21 फ़रवरी 2012

इतिहास - ( द्वितीय किश्त: क्रमशः )

मैदान में बस गए
गंगा दोआब भए
पंजआब भए
यहाँ वहाँ सर्वत्र
भागीरथ के साठ सहस्त्र
पुरखों की हड्डियों से उर्वरा
भर गया सुनहरी
बालियों सा सोना खरा
खेती-किसानी की
तुम्हारे खलिहान भए
कोल्हू के बैल भए
गाय को माता किए
आता किए , जाता किए
खता किए, खाता किए
घाट नहाए , मंदिर के द्वार रहे
गुरु द्वारे मत्था टेका
फ़कीर की मज़ार गए
गाए कजरी , ठुमरी , चैती , फगवा
इन सबसे ऊबे तो डार लिए भगवा
बांचन लागे तुलसी की रामायन
गाए लागन मीरा,सूर के भजन
पार की वैतरणी
कबीर की बानी
दुनिया आनी जानी
थके हारे , सुते रहे
दस माह जुते रहे
पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ
कुछ बूझा, कुछ नहीं बूझा
वही काटा , जो बुआ
हम का कहें बबुआ
कोऊ नृप होए हमैं का हानी ?

हम तो पढ़ें मित्रों मरजानी ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. संक्षिप्त शैली में इतिहास,
    रचनाकार अतुल प्रकाश !!

    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. थोड़ी सी सीधी साधी पंक्तियों में सचमुच इतिहास बाँचा है! धन्यवाद त्रिवेदी जी

    उत्तर देंहटाएं

आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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