1 जून 2011

ईश्वर का हाथ

बेगानों के बीच
भीड़ में खड़ा अकेला
तब धरा हाथ तुमने काँधे पर
जोर जोर से धडकता दिल शांत हुआ |
जिसे पुकारता था
उस ईश्वर को याद किया
अश्रुपूरित नम आँखों से
जब धरा हाथ तुमने काँधे पर |
बुझते दीये की लौ को हाथों की अँजुरी से लिया ओट में
रोते हुए बच्चे को उठा लिया गोद में
रात में अनजाने पथिक के लिए जलाया द्वार पर दीपक
ग्रीष्म में पंछी के लिए छत पर रक्खा दाना - पानी
कमरे में फरफराती गौरैय्या के लिए किया बन्द पंखा
किसी खाँसते हुए मरीज की पीठ पर फिराया हाथ
किसी लड़खड़ाते हुए को झट लिया थाम
देख कर लगा बंधू , सखा !
ईश्वर का हाथ, मुझे छूकर चला गया
वो हाथ जो धरा तुमने काँधे पर |

7 टिप्‍पणियां:

  1. ईश्वर का हाथ तो ऐसा ही होता है ... जो दिखाई देता भी नई और नही भी ... अच्छी रचना है ...

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  2. सत्य वचन मंदिरो मस्जिदो मे जाने से अच्छा हस्पताल जाकर किसी असहाय गरीब की मदद करना लाख गुना बेहतर है । संत वही है जो हर छण दूसरो की तकलीफ़ को महसूस करे

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  3. उस ईश्वर को याद किया
    अश्रुपूरित नम आँखों से
    जब धरा हाथ तुमने काँधे पर |bahut gahan bhaw

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  4. "मैं ढूंढता तुझे था जब कुञ्ज और वन में ..
    तू खोजता मुझे था तब दीन के वतन में .."
    ये पंक्तियाँ याद आ गयीं ..|इश्वर की उपस्थिति दर्शाती हुई सुंदर रचना ..!!

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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