16 जुलाई 2011

सादा कबूतर

शब्दों में बेबसी , बेचारगी , गुस्सा हो 
पहले नहीं देखा कभी  वो इतना डरा हो ||
लीडरान की चाक -चौबंद हिफाजत हो 
देखो न आसपास भी, वो सिरफिरा हो ||
मुंडेर पर नहीं दिखा वो सादा-कबूतर 
हो न हो किसी बाज के पंजों ने धरा हो ||
आँखें जागने से लाल हैं या खून उतरा है 
रात बड़ी कश्मकश से शहर गुजरा हो ||
आँखें खोलो तो बाज़ार की लाशों का मंज़र 
बंद करूँ तो सामने उसी बच्चे का चेहरा हो ||
चार सू आवाजें दीं सब लौट के आती हैं 
ये शहर जैसे हर सू पहाड़ों से घिरा हो ||
जो  धमाका  हमारे  कान सुन्न कर गया 
कई घरों  में अबतक सन्नाटा पसरा हो ||

7 टिप्‍पणियां:

  1. चार सू आवाजें दीं सब लौट के आती हैं
    ये शहर जैसे हर सू पहाड़ों से घिरा हो ||
    जो धमाका हमारे कान सुन्न कर गया
    कई घरों में अबतक सन्नाटा पसरा हो ||
    ...palbhar mein barbaad hote gharon mein sannata pasarne wale durdaant log jaane kab insaan banegen...
    ..bahut marmsparshi rachna...

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  2. मुंडेर पर नहीं दिखा वो सादा-कबूतर
    हो न हो किसी बाज के पंजों ने धरा हो |

    शांति दूत कबूतर तो अब अन्याय रूपी बाज के पंजों में फंस के ही रह गया है

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  3. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  4. बहुत ही बढि़या प्रस्‍तुति ।

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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