . किसी आँख -नाक -कान विशेषज्ञ की अज्ञात परछाई पड़ रही है रामायण की कथा पर . और तोते के गले से मनुष्य की वाणी का निकलना भी किसी डॉ डूलिटल की मेहरबानी का मोहताज नहीं, क्योंकि वह हमारे सिखाए शब्दों और भाषा का इस्तेमाल करता है .


तोता न होता तब हमारे शिक्षा मंत्रालय का क्या होता ? शरद्जोशी जी ने लिखा था हमारे वित्त मंत्रालय को अपने कार्यालय के सामने कोलंबस की प्रतिमा लगवाना चाहिए , युति समझाई थी - यह कह कर कि अगर कोलंबस ने अमेरिका की खोज न की होती तब हम कहाँ से उधार लेते ? अब इस प्रश्न से तो समाजवादी तोतों के हमारे हाथों से उड़ जाने के कारण हम मुक्त हो चुके हैं . परन्तु अब भी हमारे प्रत्येक शिक्षा संस्थान के बाहर तोते की प्रतिमा लगवाने का मेरा सुझाव निहायत प्रासंगिक है और काफी समय तक इसके बने   रहने की पूरी तैय्यारी भी है . यह आप किसी भी विशेषज्ञ तोते से दो मिनट बात कर आश्वस्त हो जायेंगे .


तोता मंडनमिश्र के घर रह कर वेद का पाठ और मंत्र उच्चारण तो सीख ही जाता है . और उसके कानों में पिघला शीशा भी नहीं डाला जाता . भले ही तोते को उसका अर्थ या ज्ञान ताउम्र न हो . पर उससे क्या फर्क पडता है - हमारे तोते उम्र भर राम - राम करते हैं बिना राम को जाने , समझे .


तोते को खिलाई हुई झूठी मिर्च तुतलाते बच्चे को खिलाकर उसे तोते की तरह बोलने का टोटका तो हमारे समाज का वह दर्पण है जिसे हम अपने समाज , राजनीति , संचार माध्यम की वाचलता / मुखरता के बाहुल्य में रोज देख पाते हैं और मन ही मन सोचते हैं काश इन सबको तोते की जूठी मिर्च इनके माता-पिता ने न खिलाई होती .


वे माता -पिता जिनके बुढ़ापें की लाठी विदेश जा कर बस गई है . वे अपने आँगन में चहचहाने के लिए पैराकीट  रंगबिरंगे तोते पाल लेते हैं . जिन्हें जीवन में रंग कम लगते हैं वो सोलोमन द्वीप के बहुरंगी एक्लेक्टस तोते पाल लेते हैं . देशी पुत्रों को जब मातापिता को छोड़ विदेश रहने में अपनी अंतरात्मा के चुप्पी साध लेने पर उनके माता पिता  मनुष्य की किसी भी भाषा में बोलने के अलावा बिल्ली के बोलने , कुत्ते के भौंकने , और बच्चे के रोने की आवाज़ निकालने की क्षमता रखने वाले ये तोते अपने मन और जीवन में बसे सन्नाटे को तोडने में सहायक तोते पाल लेते हैं , और ये तोते कितने सहायक होते हैं यह तो वो ही बता सकता है जिसे इनका सानिध्य प्राप्त हुआ है . गफ्फार अहमद साहब का तोता अंग्रेजी बोलता है और उर्दू में अस्सलाम अलयकुम भी बोलता है .


तोते वैसे भी आपके बच्चों से कितना मेल खाते हैं . वो उन्ही की तरह स्नान करते हैं . जिनके बच्चे शरीर पर पानी डाल कर बदन भिगाने को स्नान कहते हैं, उन्हें माता उलाहने में कहतीं हैं हो गया तुम्हारा "तोता स्नान " . और फिर वही तोते हाथ से उड़ जाते हैं . जब वो अपनी पसंद के लड़के या लड़की से शादी कर लेते हैं , या किसी दूर प्रान्त या देश में जीविका अर्जन करने चले जाते हैं . ऐसा नहीं की माँ -बाप इन सपनो से अपने को अलग रक्खे हुए हैं या इन सपनो के खिलाफ हैं . सपनों से समझौते किये उन्हें  दुःख इस बात का नहीं है , उन्हें तो यह सालता है की इन सपनों में वे कहीं प्रवेश ही नहीं करते हैं .


पदमावती के पास सिंहल द्वीप में हीरामन तोता था . नाराज पिता गन्धर्वसेन उसे मार देने पर उद्यत हो गए और वह उसकी अनुनय -विनय के कारण बच गया था . जब वह मानसरोदक गई हुई थी तो तोता खटके के कारण उड़ गया . तोते को प्राणों से चाहने वाली पदमावती बहुत दुखी हुई - कवि जायसी ने उस दुःख का वर्णन करते हुए लिखा था  - सुआ जो उत्तर देत हा पूँछा , उड़ी गा पिंजर न बोले छूँछा |  माता -पिता भी अपने सोने के पिंज़रे दरों दीवार से यही पूछते हैं , पर खाली छूँछा न पद्मावती से कुछ बोला न उनसे बोलेगा .


हिन्दी सिनेमा में एक डाल पर तोता बोले -एक डाल पर मैना  , तोता -मैना की कहानी पुरानी हो गई जैसे गीतों के माध्यम से तोता मौजूद है . अब मैं इन बूढ़े तोतों को क्या सिखाऊंगा .


रघुवीर सहाय होता तो आपको बोलता -


अगर कहीं मैं तोता होता
तोता होता तो क्या होता?
तोता होता।
होता तो फिर?
होता,'फिर' क्या?
होता क्या? मैं तोता होता।
तोता तोता तोता तोता
तो तो तो तो ता ता ता ता
बोल पट्ठे सीता राम|

आशा है जब अगली बार जब आपकी तोताराम या तोते जैसी नाक वाले किसी व्यक्ति से मुलाकात होगी तो उसे कुछ श्रद्धा और आदर से देखेंगे .

6 टिप्‍पणियां:

  1. परीक्षा की ऋतु आये तो आपको इस देश की पूरी शिक्षा प्रणाली एक तोते रूपी कृष्ण के विराट स्वरूप जैसी नज़र आएगी . जहाँ सारा ज्ञान रटंत विधा द्वारा एक कान से अंदर जाता और दूसरे से बाहर आता नज़र आएगा .

    ज़बरदस्त कटाक्ष किया है सर!
    पूरा आलेख बहुत अच्छा लगा।

    सादर

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  2. कल 17/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. यशवंत जी आज ब्लॉग-भ्रमण किया आपके लिंक्स से. कुछ पढ़ा और टिपियाना सीखने की कोशिश की

      हटाएं
  3. तोता तो ,तोता है ही और तोते को तोता होना भी चाहिए ,लेकिन तोते को हमने रटाया और तोते से हम ही रटना सीख रहे हैं ,तोता तो तोता ही रहा ,हम उल्लू बनते जा रहे हैं !
    बढ़िया व्यंग्य ,और सुन्दर निरुपण!

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  4. हमारे तोते उम्र भर राम - राम करते हैं बिना राम को जाने , समझे .


    वे माता -पिता जिनके बुढ़ापें की लाठी विदेश जा कर बस गई है . वे अपने आँगन में चहचहाने के लिए पैराकीट रंगबिरंगे तोते पाल लेते हैं

    सार गर्भित लेख .. गहन कटाक्ष है .

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  5. माता -पिता भी अपने सोने के पिंज़रे दरों दीवार से यही पूछते हैं , पर खाली छूँछा न पद्मावती से कुछ बोला न उनसे बोलेगा .very nice.

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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