13 मई 2010

बासी अखबार नहीं हूँ

दुनिया खरीदूंगा दावेदार नहीं हूँ ,
और फिर इतना बेकार नहीं हूँ .
दोस्त कम या ज्यादा हिसाब क्या ?
नेता नहीं , साहूकार नहीं हूँ .
चेहरे को मेकअप से सजाना ?
आम दिन  हूँ , त्यौहार नहीं हूँ .
जिंदगी - गणित में अव्वल नहीं तो क्या ,
तुम जीत नहीं , मैं हार नहीं हूँ .
पुराने ख़त की ईबारत हूँ मैं ,
मैं कल का बासी अखबार नहीं हूँ .

1 टिप्पणी:

  1. उम्दा रचना...........

    अनुपम रचना.........

    बाँच कर अच्छा लगा........

    उत्तर देंहटाएं

आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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