14 मई 2010

नीरव सत्य

रात दौड़ती जा रही ,
सन्नाटे के साये में .
दोनों ओर
खड़े पेड़
हाथ फैला
रोकना चाहते हों पथ मानो.
एक लम्बी
लपलपाती जीभ की तरह फैली सड़क .
यह सफ़र
मुंह से पेट
या जीवन से मृत्यु का ?
छूटता जा रहा है पीछे
नीरव सत्य .
मन में फट पड़े
विचारों के सैकड़ों ज्वालामुखी .
तप्त लावे की धार
बह  पड़ी आँखों से .
पसीने में नहा गया बदन
पूस की रात .
निकल पड़ी कविता
या
एक दुह्स्वप्न 
बात.
एक निश्चल निश्वास.

 

3 टिप्‍पणियां:

  1. laplapaati jeebh ki tarah faili sdak achchi upma...sundar kavita...

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  2. हाथ फैला
    रोकना चाहते हों पथ मानो.
    एक लम्बी
    लपलपाती जीभ की तरह फैली सड़क .

    bahu sundar abhivyakti

    जवाब देंहटाएं
  3. तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.

    जवाब देंहटाएं

आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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