4 जुलाई 2011

कुछ यूँ ही

जमीं पर उतरे चाँद से बतियाता है कौन
स्निग्ध चांदनी में है ये किसका मौन
किसने साहिल पे बिखेरी चांदी की रेत
इन पत्तियों पर खिला किसका स्वेद
हिमाच्छादित चोटियों पर किसका तेज
हजारों रास्ते कौन सा उससे आमेज
चलो फिर इन घाटियों में ढूंढें खोई हवा
हमारी बस्तियों से रूठ कर निकली सबा
फिर  पुरनम आँखों से हुआ विसाल
पत्थर से बादल टकराए बरसे हिमाल
गर्मिए ग़म से निकले कितने चेनाब
दौड़ता  दरिया सागर से मिलने बेताब
फिर इन चश्मो  से निकलें मौजें बहारां
गूंजे यहाँ उसके जलवों का लश्कारा.

5 टिप्‍पणियां:

  1. गर्मिए ग़म से निकले कितने चेनाब
    दौड़ता दरिया सागर से मिलने बेताब

    बहुत खूबसूरत ... आमेज का अर्थ नहीं समझ आया ..

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  2. ईश्वर से मिला हुआ कौन सा रास्ता है "उससे आमेज ". वैसे एक प्रयोग दुष्यंत की पंक्तियों में है " मसलहत आमेज होते हैं सियासत के कदम , तू ना समझेगा सियासत तू अभी इंसान है ".

    मैंने मिलाया नही , यौगिक रूप में , एक छोर पर रास्ता और एक छोर पर वो ईश्वर , आमेज कौन सा यही नही समझ पाया .

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  3. बहुत सुंदर बनी है रचना ...
    कम शब्दों में गहन अर्थ लिए हुए....
    ''phir purnam aankhon se hua visaal''-ye bhi nahin samajh aaya .

    उत्तर देंहटाएं
  4. @अनुपमा त्रिपाठी पुरनम यानि भींगी हुई विसाल का अर्थ मिलन या सामना .

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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