23 जून 2010

मेहमानों का शहर

पुराने  सपनों का शहर अपने - बेगानों का शहर 
अब के लौटा तो लगा बन के मेहमानों का शहर.
तुम खुशकिस्मत हो दोस्त परदेश में बसते हो,
बहुत कमदिल हो चुका अब कद्रदानों का शहर .
अब के बारिश में बहुत भीगा तो याद आया ,
घर छोड़ रोया था कर - करके  बहानों का शहर .
यहाँ भी जो आग लगी गुलमोहर में अबके बरस ,
मंदिरों-मस्जिदों में रोयेगा आरती-अजानों का शहर .
कोई मयखाना नहीं और कोई शिवाला भी नहीं,
यह गाँव नहीं बन सकता कभी दीवानों का शहर.
मैं किसी नाव पर नहीं था फिर पार कैसे जाता ?
कैसे बढ़ेगा बिन सिफारिशों , बंद ज़ुबानों का शहर . 

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khubsurat likha hai, Sir! badhai swikaar kare!

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  2. Negative thought. Apna sahar paraya nahi hota, paraye log apne sahar ne bas jate hai begano ki tareh

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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