30 अप्रैल 2010

और हम इंतज़ार करते हैं

हर सुबह की शाम होती है ,
और हम इंतज़ार करते हैं .
बदलते हैं रुख मौसमों के ,
और हम इंतज़ार करते हैं .
मौत का एक दिन मुकम्मल है ,
और हम इंतज़ार करते हैं .
गया वक़्त लौट कर नहीं आता ,
और हम इंतज़ार करते हैं .
हर चेहरा एक मुखौटा है ,
और हम इंतज़ार करते हैं .
दुनिया नहीं हमें बदलना होगा ,
और हम इंतज़ार करते हैं .
आएगा मसीहा एक दिन ,
और हम इंतज़ार करते हैं .

1 टिप्पणी:

  1. आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा मेरी शुभकामनायें!!!

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आपके समय के लिए धन्यवाद !!

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