23 नवंबर 2010

तेरी कही बात नहीं अखरी

अब भी ऊँची बहुत है ये बारादरी,
जबकि नीचे नदी की बाढ़ नहीं उतरी |
फूलों की पाँखुरी पै अंगारे रखे थे ,
फिर भी तेरी कही बात नहीं अखरी|
जिन हवाओं में नहीं थी तेरी खुशबू ,
जिंदगी वहाँ कब कहाँ थी ठहरी |
सामने जब भी आये मेरे पैमाने ,
याद आयीं तेरी आँखें भरी- भरी |
दरवाजा  यूँ ही खुला रखा  है,
पता है कोई ना आएगा इस दुपहरी| 

1 टिप्पणी:

  1. जिन हवाओं में नहीं थी तेरी खुशबू ,
    जिंदगी वहाँ कब कहाँ थी ठहरी |
    xxxxxxxxxxxxx
    वाह क्या बात है - भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति ...आगे बढ़ें ...शुभकामनायें

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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