28 दिसंबर 2010

घर

घर का सपना 
मिट्टी और माटी
जमीन और दरख़्त 
आँगन , द्वार, खिड़कियाँ 
दालान और छत 
अच्छी  मीठी नींद .
टूटते हुए  सपनों की जमीन 
दरकती हुई ईंट
भरभराती दीवारें 
टपकती छत 
उखड़ता प्लास्टर 
और पस्त हो गया हमारा मास्टर !!
वास्तु का विशारद 
बाजार में नारद 
ब्रह्मा विष्णु महेश 
आदमकद गणेश 
सबके परास्त हौसले 
कोई किससे क्या बोले ?
ईश्वर की दी हुई अमूल्य धरा 
अब इसमें कब इंसान पढ़ा - बला
धरा का मूल्य 
आकाश से ऊपर 
गगन चुम्बी अट्टालिकाएं 
और आदमी का आकार बौना 
जर जोरू जमीन 
रोटी कपड़ा मकान 
सब मुहावरे 
सब किम्वदंतियां
सब भूतों की कहानियाँ !!
अब सबके सर मकान नहीं 
बस एक मुठ्ठी  आसमान !!
हम सब करोड़पतियों  के बीच   
बचे  हुए झुग्गियों का सामान 
अपने  अस्तित्व को बचाते हुए !!
लड़ रहे हैं महाभारत 
आर्यावर्त में !!

1 टिप्पणी:

  1. अतुल जी ,

    आपने आज के जीवन की सच्चाई को खूबसूरत शब्दों में ढाला है ..हांलांकि सच्चाई कडवी है

    धरा का मूल्य
    आकाश से ऊपर
    गगन चुम्बी अट्टालिकाएं
    और आदमी का आकार बौना
    जर जोरू जमीन
    रोटी कपड़ा मकान
    सब मुहावरे
    सब किम्वदंतियां
    सब भूतों की कहानियाँ !

    सटीक पंक्तियाँ हैं ...

    उत्तर देंहटाएं

आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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