4 मई 2011

कर्सर की तरह

चंद शब्द 
या लिख पूरा महाकाव्य 
नहीं भर सका उसके जाने से उपजी रिक्तता 
आया ठहराव 
बुद्धू बॉक्स के सामने बैठकर 
चैनल बदलता रहा 
सड़क पर निरुद्देश्य चलता रहा 
हाथों में किताब ले पलटे पन्ने 
कभी इस कभी उस कमरे बैठा 
उस पर सिगरेट का टोटा
बस एक दो गहरा कश  धुएँ का छल्ला 
जाने - अनजाने लोगों का  घुमाया नम्बर
बिना बादलों के सूना ज्यों  ज्येष्ठ का अम्बर 
पानी पीकर फेंका नारियल 
लुढ़कता रहा कभी ईधर कभी उधर 
वैसा ही खाली 
चाय की दुकान  सामने की बेंच 
बैठक नहीं लेती  चुस्की नहीं देती 
आवारा दोस्तों के साथ आवारा नहीं होता 
हिंदी सिनेमा देख कर नहीं रोता 
अखबार में छपी बुरी खबरें नहीं रुलाती
चुटकलों पर  हंसी नहीं आती 
सिनेमा के पोस्टरों में ढूँढता हूँ 
पुरानी धुन में गुनगुनाता हूँ 
किसी कविता की भूली पंक्तियों  सा
चाह कर भी याद नहीं आती 
पेड़ से बिछड  कर हवा में उड़ गयी जर्द पाती
आईने से उसके चेहरे की मानिंद 
बादलों की स्याही की चादर में लिपटा शहर
एक अँधेरा कुआं जिसने मुझे छुआ 
संवाद मौन हो गया 
अचानक सहसा किसी साजिश जैसा 
परिचित, कौन ? हो गया
नंगा खाली बिस्तर जिससे किसी ने उतार ली चादर 
और बाल्कनी में टांग आया नुमाईश के लिए 
बासी खबरों के ताज़ा अखबार की तरह 
कीबोर्ड पर पागलों की तरह पटकता उंगलियाँ 
एक के बाद एक नाम दिया 
खर्च कर डाले सारे तखल्लुस 
सारी रात तकता रहा टकटकी बांधे
स्क्रीन से नहीं निकला  कोई
ना कोई तारा , न सितारा , न साया , न छाया 
न अकेले  न जुलूस  
सार्वभौमिक सत्ता इन्टरनेट की व्याप्ति 
मेरे खाली कमरे में सिकुड़ गयी 
यथार्थ सामने खड़ा था 
और मैं अकेला था 
चौबीस इंच के आयत पर बेबस 
कर्सर की तरह तिलमिलाता
अगली कुंजी के दबाव के इंतज़ार में |

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sunder rachanaa.akela byakti ki byatha ka chitraan bahut achche se kiya aapne.badhaai aapko

    please visit my blog www.prernaargal.blogspot.com
    and leave the comments also

    उत्तर देंहटाएं
  2. अकेलेपन और मन की व्यथा का सुंदर चित्रण ..सजीव ...किसी चलचित्र की भाँती ..!!

    उत्तर देंहटाएं

आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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