2 मई 2011

द्रोणाचार्य-एकलव्य सम्बन्ध

द्रोणाचार्य-एकलव्य सम्बन्ध क्या मात्र एक अँगुष्ठ 
वटवृक्ष की छाया या सूखे पेड़ का ठूंठ
कहाँ अब नचिकेता के यम प्रश्नों का उद्गम 
शिक्षा ज्ञानपिपासु को थमाया ध्रुव-तत्त्वं
सत्य की खोज है प्रश्नों से परे
क्यों वशिष्ठ जिज्ञासा से डरे-डरे
विज्ञान तर्क से परे धर्मग्रंथों में तबदील
निंदा से परे वैज्ञानिक अब नयी तफ़सील
पढ़ना –पढाना नाटक , शिक्षण अभिनय , पात्र
पाठ पटकथा , संवाद , रट लें ज़ुबानी छात्र
अनुसंधान पेशा नहीं , पदनाम , उपाधि
या वर्णसंकर सत्य की नई प्रजाति ?
शिक्षाविद ज्ञान-मंदिरों के नव-ब्राह्मण मठाधीश
विषय जहाँ नये वर्ण हैं , कुछ सवर्ण , कुछ दलित
स्वयंभू स्थापित विशेषज्ञ / निपुण अधिष्ठाता
सार्वजनिक फसलों पर कुंडली मारे जमींदार विधाता
‘अहं ब्रह्मास्मि ‘ दर्शन नही , एक अहं उच्चारण ,
खेतों को खा गयी मेड़ , येन-केन-प्रकारेण
क्यों नववर्ष कैलेंडरों पर घूम-फिर कर वही चंद मूर्तियां
जब हाथों में हर पल नई कॉलर टयून और छवियाँ
मंडनमिश्र और शंकराचार्य के शास्त्रार्थ की कहानी का तोता
पूज –पूज कर वर्ष दर वर्ष हर पत्थर शिव नहीं होता
बन्द कमरों में कैद घूर्णी-धर बुर्जुआ बासी हवा
खोल दो खिड़कियाँ , आने दो ताजी हवा ||

4 टिप्‍पणियां:

  1. पूज –पूज कर वर्ष दर वर्ष हर पत्थर शिव नहीं होता
    बन्द कमरों में कैद घूर्णी-धर बुर्जुआ बासी हवा
    खोल दो खिड़कियाँ , आने दो ताजी हवा ||
    bahut achchha likha hai .

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  2. बहुत गहन भाव ....विचारने योग्य रचना

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  3. बेहद गहन अभिव्यक्ति।

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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