30 सितंबर 2011

यथावत

घड़ी के कमान सी 
चल रही है जिन्दगी 
वक्त कट रहा है 
वक्त में सी रहा है 
खुद को आदमी .
आँखों के आंसुओं से 
उभरी दो लकीरें 
और जिन्दगी का रुख 
नहीं बदला ;
टूट टूट कर बालों ने 
समय के पहले 
बूढा किया और गर्द 
चेहरों पर सिमटी 
और इन सिमटी लकीरों में 
यादों सा पी रहा है 
अपना लहू आदमी .
समस्याओं के घेरे में घूमता पंखे सा 
और हो उठा है ठण्ड की चाहत में गर्म 
आदमी ; अंतरिक्ष में घूमता 
कैद हो गया कमरे में .

4 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ को कहती विचारणीय रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. 'अंतरिक्ष में घूमता
    कैद हो गया कमरे में ..

    अब क्या कहें,इसके आगे ?

    उत्तर देंहटाएं

आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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